विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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कलिकुण्ड के समीप देग मे कायोत्सर्ग पूर्वक रहे। प्रभु को देखकर
उस यूथाधिपति हाथी को जातिस्मरण उत्पन्न हुआ। उसने
सोचा—मैं विदेह क्षेत्र मे हेमंधर नामक वामन था। युवक लोग
और विट पुरुष मेरा उपहास करते थे। वैर के वशीभूत होकर
नये हुए वृक्ष की शाखा पर फासी खाकर मरने की तैयारी मे मुझे
सुप्रतिष्ठ सेठ ने देखा। उन्होने मुझे कारण पूछा, मैंने यथास्थित
कहा तो वे मुझे सद्गुरु के पास ले गए। सम्यक्त्व ग्रहण कराया,
अन्त मे अनशन करके मैने निदान किया कि मैं भवान्तर मे ऊँचा
होऊँ। फिर मर के इस वन मे हाथी हुआ। अब इन भगवन्त की
पर्युपासना करूँ। ऐसा सोचकर वही सरोवर से सरस कमलो को
लाकर उनसे जिनेश्वर भगवान को पूजा की। पूर्वगृहीत सम्यक्त्व
परिपालित होने से अनशन करके वह व्यन्तर जाति मे महर्द्धिक
देव हुआ। चरो के मुँह से यह अत्यन्त विचित्र बात सुनकर
करकण्डू राजा वहाँ आया। भगवान को न देखकर राजा अत्यन्त
आत्मनिन्दा करने लगा कि—वह हाथो ही धन्य हो गया जिसने
भगवान की पूजा की, मैं तो अधन्य हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते
उसके आगे धरणेन्द्र के प्रभाव से वहाँ नौ हाथ प्रमाण वाली प्रतिमा
प्रादुर्भूत हुई। राजा ने प्रसन्नतापूर्वक जय जयकार करते हुए
वन्दन-पूजन किया। और वहाँ चैत्य भी बनवाया। वहाँ पुष्पादि
से त्रिकालदर्शन-पूजन-स्तुति करते हुए राजा ने कलिकुण्ड तीर्थ
प्रकाशित किया। वहाँ वह हाथी व्यन्तर सान्निध्य करता है,
परचे पूरता है। नव यत्री आदि यन्त्र और कलिकुण्ड मन्त्र, षट्
कर्म कार्य प्रकाशित किए। जैसे ग्रामवासी जन गाँव के नाम से
पुकारे जाते है वैसे ही कलिकुण्ड निवासी जिनेश्वर भी कलिकुण्ड-
पार्श्वनाथ कहलाते हैं। यह कलिकुण्ड की उत्पत्ति हुई।
पहले छद्मस्थावस्था मे श्री पार्श्वनाथ स्वामी राजपुरी मे
कायोत्सर्ग ध्यान मे रहे। वहाँ घुडसवारी के लिए जाते हुए उस