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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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४८ विविध तीर्थ-कल्प

उत्तर श्रेणी मे सुरम्या नामकी नगरी मे विद्याधरेन्द्र सख नामका
राजा था जिसकी तुम विजया नामक पुत्री थी एक वार दक्षिण
श्रेणी के महिस ग्राम मे जाते हुए तुमने नदी तट पर कुक्कुट सर्प
देखा और उसे रोष वश मार डाला । वहाँ नदी तट पर स्थित
जिनायतन देखकर तुमने अत्यन्त भक्ति पूर्वक भगवान के दर्शन
किये जिससे परम आनन्द हुआ । मन्दिर से बाहर निकलते तुमने
मार्गश्रम से खिन्न एक साध्वी को देखा । उनकी चरण-वन्दना
कर धर्म श्रवण किया । तुम भी उसकी विश्रामणादि द्वारा सुश्रुषा
करके देर से घर आई । क्रमशः तुम आर्त्त ध्यान से मर के
कोरिष्टक वन मे शमली हुई । वह कुक्कुट सर्प मर के व्याध हुआ
और पूर्व भव के वैर से उसने तुम्हे शमली के भव मे बाण से
मारा । पूर्व भव मे जिन भक्ति और ग्लान साध्वी की सुश्रुषा के
कारण तुम अन्त मे वोध प्राप्त हुई और जिनप्रणीत दानादि धर्मा-
चरण कर रही हो । “इस प्रकार गुरु-महाराज के वचनो को
श्रवण कर सुदर्शना अपने समस्त द्रव्य को सात क्षेत्रो मे व्यय
करने लगी । चैत्योद्धार कराया, चौवीस देव कुलिकाए, पौषध-
शाला, दानशाला, अध्ययनशालाएं कराईं । अत. वह तीर्थ पूर्व
भव के नाम से “शमलिका विहार” कहलाया । अन्त मे उसने
द्रव्य भाव से संलेखना पूर्वक अनशन किया और मिती वैशाख
शुक्ल ५ को ईशान देव लोक प्राप्त हुई ।
श्री मुनिसुव्रत भगवान के मोक्ष जाने के पश्चात् ग्यारह लाख
चौरासी हजार चार सौ सत्तर वर्ष बीतने पर विक्रमादित्य संवत्सर
प्रवृत्त हुआ । पुन मुनिसुव्रत स्वामी के जीवितकाल (की तत्कालीन
गणना) से ग्यारह लाख पचानवें हजार मे अट्ठाईस वर्ष न्यून
समय के वर्ष मे विक्रमादित्य होगा । यह शमली विहार की उत्पत्ति
हुई ।
भरु अच्छ (भृगुकच्छ-भरोच) मे अनेक लौकिक तीर्थ भी है ।