विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तिनापुर-कल्प ६१
शरीर विकुर्वित कर के तीन पाँव से त्रैलोक्याक्रान्त करके नमुचि
को शासित किया ।
इस नगर मे सनत्कुमार, महापद्म, सुभूम और परशुराम आदि
महापुरुष उत्पन्न हुए ।
इसी नगर मे पाँच पाण्डव चरम शरीरी उत्तम पुरुष हुए ।
दुर्योधनादि अनेक महाबलवान राजा यहाँ उत्पन्न हुए ।
यहाँ सात करोड स्वर्ण का अधिपति गङ्गदत्त सेठ हुआ । तथा
सौधर्मेन्द्र का जीव कार्त्तिक सेठ हुआ जिसने राजाभियोग से
परिव्राजक को परोसने से वैराग्यपूर्वक हजार व्यापारियो के साथ
श्री मुनि सुव्रत भगवान के पास दीक्षा ली ।
इस महानगरी मे श्रीशान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ और
मल्लिनाथ जिनेश्वर के मनोहर चैत्य हैं, एव अम्बा देवी का भी
देवकुल है ।
इस प्रकार अनेक आश्चर्यो के निधान इस महातीर्थ मे जो
विधिपूर्वक यात्रा महोत्सव आदि से जिन-शासन की प्रभावना
करते हैं वे कुछ भवो मे ही कर्म क्लेश नष्ट कर सिद्धि प्राप्त
करते हैं ।
श्री हस्तिनापुर तीर्थ का यह सक्षिप्त कल्प भी सत्पुरुषो की
सङ्कल्प-पूर्त्ति मे कल्प-वृक्ष की भाँति बने ।
श्री हस्तिनापुर का कल्प समाप्त हुआ इसकी ग्रन्थ संख्या
चौबीस और ११ अक्षर है ।