विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
३२ विविध तीर्थ-कल्प
प्रेत, शाकिनी प्रमुख क्षुद्रोपद्रव विशेष कर भव्य जीवो को पराभव
नही करते । सकल अतिशयो की निधान रूप यह नगरी है ।
यह अहिच्छत्रा नगरी का कल्प पद्मावती धरणेन्द्र और कमठ
के प्रिय श्री जिन प्रभुसूरि ने सक्षेप से वर्णन किया है ।
॥ अहिच्छत्रा-कल्प समाप्त हुआ ग्रथाग्र० ३६ ॥
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८. अर्बुदगिरि-कल्प
श्री आदिनाथ और नेमिनाथ अर्हन्तो को नमस्कार करके
अर्बुद महागिरि का कल्प लेशमात्र कहता हूँ । पहले श्रीमाता
देवी की उत्पत्ति यथाश्रुत कहूँगा, जिसके अधिष्ठान से यह पर्वत
पृथ्वी मे प्रख्यात हुआ है ।
श्री रत्नमाल नगर मे रत्नशेखर राजा हुआ, नि सन्तान होने
से दुखी हो उसने शाकुनिक लोगो को बाहर भेजा । उन्होने शिर
पर काष्ठ-भार लिए कष्टपूर्वक चलने में दुर्गत स्त्री को देख
कर राजा को बतलाया कि इसका पुत्र आपके पद पर राजा
होगा । राजा के आदेश से उन लोगो ने उस सगर्भा को मारने
के लिए गर्त मे डाल दिया । वह कार्यचिन्ता के बहाने उससे
बाहर निकली और उस भयार्त्ता ने पुत्र प्रसव कर झाडी मे रख
दिया । इस घटना से अज्ञात उन लोगो ने गर्त मे लाकर उसे
मार डाला ।
अर्बुदगिरि-कल्प ३३
पुण्ड से आकृष्ट होकर एक मृगी उस बालक को दोनो समय
स्तन पान करा देती। अन्यदा महालक्ष्मी ने टङ्कशाला मे मृगी
के चारो पैरो वाली नयी मुद्रा-नाणा की वृद्धि कर दी। यह सुन
कर जिगु रुप मे उत्पन्न होने की वार्त्ता फैल गई। कोई नया
राजा हुआ, सुन कर राजा ने सुभटो को भेजा, उन्होने उसका
वध करने के लिए आकर नगर के गोपुर मे उसे देखा और बाल-
हत्या से बचने के लिए गायो के झुण्ड के आने के मार्ग मे रख
दिया। उसके उसी प्रकार रहते भाग्यवश एक उक्षा—धान बटोर
ने वाली स्त्री के रूप मे शक्ति विशेष—आगे हो गई, उससे प्रेरित
हो पशुओ के बीच से उस शिशु को उठा कर रख लिया। यह
सुन कर मंत्री के समझाने से राजा ने उसे लेकर अपना औरस
पुत्र मान लिया।
क्रमशः वह श्रीपुञ्ज नामक राजा हुआ और उसकी पुत्री
श्रीमाता रूप सम्पन्न वानर जैसे मुख वाली हुई। वह जाति-
स्मृति प्राप्त वैराग्यवान्-निर्विषयी हुई। उसने अपने पिता से अपना
पूर्व भव निवेदन किया कि मै पहले वानरी थी और अर्बुदगिरि
की वृक्ष शाखा पर किसी ने मेरा शिरोच्छेद कर दिया। मेरा
रुण्ड वृक्ष के नीचे कुण्ड मे जा गिरा। उस अमित तीर्थ के प्रभाव
से मै नर देह धारिणी हुई। मेरा मस्तक आज जी उसी तरह है
अत मैं वानरमुखी हुई हूँ। श्रीपुञ्ज ने उसे अपने पुरुषो के साथ
भेज कर कुण्ड मे उसका मुख डुबाया, जिससे वह नरमुखी हो
गई और आबू पर तपश्चर्या करने लगी।
एक वार आकाशगामी योगी उसे देख कर रूपमुग्ध हो
गया। उसने आकाश से उतर कर प्रेमालाप पूर्वक कहा—शुभे!
तुम मुझे किस प्रकार वरण करोगी? उसने कहा—रात्रि का
प्रथम प्रहर जब तक कुर्कुट बोले उससे पहिले किसी विद्या से यदि
इस पर्वत-ह्रद पर मनोहर बारह सीढियाँ बना दो तो मैं तुम्हे
वरण करुँगी!
३
३४ विविध तीर्थ-कल्प
योगी ने अपनी विद्या से दो प्रहर मे वैसा कर दिया।
श्रीमाता ने अपनी शक्ति से बनावटी कुर्कुट शब्द किया और
उसके निषेध करने पर भी वह उसका छल जानता हुआ
विवाह के लिए ठहर गया। योगी ने नदी के किनारे विवाह
सामग्री सहित उसे बैठाया। श्रीमाता ने कहा—त्रिशूल छोड़ कर
विवाह करने के लिए मेरे पास बैठो ! वह वैसा ही करके बैठा तो
श्रीमाता ने कुत्ते लगा कर उसकी आंखो को विकृत कर दिया और
उसी की शूल से उसका हृदय वेध कर वध कर डाला। इस प्रकार
आजन्म अखण्ड शील पालन करके श्रीमाता स्वर्ग को प्राप्त हुई।
राजा श्री पुञ्ज ने उस शिखर पर उसका प्रासाद बनवाया।
छह महीनो के बाद अर्बुद नामक सांप पहाड़ के नीचे चलता
है जिसके पहाड कम्पन होता है इसी से सभी प्रासाद विना शिखर
के हैं। लौकिक मे भी कहते हैं कि—
पहले यह हिमाचल का पुत्र नन्दिवर्द्धनगिरि था, कालान्तर मे
अर्बुदनाग का अधिष्ठान होने से "अर्बुद" नाम हो गया। इस
पर धनवानो के बारह गाँव बसते हैं। गोग्गलिक तापस और
राष्ट्रीय लोग मे हजारो हैं। न तो ऐसा वृक्ष है न वल्ली, न पुष्प,
न कन्द और न फल है एवं न ऐसी खान है जो यहाँ न देखी
जाती हो। यहाँ प्रदीप्तिमान् महौषधियाँ हैं जो रात्रि मे ज्वाज्ज्व-
ल्यमान रहती हैं। सुगन्धित और रसाढ्य दोनो प्रकार के वन हैं।
स्वच्छद छलकती हुई स्वच्छ लहरो वाली मन्दाकिनी नदी
है जिसके तट पर फूलो के वृक्ष हैं और पिपासुओ को तृप्त—
आनन्दित करने वाली सुशोभित है। इस गिरिराज के हजारो
उत्तुंग शिखर प्रकाशित है जहाँ सूर्य का रथ-सारथी भी क्षण
मात्र स्खलित हो जाता है। चण्डाली-वज्र-तैलेभ कन्दादि कन्दो
की जातियाँ उन-उन कार्यों को सिद्ध करने वाली पद-पद पर
देखी जाती हैं। यहाँ के आश्चर्यजनक कुण्ड, धातु-खाने तथा
अर्बुदगिरि-कल्प ३५
अमृत जल वाले झरणो के कारण यह समृद्ध प्रदेश है। कोयल के
उच्च स्वर से कूकने पर शीघ्र कोकूयित कुण्ड से खल-खल गब्द
करता हुआ जल का प्रवाह प्रादुर्भूत होता है।
श्रीमाता, अचलेश्वर, वशिष्ठाश्रम आदि लौकिक तीर्थ और
मन्दाकिनो आदि भी है। इस महागिरिराज के नेता परमार
नरेश्वर हैं जिनकी राजधानी चन्द्रावती नगरी लक्ष्मी की निधान
है। विमलबुद्धिकलित विमल दण्डनायक ने यहाँ ऋषभदेव
भगवान की पित्तलमय प्रतिमावाला चैत्य बनवाया। उसने चम्पक
वृक्ष के सान्निध्य मे पुत्र सम्पदा एवं तीर्थोद्धार की वाञ्छा से
भगवती अम्बा की आराधना करके श्रीमाता के मन्दिर के पास
पुष्प-मालादि से रुचिर और गोमय गोमुख देखकर वहाँ शुल्क
देकर जमीन ग्रहण की। गुर्जरेश्वर पर क्रुद्ध राणा श्री धाधूक
को भक्ति से प्रसन्न कर चित्रकूट से लाकर उसके वचनो से विक्रम
स० १०८८ मे प्रचुर द्रव्य व्यय द्वारा उसने "विमल वसति"
नामक उत्तम प्रासाद बनवाया। यहाँ बहुत प्रकार से पूजित
अम्बिका देवी यात्रागत सघ के गहन विघ्नो का नाश करती है।
युगादिदेव के चैत्य के सामने यहाँ एक रात्रि मे शिल्पी ने पाषाण-
मय घोडा घढ कर तैयार किया।
विक्रम संवत् १२८८ मे सचिवो मे चन्द्र के समान तेजपाल ने
लूणिगवसही नामक नेमिनाथमन्दिर का निर्माण कराया। श्री
स्तम्भतीर्थ मे निष्पन्न कसौटी का नेत्रामृताञ्जन बिम्ब तेजपाल
मन्त्री ने वहाँ स्थापित किया। उसने श्री सोम दिग्पाल के निर्देग
से अपने पूर्णजो की मूर्तियाँ हस्तिगाला मे विराजमान की।
अहो ! सूत्रधार शिरोमणि शोभन देव् ने इस चैत्य गिल्प की
रचना से अपना नाम सार्थक कर दिया। इस अर्बुद के अनुज
मैनाक पर्वत की समुद्र ने वज्र से रक्षा की और इसने भवदण्ड से
मन्त्रीश्वरो की रक्षा की।
३६ विविध तीर्थ-कल्प
दैवात् म्लेच्छो द्वारा दोनो तीर्थो के भग्न कर देने पर भी
इसका उद्धार शक सवत् १२४३ (वि० स० १३७८) मे करवाया ।
प्रथम तीर्थ का उद्धार महण सिंह के पुत्र लल्ल ने और दूसरे का
चण्ड सिंह के पुत्र पीथड ने करवाया । चालुक्य कुल चन्द्रमा
कुमारपाल भूपाल ने इसके ऊँचे शिखर पर श्री वीर चैत्य का
निर्माण कराया ।
उन-उन औषधियो से पूर्ण और उन-उन कौतुहलो से भरे हुए
अनेक तीर्थो से पवित्रित इस अर्बुदगिरि के दर्शन धन्य जन ही
करते हैं ।
श्री जिन प्रभसूरि ने श्रोत्रसुधाकल्प यह श्रीमद् अर्बुद कल्प
बनाया है, चतुर जन इसका परिचय प्राप्त करे ।
श्री अर्बुद कल्प समाप्त हुआ । ग्रथा ग्र० ५२ अक्षर १२ हैं ।
९. मथुरापुरी-कल्प
जगत मे शरण्यभूत सातवे और तेईसवे जिनेश्वर को नमस्कार
करके भव्य जनो को मगल कारी मथुरा-कल्प कहूँगा ।
सुपार्श्वनाथ भगवान के तीर्थ मे वर्त्तमान धर्मरुचि और धर्म
घोष नामक दो मुनिवर्य सिंह के सदृश निस्सग थे ।
वे मुनिराज छट्ठ, अट्ठम, दशम, द्वादशम, पक्षोपवास और
मास, दो मास और चार मासक्षमण की तपश्चर्या करते हुए,
भव्यजीवो को प्रतिबोध करते हुए किसी समय मथुरा नगरी मे
मथुरापुरी-कल्प ३७
विचरे। उस समय मथुरा नगरी बारह योजन लम्बी और नौ
योजन विस्तीर्ण एव पार्श्व स्थित यमुना नदी के जल से प्रक्षालित
प्रकार विभूषित धवलगृह, देवकुल, वापी, कूप, पुष्करिणी,
जिनभवन और हाटो से सुशोभित थी। वहाँ विविध चारो विद्याओ
को पढने वाले ब्राह्मणो का समूह था।
वहाँ वे मुनिराज अनेक फल फूलो से लदे हुए भूतरमण नामक
उपवन मे अवग्रह लेकर उपवास करके वर्षकाल—चातुर्मास स्थित
रहे। उनके स्वाध्याय, तपश्चरण और प्रशमादि गुणो से आवर्जित-
आकृष्ट उपवन स्वामिनी कुबेरा देवी ने रात्रि मे प्रकट होकर
कहा—भगवन्! आपके गुणो से मै अत्यन्त प्रसन्न हूँ, कुछ वर
माँगिए। मुनिराजो ने उसे—हम निस्सग हैं, हमें कुछ नही चाहिए।
कहते हुए—धर्म सुनाकर अविरति श्राविका बनायो।
अन्यदा कार्त्तिक शुक्ल अष्टमी की रात्रि मे मुनिराजो ने कुवेरा
देवी से कहा—तुम शय्यातर हो, हे श्राविके! तुम दृढ सम्यक्त्व
वाली हो, अत जिन वन्दन, पूजन मे प्रवृत्त रहना। वर्त्तमान योग
से चातुर्मास करके पारणे के लिए हम अन्य गाँवो मे विचरण
करेंगे। देवी ने शोकपूर्वक कहा—भगवन्! आप सर्वदा इसी
उपवन मे क्यो नही रहते। साधुओ ने कहा—
"श्रमणो, पक्षियो, भ्रमरो, गोकुल, चतुष्पदो, पासा सारी और
मेघ का निवास अनियत होता है।"
उसने प्रार्थना की—यदि ऐसा है तो धर्म कार्य कहिए, जिसे
मैं सम्पादन करूँ, क्योकि देवदर्शन अमोघ होता है। साधुओ ने
कहा—यदि ऐसा ही आग्रह है तो हमे सघ के साथ मेरुपर्वत ले
जाकर चैत्यो की वन्दना कराओ। देवी ने कहा—मैं आप दोनो
को देव-वन्दन करा दूगी। मथुरा सघ चलने से अन्तराल मे कोई
मिथ्यादृष्टि देव विघ्न करेगे। साधुओ ने कहा—हमने आगम वल
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से मेरु देखा है, यदि संघ को ले जाने की तुम्हारी गक्ति न हो तो
केवल हम दोनो तो वहाँ जाने से रहे।
देवी ने उदास होकर कहा—यदि ऐसा है तो मैं यही प्रतिमाओ
से शोभित मेरु पर्वत का आकार बना दूंगी। जहाँ आप संघ सहित
देववन्दन करें। साधुओ ने स्वीकार किया। देवी ने कंचन घटित,
रत्न मण्डित, अनेक सुर परिवृत, तोरण-ध्वज-मालालंकृत शिखर
व छत्रत्रय शाली स्तूप रात्रि में निर्माण किया। वह स्तूप मेखला-
त्रय मण्डित था, एक-एक मेखला में चारो दिशाओ मे पंच वर्ण
रत्नमय बिम्ब थे। उस स्तूप पर मूल प्रतिमा श्री सुपार्श्वनाथ
स्वामी की प्रतिष्ठापित थी।
प्रातः काल लोगो को मालूम हुआ तो उस स्तूप को देखकर
वे परस्पर कलह करने लगे। कोई कहता ये वासुकि लक्षण युक्त
स्वयम्भूदेव हैं, कोई उसे शेष शय्या स्थित नारायण एवं ब्रह्मा,
धरणेन्द्र, सूर्य चन्द्रादि बतलाया, बौद्ध कहते ये स्तूप नही पर
“बुद्धडउ” है। तब मध्यस्थ पुरुपो ने कहा—कलह मत करो, ये
जिस देव ने निर्मित किया है, वही सगय दूर करेंगे। अपने-अपने
देवो को पट पर चित्र-आलेखित कर अपनी गोष्ठी सहित रहे।
जिनका देव होगा उसी का एक पट रहेगा, दूसरे देवो के पट नष्ट
हो जायेंगे। संघ ने भी सुपार्श्वनाथ भगवान का पट लिखा।
सभी लोग अपने-अपने देवो के पट गोष्ठी सहित पूजा करके नवमी
की रात्रि मे सर्व दर्शनी लोग गाते हुए स्थित रहे। आधी रात के
समय तृण-धूलि और पत्थर युक्त उद्दण्ड तूफान चलने लगा जिससे
सभी पट टूट कर उड़ गए। प्रलय गर्जारव से लोग दगो-दिग
पलायन कर गए। एक सुपार्श्वनाथ भगवान का पट स्थित रहा।
लोक विस्मित हुए और “ये अरिहन्त देव हैं”—कहने लगे। उस
पट को सारे नगर में घुमाया, पट-यात्रा प्रवर्तित हुई।
मथुरापुरी-कल्प ३९
उसके बाद न्हवण प्रारम्भ हुआ। प्रथम न्हवण के लिए
श्रावक लोग कलह करने लगे। प्रतिष्ठित लोगो ने यह व्यवस्था
की—जिसके नाम का गोलक (चिट्ठी) कुमारी कन्या के हाथ में
प्रथम आवेगा वह चाहे दरिद्र हो धनाढ्य प्रथम न्हवण करावेगा।
दशमी की रात्रि मे यह व्यवस्था हुई। ग्यारस के दिन दूध, दही,
घृत, कुंकुम, चन्दनादि से हजार कलशो से श्रावकों ने न्हवण
कराया। देवताओ ने प्रच्छन्न स्थित रहकर न्हवण कराया,
आज भी वे उसी प्रकार यात्रार्थ आते हैं।
क्रमश सभी के द्वारा न्हवण कराने पर पुष्प, धूप, वस्त्र,
महाध्वज, आभरणादि चढ़ाए गए। साधुओ को वस्त्र, घृत,
गुडादि दिया। बारहवी रात्रि मे माला चढाई गयी। इस प्रकार
वे मुनिराज देववन्दन कर सकल सघ को आनन्दित कर पारणा
करके अन्यत्र चातुर्मास के लिए तीर्थ प्रकट कर क्रमशः कर्मों का
नाश कर सिद्धि प्राप्त हुए, वहाँ सिद्ध क्षेत्रतीर्थ हुआ।
मुनिराजो के वियोग से दुखित देवी ने नित्य देव-पूजा-रत अर्द्ध-
पल्योपम का आयु पूर्ण कर च्यवकर मनुष्यत्व पाया और उत्तम
पद प्राप्त किया। उसके स्थान पर जो-जो उत्पन्न होती है वह
'कुवेरा' नाम से प्रसिद्ध होती हैं। उसके द्वारा परिरक्षित स्तूप
चिरकाल—पार्श्वनाथ स्वामी के उत्पन्न होने तक खुला रहा।
इसके बीच मथुरा के राजा ने लोभ के वशीभूत होकर आदमी को
बुला कर कहा कि इस स्तूप का स्वर्ण और रत्न निकाल कर मेरे
भण्डार मे रखो। लोग लोहे के कुदालो से स्तूप पर आघात करने
लगे पर उनके घाव उस पर न लग कर स्वय घातको पर लगने
लगे। तब प्रतीतिहीन राजा ने स्वयं कुहाड़े की चोट दी, कुहाडा
ने उछलकर राजा के मस्तक को छिन्न कर डाला। तब कोपाय-
मान देवी ने प्रकट होकर लोगो के कहा—अरे पापियो ! यह
क्या काम प्रारंभ किया है, राजा की तरह तुम लोगो को भी मरना
४० विविध तीर्थ-कल्प
है ? भयभीत लोगो ने हाथ मे धूप लेकर देवी से क्षमा याचना
की । देवी ने कहा—जो जिनालय पूजेगा उसके उपद्रव दूर
करूंगी। जो जिन प्रतिमा या सिद्धालय की पूजा करेगा उसी का
घर स्थिर रहेगा अन्यथा गिर जायगा ।
यही से मंगल चैत्यो की प्ररूपणा हुई, ऐसा छेद ग्रंथ वृहत्कल्प
मे मथुरा के भवनो का निदर्शन किया है ।
यहाँ प्रतिवर्ष जिन पटह की नगरमे यात्रा-भ्रमण कराना व
कुहाड छट्टी मनाना एव यहाँ जो भी राजा हो उसे जिनप्रतिमा
प्रतिष्ठित कराके भोजन करना, अन्यथा वह जीवित नही रहेगा ।
देवी की इस आज्ञा को लोगो ने पालन करना प्रारंभ कर दिया ।
एक बार पार्श्वनाथ स्वामी केवली अवस्था मे विचरते हुए
मथुरा नगरी पधारे । समवशरण मे धर्मोपदेश देते हुए दूषम
काल के भविष्य को उन्होने प्रकाशित किया । भगवान के अन्यत्र
पधार जाने पर देवी कुबेरा ने लोगो को पुकार कर कहा—"प्रभु ने
दूषम काल निकट बतलाया है । लोग व राजा लोभ ग्रस्त होगे, मैं
भी प्रमादी हूँ और चिरायु नही अत. इस खुले स्तूप की सर्वकाल
रक्षा नही करने सकूँगी । सघादेश से मै इसे ईंटो से ढँक दूँगी,
तुम लोग शैलमय पार्श्वनाथ स्वामी की बाहर से पूजा करना ।
मेरे स्थान मे दूसरी जो भी देवी होगी, वह अभ्यन्तर की पूजा
करेगी । सघ के मानने पर देवी ने वैसा ही कर दिया ।
भगवान महावीर के निर्वाण को तेरह सौ से अधिक वर्ष
बीतने पर बप्पभट्टिसूरि उत्पन्न हुए, उन्होने इस तीर्थ का उद्धार
किया, पार्श्वनाथ भगवान को पूजवाया । शास्वत पूजा करने के
लिए कानन, कूप और कोट करवाया । चौरासी • दिलाइ ।
• सघ ने ईंटें खिसकती•हुई ज्ञात कर उखडे जाते स्तूप को
पत्थरो से मढने के विचार से खोलना प्रारंभ किया तो देवी ने
स्वप्न मे स्तूप को खोलना मना किया । तब देवी के वचनो से
स्तूप को बिना खोले सुघटित पत्थर जड़ कर जीर्णोद्धार किया
गया। आज भी देवो द्वारा यह महास्तूप रक्षित है, देउल मे हजारो
प्रतिमाएँ है, आवासानिक प्रदेग मे मनोहर गन्धकुटी मे चिल्लणिका
अम्बा और अनेक क्षेत्रपालादि सयुक्त यह जिनभवन विराज-
मान है।
इस नगरी मे भावी तीर्थंकर श्री कृष्ण वासुदेव का जन्म
हुआ। यहाँ आर्य मगू तथा हुडिक यक्ष—जो चोर का जीव यक्ष
हुआ था—का देव कुल है।
यहाँ पाँच स्थल हैं, यथा—१ अर्क स्थल, २ वीर स्थल,
३. पद्म स्थल, ४ कुश स्थल, ५ महा स्थान। एव बारह वन इस
प्रकार हैं—१. लोहजघ वन, २ मधुवन, ३. विल्व वन, ४ ताल
वन, ५ कुमुदवन, ६ वृन्दावन, ७ भण्डीर वन, ८ खदिर वन,
९ कामिक वन, १० कोल वन, ११ बहुलावन, १२ महावन।
यहाँ पाँच लौकिक तीर्थ हैं, यथा—१ विश्रान्तिक तीर्थ,
२ असिकुण्ड तीर्थ, ३ वैकुण्ठ तीर्थ, ४ कालिंजर तीर्थ, ५ चक्र
तीर्थ।
शत्रुञ्जय मे ऋषभदेव, गिरनार पर नेमिनाथ, भरौंच मे
मुनि सुव्रत, मोढेरा मे महावीर और मथुरामे सुपार्श्व—पार्श्व को
दो घडी के भीतर वन्दन कर सोराष्ट्र के ढुठण मे विहार कर के
जो ग्वालियर मे आहार करते थे उन आमराय सेवित चरण-
कमल श्री वप्पभट्टि सूरि जी महाराज ने वि० स० ८२६ मे मथुरा
मे श्री महावीर भगवान का विम्ब स्थापित किया।
यहाँ श्री वीर वर्द्धमान स्वामी के जीव विश्वभूति ने अप-
रिमित वल प्राप्ति का नियाणा किया था। यहाँ यमुना वंकयमुन
राजा के द्वारा निहित दण्ड अणगार के केवल ज्ञान उत्पन्न होने
पर महिमा करने के लिए इन्द्र आया था।
४२ विविध तीर्थ-कल्प
यहाँ जितशत्रु राजा के पुत्र कालवेणिक मुनि ने अर्ण रोगार्त्त
स्वदेह मे पुद्गलगिरि पर निष्प्रभ उपसर्ग सहन किया था।
यहाँ शंख राजर्षि के तप प्रभाव को देख सोमदेव द्विज गजपुर
नगर मे दीक्षा लेकर स्वर्ग जाकर काशी मे हरिकेश वल ऋषि
देव पूज्य हुआ।
यहाँ उत्पन्न राजकन्या निवृत्ति राघविध द्वारा सुरेन्द्र दत्त को
स्वयंवरा हुई।
यहाँ कुवेरदत्ता ने माता कुवेर सेना और भाई कुवेरदत्त को
अवधि ज्ञान द्वारा अठारह नातो के सम्बन्ध बता कर प्रतिवोध
दिया।
यहाँ श्रुतसागर पारगामी आर्य्य मगु ने ऋद्धिगारव, रस
गारव, शाता गारव से यतत्व प्राप्त कर साधु को अप्रमादी करने
के लिए जिह्वा प्रसारित कर प्रतिवोध दिया।
यहाँ सबल कबल नामके वछडे सेठ जिनदास के ससर्ग से
प्रतिवोध पाकर नागकुमार देव हुए और भगवान महावीर के
नौकारूढ होने पर उपसर्ग निवारण किया।
यहाँ अन्निका पुत्र ने पुष्पचूल को प्रवर्जित कर ससार समुद्र
से पार किया।
यहाँ गवाक्ष स्थित मिथ्यादृष्टि इन्द्रदत्त पुरोहित को—नीचे
मार्ग मे चलते हुए साधु के मस्तक पर पाँव करने पर—श्रावक ने
गुरुभक्तिवश पंगु कर दिया था।
यहाँ भूतगृह स्थित निगोद स्वरूप व स्व आयु पूछ कर सन्तुष्ट
चित्त शक्रेन्द्र ने आर्य्यरक्षित सूरि को वन्दन किया। उपाश्रय के
द्वार को अन्य दिशा मे कर डाला।
यहाँ वस्त्र पुष्यमित्र, घृत पुष्यमित्र और दुर्वलिक पुष्यमित्र
लब्धि-सम्पन्न विचरे। यहाँ बारह वर्ष व्यापी दु सह दुष्काल
मधुरापुरी-कल्प ४३
व्यतीत होने पर सकल सघ को एकत्र कर स्कदिलाचार्य ने
आगमानुयोग-वाचना प्रवृत्त की ।
यहाँ देव-निर्मित स्तूप के समक्ष पक्षक्षमणपूर्वक देवता को
आराधना कर जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ने दीमक भक्षित त्रुटित
पाठ भग्न महानिशीथ सूत्र ग्रंथ को परिपूर्ण किया ।
यहाँ साधुओ के तपश्चरण से सन्तुष्ट शासन देवी ने तद्दर्शनिक
परिगृहीत तीर्थ को सघ के वचनानुसार जैनो को दिलाया । पीछे
देवी ने लोगो की लोभवृत्ति ज्ञातकर स्वर्णमय स्तूप को प्रच्छन्न
करके ईंटो का बना दिया । श्री वप्पभट्टिसूरि के वचनो से आम
राजा ने उसे प्रस्तर शिल्प से मण्डित कराया ।
यहाँ शख राजा और कलावती ने पाँचवे जन्म देवसिंह-कनक-
सुन्दरी नाम के श्रमणोपासको ने राज्यलक्ष्मी का उपभोग किया ।
इस प्रकार अनेक प्रकार के सविधान वाला इस नगरी का
उत्पत्ति-इतिहास है । यहाँ नरवाहना कुबेरा, सिंहवाहिनी
अम्बिका व श्वानवाहन क्षेत्रपाल तीर्थ की रक्षा करते है ।
इस प्रकार श्री जिनप्रभ सूरि ने इस मथुरा-कल्प का कुछ
वर्णन किया । इह लोक-परलोक के सुखार्थी भव्यजन इसे पढे ।
मथुरा तीर्थ की यात्रा से जो पुण्य-ऋद्धि फल प्राप्त होता है
वही इस कल्प को तल्लीनतापूर्वक सुनने से होता है ।
श्री मथुरा-कल्प समाप्त हुआ । इसकी श्लोक सख्या ११३
और २९ अक्षर हैं ।
१०. अश्वावबोध तीर्थ-कल्प
मात्र परोपकार रसिक, श्याम कान्ति वाले श्री मुनिसुव्रत
जिनेश्वर को नमस्कार करके मैं श्री अश्वावबोध तीर्थ का कल्प
सक्षेप से कहता हूँ ।
श्री मुनिसुव्रत स्वामी केवल ज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात्
विचरते हुए एकवार पैठानपुर (पैठण) (प्रतिष्ठानपुर) से एक
रात्रि मे साठ योजन उल्लघन करके जितशत्रु राजा के अश्वको
प्रतिबोध देने के लिए लाट देग मडन नर्मदा नदी अलकृत भरुअच्छ
(भरोच) नगर के कोरिंट वन में पहुँचे । जितशत्रु ने अपने प्रारभ
किए हुए अश्वमेध यज्ञ में अपने सर्वलक्षणसम्पन्न अश्व को होम-
ने की इच्छा की थी । अत आर्त्तध्यान के द्वारा दुर्गति मे न जाय
इसीलिए भगवान उसे प्रतिबोध देने के लिए पधारे थे । उन्हे वन्दन
करने के लिए लोग समवशरण मे आये, राजा भी गजारूढ होकर
आया और भगवान को वदन किया । इसके बाद अश्व भी अपने
साथ चलने के लिए नियुक्त पुरुषो के साथ स्वेच्छा से विचरता
हुआ समवशरण मे आया और स्वामी का अनुपम रूप देखकर
निश्चल खडा हो गया । उसने धर्म-देशना सुनी, प्रभु ने उसे पूर्व
भव इस प्रकार कहा—
पूर्व भव मे मैं इसी जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षे त्र के पुष्कल
विजय की चम्पा नगरी मे सुरसिद्ध नामक राजा था । तुम मेरे
परम मित्र मतिसार नामक मत्री थे । मैं नन्दन गुरु के चरणो मे
प्रव्रजित होकर प्राणत कल्प-देवलोक मे गया । वहाँ बीस सागरो-
पम की आयु पूर्ण की, वहाँ से च्यव कर तीर्थंकर हुआ हूँ । तुम
नरायु बाँधकर भारत वर्ष के पद्मिनीखंड नगर मे सागरदत्त नामक
सार्थवाह हुए। तुम विनीत परन्तु मिथ्यादृष्टि थे। एक वार तुमने
शिवायतन बनवाया, उसमे पूजा के लिए वगीचा भी लगाया और
एक तापस को उसकी सार संभाल के लिए नियुक्त कर दिया।
गुरु के आदेश से तुम सभी क्रिया कलाप करते हुए काल निर्गमन
करते थे। जिनधर्म नामक श्रावक के साथ तुम्हारी गाढ मित्रता
हो गई। एक वार तुम उसके साथ साधुओ के पास गए। उन्होने
देशना के पश्चात् कहा—“जिसने अगूठे के पैरवे जितनी भी
जिनेश्वर भगवान की प्रतिमा बनवायी है उसने निश्चित ही नरक-
तिर्यंच गति के द्वार के अर्गला लगा दी है।”
तुम ऐसा सुनकर घर आये और सोने की जिनप्रतिमा
बनवायी। उसकी प्रतिष्ठा करवा के तुमने त्रिकाल पूजा करना
प्रारंभ कर दिया। एक वार माघ-मास मे लिंगपूरण पर्वाराधन के
के लिए तुम शिवायतन गये तब जटाधारी ने चिरसचित घृत के
घडे लिंग-पूरणार्थ निकाले। उनमे लगी घृतेलिकाओ को तापस के
द्वारा निर्दयता पूर्वक पाँवो से मसले जाते देख कर तुम शिर धुनते
हुए कहने लगे—ये दर्शनी लोग भी इतने निर्दयी हैं तो हमारे जैसे
गृहस्थ विचारे क्या जीवदया पालेगे ? फिर तुमने अपने वस्त्राञ्चल
से प्रमार्जन करना प्रारंभ किया। जटी ने तुम्हे फटकारते हुए
कहा—'अरे धर्म संकर ! कायर ! तुम अरहन्त-पाखण्डियो द्वारा
विडम्बित हो !' तब ऐ तुम सव धर्मो से विमुख हो गए। निर्दयता
पूर्वक धर्म रसिक लोगो को हँसते हुए मायारंभ से तुम तिर्यंचायु
बाँधकर भव भ्रमण करते हुए राजा के वाहन अश्व हुए। तुम्हे
प्रतिबोध देने के लिए ही हमारा यहाँ आगमन हुआ है।
स्वामी के ऐसे वचनो को सुनकर उस घोडे को जाति स्मरण
हो गया। उसने सम्यक्त्व मूल श्रावक धर्म स्वीकार कर सचित्त
का त्याग कर दिया और प्रासुक जल व सूखा घास ग्रहण करने
लगा। छह मास पर्यन्त इन नियमो का पालन करते हुए मरके
सौधर्म कल्प मे महर्द्धिक देव हुआ। उसने अवधि ज्ञान से अपना
पूर्व भव ज्ञात कर भगवान के समवगरण स्थान रत्नमय चैत्य
कराया। उसमे भगवान मुनिमुव्रत स्वामी की प्रतिमा और अपना
भी अश्वरूप स्थापित कर वह देवलोक में लौट गया। तब से
अश्वाववोध तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। वह देव यात्री सघ के विघ्न दूर
कर तीर्थ को प्रभावना करता हुआ मानव भव प्राप्त कर यथा-
समय मोक्ष जावेगा।
कालान्तर मे वह तीर्थ गमलिका विहार नाम से प्रसिद्ध
हुआ। कैसे ? यह बतलाते है। इसी जम्बू द्वीप के सिंहल द्वीप
मे रत्नासय देश के श्रीपुर नगर मे चन्द्रगुप्त नाम का राजा
था, उसके चन्द्रलेखा भार्या थी। रानी के सात पुत्रो के वाद नर-
दत्ता देवी की आराधना से सुदर्शना नामक पुत्री हुई। उसने
समस्त कला और विद्याओ का अध्ययन कर तरुणावस्था प्राप्त
की। एक दिन वह राज-सभा मे पिता के गोद मे बैठी थी तब
धनेश्वर नामक एक व्यापारी भरौच से आया। वैद्य से पास रही
हुई कटुक गन्ध के प्रभाव से छीकते हुए उसने “णमो अरहंताण”
उच्चारण किया जिसे सुनकर राजकुमारी मूर्च्छित हो गई, वणिक
पीटा गया। सचेत होकर जाति-स्मरण प्राप्त राजकुमारी अपने
धर्म-बन्धु को देख कर प्रमुदित हुई। राजा द्वारा मूर्च्छा का कारण
पूछने पर उसने कहा—
मैं पूर्वजन्म मे भरुअच्छ मे नर्मदा तट पर कोरिट वन स्थित
-वट वृक्ष पर शमली-पक्षी थी। प्रावृप काल मे सात रात्रि तक महा-
वृष्टि हुई, आठवें दिन नगर मे क्षुधातुर भ्रमण करते हुए मैं व्याध
के गृहाङ्गण से मास-पिण्ड ले उडी। पीछा करते हुए व्याध ने
अश्वाववोध तीर्थ-कल्प ४७
मुझ वट-शाखा पर बैठी हुई को तीर से वींध डाला और मुह से
गिरे हुए मास-पिंड व तीर को लेकर व्याध अपने स्थान चला
गया। मुझे करुण चीत्कारपूर्वक बिलबिलाते-छटपटाते हुए देखकर
एक आचार्य महाराज ने जलपात्र से पानी छींट कर नवकार मन्त्र
सुनाया। मैंने श्रद्धा की और मरकर आपकी पुत्री हुई हूँ।
तब से वह राजकुमारी विषयला विरक्त हो गई और माता-
पिता को पूछ कर उसी श्रावक के साथ सात सौ जहाजो को
लेकर भरौंच के लिए रवाना हो गई। उनमे १०० जहाज वस्त्र,
१०० जहाज द्रव्य निचय, अगर-चन्दन, धान्य, जल, ईंधन, नाना
पक्वान्न, फल, प्रहरणादि के कुल छ सौ जहाज थे, पचास जहाजो
मे शस्त्र घर व पचास मे भेंट प्राभृत थी। इस प्रकार सात सौ
वाहन युक्त वह भरौंच के समुद्र तट पर पहुँची। राजा ने वाहन
समूह को देख कर सिंहल नरेश की चढाई की आशंका से नगर
क्षोभ को दूर करने के लिए सेना को सुसज्जित किया और भेट-
४८ विविध तीर्थ-कल्प
उत्तर श्रेणी मे सुरम्या नामकी नगरी मे विद्याधरेन्द्र सख नामका
राजा था जिसकी तुम विजया नामक पुत्री थी एक वार दक्षिण
श्रेणी के महिस ग्राम मे जाते हुए तुमने नदी तट पर कुक्कुट सर्प
देखा और उसे रोष वश मार डाला । वहाँ नदी तट पर स्थित
जिनायतन देखकर तुमने अत्यन्त भक्ति पूर्वक भगवान के दर्शन
किये जिससे परम आनन्द हुआ । मन्दिर से बाहर निकलते तुमने
मार्गश्रम से खिन्न एक साध्वी को देखा । उनकी चरण-वन्दना
कर धर्म श्रवण किया । तुम भी उसकी विश्रामणादि द्वारा सुश्रुषा
करके देर से घर आई । क्रमशः तुम आर्त्त ध्यान से मर के
कोरिष्टक वन मे शमली हुई । वह कुक्कुट सर्प मर के व्याध हुआ
और पूर्व भव के वैर से उसने तुम्हे शमली के भव मे बाण से
मारा । पूर्व भव मे जिन भक्ति और ग्लान साध्वी की सुश्रुषा के
कारण तुम अन्त मे वोध प्राप्त हुई और जिनप्रणीत दानादि धर्मा-
चरण कर रही हो । “इस प्रकार गुरु-महाराज के वचनो को
श्रवण कर सुदर्शना अपने समस्त द्रव्य को सात क्षेत्रो मे व्यय
करने लगी । चैत्योद्धार कराया, चौवीस देव कुलिकाए, पौषध-
शाला, दानशाला, अध्ययनशालाएं कराईं । अत. वह तीर्थ पूर्व
भव के नाम से “शमलिका विहार” कहलाया । अन्त मे उसने
द्रव्य भाव से संलेखना पूर्वक अनशन किया और मिती वैशाख
शुक्ल ५ को ईशान देव लोक प्राप्त हुई ।
श्री मुनिसुव्रत भगवान के मोक्ष जाने के पश्चात् ग्यारह लाख
चौरासी हजार चार सौ सत्तर वर्ष बीतने पर विक्रमादित्य संवत्सर
प्रवृत्त हुआ । पुन मुनिसुव्रत स्वामी के जीवितकाल (की तत्कालीन
गणना) से ग्यारह लाख पचानवें हजार मे अट्ठाईस वर्ष न्यून
समय के वर्ष मे विक्रमादित्य होगा । यह शमली विहार की उत्पत्ति
हुई ।
भरु अच्छ (भृगुकच्छ-भरोच) मे अनेक लौकिक तीर्थ भी है ।
वैभारगिरि-कल्प ४९
क्रमश उदयन के पुत्र वाहडदेव ने शत्रुञ्जय-प्रासाद का उद्धार
कराया । उसके अनुज अम्बड़ ने अपने पिता के पुण्यार्थ 'शमली
विहार' का उद्धार कराया । मिथ्यादृष्टि सिन्धवा देवी ने प्रासाद
शिखर पर नाचते हुए अम्बड को उपसर्ग किया जिसे आचार्य
श्री हेमचन्द्र सूरि ने अपने विद्याबल से निवारण किया ।
अश्वावबोध तीर्थ का यह कल्प सक्षेप से श्री जिनप्रभसूरि ने
रचा है, भव्य जन इसे त्रिकाल पढें ।
॥ अश्वावबोध तीर्थ कल्प समाप्त हुआ । यह ८२ श्लोक और
अक्षर २० का है ॥
११. वैभारगिरि-कल्प
श्री जिनप्रभसूरि द्वारा वैभारगिरि का यह कल्प सक्षिप्त रुचि
वालो की सतुष्टि के लिए स्तवन के रूप मे बनाया जाता है ।
वैभारगिरि के गुण-प्राग्भार वर्णन करने मे बुद्धि से परिपूर्ण
भारती भी समर्थ नही है वहाँ हम कौन चीज है ?
जड-(बुद्धि) होते हुए भी हम तीर्थ की भक्ति रस-सिक्त गुणो से
युक्त उस सुशोभित तीर्थराज की किञ्चित् स्तवना करते हैं ।
यहाँ दारिद्रयविद्राविका रसकूपिका, गरम और ठण्डे पानी के
कुण्ड किसे कौतूहलपूर्ण नही करते ? यहाँ त्रिकूट खण्डिकादि
शिखर एव करण ग्राम के अवशेष घर और वन प्रकाशित हैं ।
४
५० विविध तीर्थ-कल्प
विविध व्याधियो को नष्ट करने के गुणयुक्त औषधियाँ,
मनोहर जल वाले ह्रद एव सरस्वती आदि पुण्यसलिला नदियाँ
यहाँ हैं।
यहाँ बहुधा मगधालोचनादि लौकिक तीर्थ हैं। यहाँ के चैत्यो
मे अर्हन्त भगवान की प्रतिमाएँ और खण्डित-भग्न मूर्त्तियाँ भी हैं।
जो मेरु पर्वत के चारो उद्यानो की पुष्प सख्या जानते हैं वे ही
यहाँ के सर्व तीर्थों की जानकारी बता सकते हैं।
श्रो गालिभद्र-धन्ना ऋषि ने यहाँ तप्त शिलाओ पर कायोत्सर्ग
किया, उन्हे देखने से पुरुषो के पाप नष्ट हो जाते हैं।
यहाँ सिंह, गार्दूल, भालू भेड़िये आदि तीर्थ के माहात्म्य से
कभी भी उपद्रव नही करते ।
यहाँ बौद्ध विहार भी प्रति प्रदेश मे देखे जाते हैं। यहाँ उन
महर्षियो ने आरोहण कर निर्वाण प्राप्त किया था।
यहाँ जो दुर्गम अन्धेरी गुफा है, सुना जाता है कि यहाँ पूर्व
काल मे रोहिणेय चोर आदि वीरो का निवास रूप था।
राजगृह के प्राचीन नामादि
इसकी उपत्यका मे राजगृह नगर सुशोभित है, जिसके क्षिति-
प्रतिष्ठादि नाम जब तब हुए हैं। क्षितिप्रतिष्ठ, चणकपुर,
ऋषभपुर, कुशाग्रपुर नामो के पश्चात् क्रमश राजगृह नाम हुआ।
यहाँ नयनो को शीतल करने वाला गुणशिल चैत्य था जहाँ
भगवान महावीर स्वामी का समवशरण होता था।
जहाँ पर मेतार्य ने सोने का किल्ला वनवाया और पूर्व भव
के मित्र देवता ने वहाँ मणियाँ लगवाईं।
जगत् मे चमत्कार उत्पन्न करने वाली लक्ष्मी का भोग करने
वाले यहाँ शालिभद्रादि अनेक महा धनिक सेठ हुए हैं।
यहाँ छत्तीस हजार वणिको के घर थे, जिनमे आधे बौद्ध और
आधे जैन थे।
वैभारगिरि-कल्प ५१
यहाँ के प्रासादों की श्रेणी अत्यन्त प्रेक्षणीय, कल्याणकारी थी
जिनके आगे स्वर्ग के विमानो ने भी अभिमान छोड़ दिया था।
जहाँ जगत के मित्र सुमित्रवंशरूपी कमल को प्रकाशित
करने मे सूर्यवत् मुनिसुव्रत जिनेश्वर हुए, जिनके द्वारा अश्व को
अवबोध हुआ और वह व्रती बना।
जहाँ श्रीमान् जरासन्ध, श्रेणिक, कोणिक, अभयकुमार,
मेघकुमार, हल्ल विहल्ल नन्दिषेण हुए। जम्बू स्वामी, प्रभव,
शय्यभवसूरि आदि मुनि और नन्दादि पतिव्रता स्त्रिया हुई।
यहाँ श्रीमहावीर प्रभु के ग्यारह गणधर पादपोपगमनपूर्वक
मोक्ष प्राप्त हुए। भगवान के ग्यारह गणधरो मे प्रभास नामक
गणधर ने यही जन्म लेकर इसे पवित्र किया था।
जहाँ श्री वीर प्रभु ने चौदह चातुर्मास किए, ऐसे नालदालकृत
स्थान वाली नगरी कैसे पावन नही है ? जहाँ के अनेक तीर्थ अशेष
नयनाभिराम और भव्यो को आनन्ददायक है वह नालंदा हमे
पावन करे।
रणाङ्गण मे शत्रुओ को अपने नाद से भगा देने वाला क्षेत्रपाल
मुख्य मेघनाद किन पुरुषो की इच्छा पूर्ण नही करता ?
कल्याणक स्तूप के पास जो गौतम स्वामी का मन्दिर है,
दर्शन मात्र से नमस्कार करने वाले प्राणियो की प्रीति को पुष्ट
करता है।
विक्रम संवत् १३६४ मे देवताओ द्वारा सेवित वैभारगिरि तीर्थ
का शिखर रूपी कल्पवृक्ष सेवा करने वालों को लक्ष्मी प्रदान करे।
वैभारगिरि के स्वामी का गुणसमूह कहने मे संलग्न श्री जिनप्रभ
सूरि की यह सूक्ति भक्तियुक्त धीरबुद्धिवाले मनुष्य इसके कोमल
और विशद पदो को पढे।
श्री वैभारगिरि महातीर्थ का कल्प ग्र० ३१ अक्षर २ मे है।