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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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अश्वाववोध तीर्थ-कल्प ४७
मुझ वट-शाखा पर बैठी हुई को तीर से वींध डाला और मुह से
गिरे हुए मास-पिंड व तीर को लेकर व्याध अपने स्थान चला
गया। मुझे करुण चीत्कारपूर्वक बिलबिलाते-छटपटाते हुए देखकर
एक आचार्य महाराज ने जलपात्र से पानी छींट कर नवकार मन्त्र
सुनाया। मैंने श्रद्धा की और मरकर आपकी पुत्री हुई हूँ।
तब से वह राजकुमारी विषयला विरक्त हो गई और माता-
पिता को पूछ कर उसी श्रावक के साथ सात सौ जहाजो को
लेकर भरौंच के लिए रवाना हो गई। उनमे १०० जहाज वस्त्र,
१०० जहाज द्रव्य निचय, अगर-चन्दन, धान्य, जल, ईंधन, नाना
पक्वान्न, फल, प्रहरणादि के कुल छ सौ जहाज थे, पचास जहाजो
मे शस्त्र घर व पचास मे भेंट प्राभृत थी। इस प्रकार सात सौ
वाहन युक्त वह भरौंच के समुद्र तट पर पहुँची। राजा ने वाहन
समूह को देख कर सिंहल नरेश की चढाई की आशंका से नगर
क्षोभ को दूर करने के लिए सेना को सुसज्जित किया और भेट-