विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ कौशाम्बीनगरी-कल्प
वत्स जनपद मे कौशाम्बी नामक नगर थी, जहाँ चन्द्र और
सूर्य श्री वर्द्धमान स्वामी को वन्दनार्थ अपने विमान सहित आये।
उनके प्रकाश के कारण समय न जानने से मृगावती समवसरण
मे बैंठी रही। चन्द्र-सूर्य के स्वस्थान जाने पर वह आर्या चन्दन-
वालादि साध्वियो के प्रतिक्रमण करने के पश्चात् उपाश्रय पहुची।
आर्या चन्दना से उपालम्भ पाकर चरणो मे गिर के स्व अपराध
को खमाते हुए केवलज्ञान प्राप्त किया।
जहाँ उज्जयिनी से पुरुषपरम्परा द्वारा लायी हुई ईंटो चण्ड-
प्रद्योतन राजा द्वारा मृगावती के कहने से बनवाया हुआ दुर्ग आज
भी खडा है।
जहाँ मृगावती की कुक्षी से उत्पन्न गन्धर्ववेदनिपुण शतानीक
पुत्र उदयन वत्स देशाधिप हुआ।
वहाँ के मन्दिरो से प्रेक्षक जनो के नयनाभिराम अमृताञ्जन
सदृश जिन प्रतिमाएँ है। वहाँ कालिन्दी-यमुना नदी की जल
लहरियो से आलिंगित होते हुए वन है।
यहाँ पौष कृष्ण प्रतिपदा के दिन अभिग्रह धारण करने वाले
भगवान महावीर का पाँच दिवस न्यून छ मासी तप का पारणा
चन्दनवाला ने सूप के कोने मे रहे हुए उडद के वाकुलो से
कराया। देवो ने साढे बारह कोटि वसुधारा-वर्षा की, जिससे आज
भी वसुहार नाम से प्रसिद्ध गाँव नगरी के पास वसता है। पच
दिव्य प्रकट हुए। उस दिन से ज्येष्ठ शुक्ल १० को स्वामी के पारणा
के दिन तीर्थ स्नान-दानादि आचार वहाँ आज भी लोगो मे
प्रवृत्त है।