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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 442 में से

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पृष्ठ 128

नरायु बाँधकर भारत वर्ष के पद्मिनीखंड नगर मे सागरदत्त नामक
सार्थवाह हुए। तुम विनीत परन्तु मिथ्यादृष्टि थे। एक वार तुमने
शिवायतन बनवाया, उसमे पूजा के लिए वगीचा भी लगाया और
एक तापस को उसकी सार संभाल के लिए नियुक्त कर दिया।
गुरु के आदेश से तुम सभी क्रिया कलाप करते हुए काल निर्गमन
करते थे। जिनधर्म नामक श्रावक के साथ तुम्हारी गाढ मित्रता
हो गई। एक वार तुम उसके साथ साधुओ के पास गए। उन्होने
देशना के पश्चात् कहा—“जिसने अगूठे के पैरवे जितनी भी
जिनेश्वर भगवान की प्रतिमा बनवायी है उसने निश्चित ही नरक-
तिर्यंच गति के द्वार के अर्गला लगा दी है।”

तुम ऐसा सुनकर घर आये और सोने की जिनप्रतिमा
बनवायी। उसकी प्रतिष्ठा करवा के तुमने त्रिकाल पूजा करना
प्रारंभ कर दिया। एक वार माघ-मास मे लिंगपूरण पर्वाराधन के
के लिए तुम शिवायतन गये तब जटाधारी ने चिरसचित घृत के
घडे लिंग-पूरणार्थ निकाले। उनमे लगी घृतेलिकाओ को तापस के
द्वारा निर्दयता पूर्वक पाँवो से मसले जाते देख कर तुम शिर धुनते
हुए कहने लगे—ये दर्शनी लोग भी इतने निर्दयी हैं तो हमारे जैसे
गृहस्थ विचारे क्या जीवदया पालेगे ? फिर तुमने अपने वस्त्राञ्चल
से प्रमार्जन करना प्रारंभ किया। जटी ने तुम्हे फटकारते हुए
कहा—'अरे धर्म संकर ! कायर ! तुम अरहन्त-पाखण्डियो द्वारा
विडम्बित हो !' तब ऐ तुम सव धर्मो से विमुख हो गए। निर्दयता
पूर्वक धर्म रसिक लोगो को हँसते हुए मायारंभ से तुम तिर्यंचायु
बाँधकर भव भ्रमण करते हुए राजा के वाहन अश्व हुए। तुम्हे
प्रतिबोध देने के लिए ही हमारा यहाँ आगमन हुआ है।

स्वामी के ऐसे वचनो को सुनकर उस घोडे को जाति स्मरण
हो गया। उसने सम्यक्त्व मूल श्रावक धर्म स्वीकार कर सचित्त