विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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भगवान् ऋषभदेव स्वामी का राज्याभिषेक युग्लियो ने पत्र-
सम्पुट मे जल लेकर चरणो मे छोड कर किया तो शक्रेन्द्र ने उन्हे
विनीत पुरुष कहा, जिससे विनीता नगरी नाम रूढ हुआ।
यहाँ महासती सीता ने आत्म-शुद्धि करते हुए अपने शील के
वल से अग्नि को जलपूर्ण किया। वह जल का पूर जब नगरी
को डुबाने लगा तो उस सती ने ही अपने शील के माहात्म्य से
उसकी रक्षा की।
यह अर्द्ध भरत-गोलार्द्ध पृथ्वी के मध्य मे नवयोजन विस्तीर्ण
और बारह योजन दीर्घ है। यहाँ आयतनस्थित रतनमय चक्रेश्वरी
प्रतिमा और गोमुख यक्ष विघ्नो को शीघ्र हरण करते हैं। यहाँ
घग्घर दह सरयू नदी के साथ मिल कर स्वर्गद्वार नाम से प्रसिद्धि
प्राप्त है।
यहाँ से उत्तर दिशा मे बारह योजन पर अष्टापद पर्वत है जहाँ
आदीश्वर भगवान सिद्धि को प्राप्त हुए। वहाँ भरतेश्वर ने सिंह-
निष्ध्या नामक आयतन तीन कोरा ऊँचा कराया। अपने-अपने
वर्ण और सस्थान युक्त चौबीस जिन-तीर्थंकरो के विम्ब स्थापित
किए। वहाँ पूर्व द्वार मे ऋषभ अजित दो, दक्षिण द्वार मे सभव-
नाथादि चार, पश्चिम द्वार मे सुपार्श्वनाथादि आठ, उत्तर द्वार मे
धर्मनाथादि दस तीर्थङ्कर एव अपने सौ भ्राताओ के स्तूप भी उसी
ने बनवाये।
इस नगरी के वास्तव्य लोग अष्टापद की उपत्यका मे क्रीडा
करते थे।
जहाँ से नवाङ्गी वृत्तिकारक (श्री अभयदेवसूरि) की शाखा मे
समुद्भूत श्री देवेन्द्रसूरि दिव्य शक्ति से आकाश मार्ग द्वारा चार
महाविम्ब सेरीसयपुर मे लाये।
जहाँ आज भी नाभिराजा का मन्दिर-महल है। वहाँ पार्श्व-
नाथ वाटिका, सीताकुण्ड व सहस्रधारा है। प्राकार स्थित मत्त-