विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०. अश्वावबोध तीर्थ-कल्प
मात्र परोपकार रसिक, श्याम कान्ति वाले श्री मुनिसुव्रत
जिनेश्वर को नमस्कार करके मैं श्री अश्वावबोध तीर्थ का कल्प
सक्षेप से कहता हूँ ।
श्री मुनिसुव्रत स्वामी केवल ज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात्
विचरते हुए एकवार पैठानपुर (पैठण) (प्रतिष्ठानपुर) से एक
रात्रि मे साठ योजन उल्लघन करके जितशत्रु राजा के अश्वको
प्रतिबोध देने के लिए लाट देग मडन नर्मदा नदी अलकृत भरुअच्छ
(भरोच) नगर के कोरिंट वन में पहुँचे । जितशत्रु ने अपने प्रारभ
किए हुए अश्वमेध यज्ञ में अपने सर्वलक्षणसम्पन्न अश्व को होम-
ने की इच्छा की थी । अत आर्त्तध्यान के द्वारा दुर्गति मे न जाय
इसीलिए भगवान उसे प्रतिबोध देने के लिए पधारे थे । उन्हे वन्दन
करने के लिए लोग समवशरण मे आये, राजा भी गजारूढ होकर
आया और भगवान को वदन किया । इसके बाद अश्व भी अपने
साथ चलने के लिए नियुक्त पुरुषो के साथ स्वेच्छा से विचरता
हुआ समवशरण मे आया और स्वामी का अनुपम रूप देखकर
निश्चल खडा हो गया । उसने धर्म-देशना सुनी, प्रभु ने उसे पूर्व
भव इस प्रकार कहा—
पूर्व भव मे मैं इसी जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षे त्र के पुष्कल
विजय की चम्पा नगरी मे सुरसिद्ध नामक राजा था । तुम मेरे
परम मित्र मतिसार नामक मत्री थे । मैं नन्दन गुरु के चरणो मे
प्रव्रजित होकर प्राणत कल्प-देवलोक मे गया । वहाँ बीस सागरो-
पम की आयु पूर्ण की, वहाँ से च्यव कर तीर्थंकर हुआ हूँ । तुम