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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

५० विविध तीर्थ-कल्प
विविध व्याधियो को नष्ट करने के गुणयुक्त औषधियाँ,
मनोहर जल वाले ह्रद एव सरस्वती आदि पुण्यसलिला नदियाँ
यहाँ हैं।
यहाँ बहुधा मगधालोचनादि लौकिक तीर्थ हैं। यहाँ के चैत्यो
मे अर्हन्त भगवान की प्रतिमाएँ और खण्डित-भग्न मूर्त्तियाँ भी हैं।
जो मेरु पर्वत के चारो उद्यानो की पुष्प सख्या जानते हैं वे ही
यहाँ के सर्व तीर्थों की जानकारी बता सकते हैं।
श्रो गालिभद्र-धन्ना ऋषि ने यहाँ तप्त शिलाओ पर कायोत्सर्ग
किया, उन्हे देखने से पुरुषो के पाप नष्ट हो जाते हैं।
यहाँ सिंह, गार्दूल, भालू भेड़िये आदि तीर्थ के माहात्म्य से
कभी भी उपद्रव नही करते ।
यहाँ बौद्ध विहार भी प्रति प्रदेश मे देखे जाते हैं। यहाँ उन
महर्षियो ने आरोहण कर निर्वाण प्राप्त किया था।
यहाँ जो दुर्गम अन्धेरी गुफा है, सुना जाता है कि यहाँ पूर्व
काल मे रोहिणेय चोर आदि वीरो का निवास रूप था।
राजगृह के प्राचीन नामादि
इसकी उपत्यका मे राजगृह नगर सुशोभित है, जिसके क्षिति-
प्रतिष्ठादि नाम जब तब हुए हैं। क्षितिप्रतिष्ठ, चणकपुर,
ऋषभपुर, कुशाग्रपुर नामो के पश्चात् क्रमश राजगृह नाम हुआ।
यहाँ नयनो को शीतल करने वाला गुणशिल चैत्य था जहाँ
भगवान महावीर स्वामी का समवशरण होता था।
जहाँ पर मेतार्य ने सोने का किल्ला वनवाया और पूर्व भव
के मित्र देवता ने वहाँ मणियाँ लगवाईं।
जगत् मे चमत्कार उत्पन्न करने वाली लक्ष्मी का भोग करने
वाले यहाँ शालिभद्रादि अनेक महा धनिक सेठ हुए हैं।
यहाँ छत्तीस हजार वणिको के घर थे, जिनमे आधे बौद्ध और
आधे जैन थे।