विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैभारगिरि-कल्प ५१
यहाँ के प्रासादों की श्रेणी अत्यन्त प्रेक्षणीय, कल्याणकारी थी
जिनके आगे स्वर्ग के विमानो ने भी अभिमान छोड़ दिया था।
जहाँ जगत के मित्र सुमित्रवंशरूपी कमल को प्रकाशित
करने मे सूर्यवत् मुनिसुव्रत जिनेश्वर हुए, जिनके द्वारा अश्व को
अवबोध हुआ और वह व्रती बना।
जहाँ श्रीमान् जरासन्ध, श्रेणिक, कोणिक, अभयकुमार,
मेघकुमार, हल्ल विहल्ल नन्दिषेण हुए। जम्बू स्वामी, प्रभव,
शय्यभवसूरि आदि मुनि और नन्दादि पतिव्रता स्त्रिया हुई।
यहाँ श्रीमहावीर प्रभु के ग्यारह गणधर पादपोपगमनपूर्वक
मोक्ष प्राप्त हुए। भगवान के ग्यारह गणधरो मे प्रभास नामक
गणधर ने यही जन्म लेकर इसे पवित्र किया था।
जहाँ श्री वीर प्रभु ने चौदह चातुर्मास किए, ऐसे नालदालकृत
स्थान वाली नगरी कैसे पावन नही है ? जहाँ के अनेक तीर्थ अशेष
नयनाभिराम और भव्यो को आनन्ददायक है वह नालंदा हमे
पावन करे।
रणाङ्गण मे शत्रुओ को अपने नाद से भगा देने वाला क्षेत्रपाल
मुख्य मेघनाद किन पुरुषो की इच्छा पूर्ण नही करता ?
कल्याणक स्तूप के पास जो गौतम स्वामी का मन्दिर है,
दर्शन मात्र से नमस्कार करने वाले प्राणियो की प्रीति को पुष्ट
करता है।
विक्रम संवत् १३६४ मे देवताओ द्वारा सेवित वैभारगिरि तीर्थ
का शिखर रूपी कल्पवृक्ष सेवा करने वालों को लक्ष्मी प्रदान करे।
वैभारगिरि के स्वामी का गुणसमूह कहने मे संलग्न श्री जिनप्रभ
सूरि की यह सूक्ति भक्तियुक्त धीरबुद्धिवाले मनुष्य इसके कोमल
और विशद पदो को पढे।
श्री वैभारगिरि महातीर्थ का कल्प ग्र० ३१ अक्षर २ मे है।