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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

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अयोध्यानगरी-कल्प ५५

गयंद यक्ष है जिसके आगे से आज भी हाथी नही निकलते, यदि
जाते है तो मर जाते है ।
गोपदराई आदि अनेको लौकिक तीर्थ वहाँ वर्त्तमान है ।
इस अयोध्यानगरी के गढ की दीवाले सरयू नदी के जल से
सिंचित है । जैनशास्त्र विहित सप्ततीर्थी यात्रा से पवित्रित जन
जयवन्त है ।
श्री देवेन्द्रसूरिजी महाराज अयोध्यापुरी से चार बिम्ब कैसे
लाए ? यह बतलाते हैं । सेरीषक नगर मे विचरने वाले, धरणेन्द्र-
पद्मावती आराधित छत्तावल्लीय श्री देवेन्द्रसूरि ने उक्कुरुडि स्थान
पर कायोत्सर्ग किया था । उनके कई वार ऐसा करने पर श्रावको
ने पूछा—भगवन् ! यहाँ कायोत्सर्ग करने मे क्या विशेषता है ?
सूरि महाराज ने कहा—यहाँ पाषाणफलक है, जिसकी पार्श्वनाथ
प्रतिमा बनवाने पर सन्निहित प्रातिहार्य होगी । श्रावको की प्रार्थना
से सूरिजी ने अष्टम तप करके पद्मावती का आराधन किया ।
भगवती ने प्रत्यक्ष होकर कहा—सोपारक मे अन्धा सुथार है, वह
यदि यहाँ आकर अष्टम तपपूर्वक सूर्यास्त के समय फलक गढ़ना
प्रारम्भ करे और दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व पूर्ण करे तो वह
प्रतिमा निष्पन्न हो जायगी । श्रावकों ने उसे बुलाने के लिए
सोपारक नगर पुरुष भेजे । वह सुथार आ गया और उसी प्रकार
घडना प्रारम्भ किया । धरणेन्द्र को धारण की हुई पार्श्वनाथ
प्रतिमा निष्पन्न हुई । सूत्रधार द्वारा घडते हुए प्रतिमा के हृदय
पर मस्सा प्रादुर्भूत हुआ । उसने उसकी उपेक्षा करके बाकी
प्रतिमा घटित की । फिर प्रतिमा को समारते हुए मस्सा देखा ।
उसने टंकी चलाई, रुधिर निकलने लगा । सूरि महाराज ने कहा—
तुमने यह क्या किया ? इस मस्से के रहते यह प्रतिमा अतीव
अद्भुतहेतुक सप्रभाव होती । उन्होने अँगूठे से दबा कर रुधिर
बन्द कर दिया ।