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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 442 में से

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पृष्ठ 129

का त्याग कर दिया और प्रासुक जल व सूखा घास ग्रहण करने
लगा। छह मास पर्यन्त इन नियमो का पालन करते हुए मरके
सौधर्म कल्प मे महर्द्धिक देव हुआ। उसने अवधि ज्ञान से अपना
पूर्व भव ज्ञात कर भगवान के समवगरण स्थान रत्नमय चैत्य
कराया। उसमे भगवान मुनिमुव्रत स्वामी की प्रतिमा और अपना
भी अश्वरूप स्थापित कर वह देवलोक में लौट गया। तब से
अश्वाववोध तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। वह देव यात्री सघ के विघ्न दूर
कर तीर्थ को प्रभावना करता हुआ मानव भव प्राप्त कर यथा-
समय मोक्ष जावेगा।
कालान्तर मे वह तीर्थ गमलिका विहार नाम से प्रसिद्ध
हुआ। कैसे ? यह बतलाते है। इसी जम्बू द्वीप के सिंहल द्वीप
मे रत्नासय देश के श्रीपुर नगर मे चन्द्रगुप्त नाम का राजा
था, उसके चन्द्रलेखा भार्या थी। रानी के सात पुत्रो के वाद नर-
दत्ता देवी की आराधना से सुदर्शना नामक पुत्री हुई। उसने
समस्त कला और विद्याओ का अध्ययन कर तरुणावस्था प्राप्त
की। एक दिन वह राज-सभा मे पिता के गोद मे बैठी थी तब
धनेश्वर नामक एक व्यापारी भरौच से आया। वैद्य से पास रही
हुई कटुक गन्ध के प्रभाव से छीकते हुए उसने “णमो अरहंताण”
उच्चारण किया जिसे सुनकर राजकुमारी मूर्च्छित हो गई, वणिक
पीटा गया। सचेत होकर जाति-स्मरण प्राप्त राजकुमारी अपने
धर्म-बन्धु को देख कर प्रमुदित हुई। राजा द्वारा मूर्च्छा का कारण
पूछने पर उसने कहा—
मैं पूर्वजन्म मे भरुअच्छ मे नर्मदा तट पर कोरिट वन स्थित
-वट वृक्ष पर शमली-पक्षी थी। प्रावृप काल मे सात रात्रि तक महा-
वृष्टि हुई, आठवें दिन नगर मे क्षुधातुर भ्रमण करते हुए मैं व्याध
के गृहाङ्गण से मास-पिण्ड ले उडी। पीछा करते हुए व्याध ने