विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैभारगिरि-कल्प ४९
क्रमश उदयन के पुत्र वाहडदेव ने शत्रुञ्जय-प्रासाद का उद्धार
कराया । उसके अनुज अम्बड़ ने अपने पिता के पुण्यार्थ 'शमली
विहार' का उद्धार कराया । मिथ्यादृष्टि सिन्धवा देवी ने प्रासाद
शिखर पर नाचते हुए अम्बड को उपसर्ग किया जिसे आचार्य
श्री हेमचन्द्र सूरि ने अपने विद्याबल से निवारण किया ।
अश्वावबोध तीर्थ का यह कल्प सक्षेप से श्री जिनप्रभसूरि ने
रचा है, भव्य जन इसे त्रिकाल पढें ।
॥ अश्वावबोध तीर्थ कल्प समाप्त हुआ । यह ८२ श्लोक और
अक्षर २० का है ॥
११. वैभारगिरि-कल्प
श्री जिनप्रभसूरि द्वारा वैभारगिरि का यह कल्प सक्षिप्त रुचि
वालो की सतुष्टि के लिए स्तवन के रूप मे बनाया जाता है ।
वैभारगिरि के गुण-प्राग्भार वर्णन करने मे बुद्धि से परिपूर्ण
भारती भी समर्थ नही है वहाँ हम कौन चीज है ?
जड-(बुद्धि) होते हुए भी हम तीर्थ की भक्ति रस-सिक्त गुणो से
युक्त उस सुशोभित तीर्थराज की किञ्चित् स्तवना करते हैं ।
यहाँ दारिद्रयविद्राविका रसकूपिका, गरम और ठण्डे पानी के
कुण्ड किसे कौतूहलपूर्ण नही करते ? यहाँ त्रिकूट खण्डिकादि
शिखर एव करण ग्राम के अवशेष घर और वन प्रकाशित हैं ।
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