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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

४२ वरिवस्यारहस्ये
शक्ति के ताने-बाने से विनिर्मित मन्त्राक्षरों का ही ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति
परम व्योम में निवास करती है और परमामृत से समृद्ध है।—उक्त पद्धति से जप
करने पर मन्त्र अपना स्वस्वरूप उद्घाटित कर देता है और अपने ऊपर से
आवरण का उन्मोचन कर देता है।
‘श्रीकालपरा’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—शब्दनादात्मक हैं। उनके
साथ प्रत्यय, (संवित्) संलग्न रहता है और उनमें वृद्धि करता है। मन्त्रबोध के
स्वरूप में स्थित जो संवित् है वह मन्त्र से अभिन्न है अतः वह आत्म-बोध करा
देती है।
‘सङ्कर्षणसूत्र’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है।
भाव एवं अभाव उसकी दिशाएँ एवं परिष्कार है। वह स्वसंवेदन-संवेद्य है। वह
प्रकृति का विषय भी है साथ ही वह प्रकृत्यातीत भी है। यही है मन्त्रों का
प्रत्ययात्मक कारण। मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णरूप से प्रकट होते है। वे शाश्वत
पदरूप मन्त्र मनुष्य के कर-चरण आदि के समान है। वीर्य के योग से प्रत्येक
काल में ये मन्त्र-प्रयोग सिद्ध होते हैं।१
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप
किये जाने पर वह लक्ष बार किए गए जप के समान फल वाला हो जाता ‘है।२
‘जयसंहिता’-नामक ग्रन्थ में इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुए कहा गया है
कि—जब एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाते हैं
तब ऐसे जप को लक्षसंख्या से भी अधिक महनीय समझना चाहिए। इन्हीं भावों
को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्रा सर्वज्ञबलशालिनः।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः॥”३
ये मन्त्र-साधक चित्त की प्रवृत्ति-निवृत्ति के निमित्त (साधक की इच्छा होने पर)
शक्तिस्वभाव में लीन हो जाते हैं क्योंकि मन्त्र स्वस्वभाव के अनुगामी एवं शक्तिरूप
हैं।४
‘कालपरा’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—पर अक्षर रूप विटप में अनेक
शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनके विवर्त शक्तिरूप में वर्णों के माध्यम से प्रकट होते हैं।
ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण शान्त एवं निरञ्जन हैं। मन्त्र सर्वज्ञ एवं
सर्वकर्ता हैं। मन्त्र शिवधर्मी हैं। आचार्य कल्लट ने ‘स्पन्दकारिका’ में इसकी पुष्टि
करते हुए कहा है—
“तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः।
सहसाधक चित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः॥”५
१. संकर्षणसूत्र २. स्पन्द प्रदीपिका
३. स्पन्द कारिका ४. स्पन्द प्रदीपिका
५. स्पन्द कारिका

भूमिका ४३
‘साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं’—कहने का तात्पर्य यह है कि
आत्मा ही शिव है । यह आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है क्योंकि यह
बोद्धा है । संवित् ही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र शिवरूप हैं ।
मन्त्र एवं जप वर्णात्मक होने पर भी मूलतः संविदात्मक हैं आन्तर-विकास की
निष्पत्ति हैं—आत्मोल्लास का अपर पर्याय हैं । इसीलिए ‘बौद्धायन संहिता’ में कहा
गया है कि—‘चन्द्रमा शान्त हो जाय एवं सूर्य का उदय भी न हो, उस समय
समस्त देवों का विलय एवं समस्त मन्त्रों का उदय हुआ करता है ।।'
‘मालिनीविजय’-नामक ग्रन्थ में भी इसी तथ्य को पुष्टि करते हुए कहा गया है
कि—‘जिस अवस्था में जीव अन्य आधारों से विनिर्मुक्त होकर स्वस्वरूप में लीन हो
जाता है वही अवस्था मन्त्रों के उद्भव का स्थान है ।'
यह भी कहा गया है कि—‘‘जब पुरुष का चित्त धर्माधर्म के संधि-स्थल में
निरुद्ध हो जाता है तब वह जो कुछ भी बोलता है वही ‘मन्त्र’ हो जाता है ।
केवल स्वर, वर्ण मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते ।।'’
“धर्माधर्मान्तरे चित्तं निरुद्धं यत्तदा तु सः ।
यद्वक्ति स भवेन्मन्त्रः किं पुनर्मातृकोत्थितः ॥”
इसीलिए कहा गया है कि अनिरुद्ध चित्त वाला साधक जिस मन्त्र का जप
करता है वे मन्त्र उस स्थिति में पशुभाव में स्थित रहते हैं किन्तु जब उन्हीं मन्त्रों
का सुषुम्णा नाड़ी से उच्चारण होने लगता है तब वे ही मन्त्र ‘पशुपति’ बन जाते
हैं¹—
“पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवलः वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णोऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥”
मन को चेतन करके उठाना होगा । सुषुम्ना का स्रोत ही चैतन्य की धारा
है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्णा की धारा में डाल देना होगा ।²
यह जाग्रत मन ही मन्त्रस्वरूप है । यही प्रबुद्ध कुण्डलिनी की स्फूर्ति है ।
जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए शिवसूत्र में कहा गया है—‘चित्तमन्त्रः’ हृदयाकाश
में मन लीन होने पर पुनः व्युत्थित होकर बहुमुखी दौड़ने लगता है महाकाश में
एकीभूत मन उत्थित होने पर एकमुखी होकर दौड़ता है । अतः मन को और ऊपर
उठाकर (मन को कम्पनहीन करके) मन को विकल्पहीन करना होगा । यही मन
जाग्रत मन “मन्त्र” है—‘‘चित्तं मन्त्रः ।’’
१. हंस पारमेश्वर
२. शक्तिसम्पन्न शब्दराशि ही मन्त्र है । निरुद्ध, कम्पन-शून्य, हृदयाकाश एवं
महाकाश को अतिक्रान्त करके विकल्प-शून्य स्थिति में आरूढ़ एवं सुषुम्णा धारा में लीन
मन ही मन्त्र है । इसी से ‘चित्तं मन्त्रः’ कहा गया है ।

४४ वरिवस्यारहस्ये
'मननंविश्वविज्ञानं त्राणं संसारसङ्कटात् ।
यतः करोति संसिद्धो मन्त्र इत्युच्यते प्रिये ।।'१
आगमों में कहा गया है—'मननात्राणधर्माणो मन्त्राः स्युः परिकीर्तिताः ।।'
शिवसूत्र में कहा है—'चित्तं मन्त्रः ।।'
'मंत्रिगुप्तभाषणे' (चु०प०से०) से घञ् (३।३।१९, १८) करने पर मन्त्र शब्द
निष्पन्न होता है । इसका अर्थ निम्न है—"मन्त्रो वेदविशेषे स्याद्देवादीनां च साधने ।
गुह्यवादेऽपि च पुमान् ।"२ "वेदे भेदे गुह्यवादे मन्त्रः"३ "मन्त्र्यतेऽनेन इति मन्त्रः ।।"
मन्त्र = 'मन्त्रणम्' ।।
४. 'शाक्तानन्दतरंगिणी' की दृष्टि—
ब्रह्मानन्दगिरि ने 'शाक्तानन्दतरंगिणी' के नवमोल्लास में कहा है कि—"मन्त्र"
सुनिश्चित वर्णों की शाब्दिक पुनरावृत्ति या जिह्वा का वर्णावृत्तिरूप अध्यवसाय नहीं है
बल्कि “मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनम्” तथा 'मन्त्र' देवता से पृथक् कोई सत्ता नहीं है
प्रत्युत मन्त्र वही है जो देवता है अतः मन्त्र एवं देवता में अभेद है—
“वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ।।”४
'मन्त्रार्थ' की व्याख्या करते हुए ब्रह्मानन्दगिरि कहते हैं कि—"हे देवी !
मन्त्रार्थ को सावधानी से हृदयङ्गम कीजिए । आधारपद्म में विद्या को गुरुस्फटिक के
सदृश कल्पित करें, लिङ्ग स्थान में बंधूक के समान, नाभि में स्फटिक के समान
हृदय में मरकत के समान, विशुद्ध चक्र में हरे रङ्ग में, आज्ञाचक्र में
'चतुर्वर्णानुरंजित' रूप में कल्पित करें ।" 'रुद्रयामल' में कहा गया है कि—मन्त्र
को गुरु के पास ले जाकर गुरुभक्ति दिखाकर गुरु से—१. मन्त्र का कान २. मन्त्र
का मुख ३. मन्त्र का नेत्र, एवं ४. मन्त्र का प्राण—यत्नपूर्वक जानना चाहिए ।
फिर मन्त्र का 'कीलक' जानकर मन्त्र की पुरुष्क्रिया की जानी चाहिए ।
“मन्त्रंनीत्वा गुरोः पार्श्वे गुरुभक्तिपुरःसरः ।
मन्त्रस्य श्रोत्रास्य नेत्रप्राणान् विज्ञाय यत्नतः ।।”५
मन्त्र के श्रोत्रादिक के ज्ञान के बिना मन्त्र-जाप—दारिद्र्य, विपत्ति, नरक ।।६
उदाहरणार्थ काली मन्त्र लें—
कालीमन्त्र का—१. श्रोत्र—बिन्दु, २. मुख—नाद, ३. हृदय—ककार, ४.
नेत्र—वह्नि ५. कीलक—दीर्घीकार,।७
१. देवतत्त्व, २. प्राणतत्त्व, ३. बिन्दुतत्त्व, ४. ज्ञानतत्त्व, ५. शक्तितत्त्व, ६.
योनितत्त्व आदि नव तत्त्व जानकर ही मन्त्र का जप करना चाहिए, अन्यथा नहीं ।

१. माहेश्वर तन्त्र (ज्ञानखण्ड) २. मेदिनी कोष
३. अमर कोष ४-६. शाक्तानन्दतरंगिणी
७. भूत डामर

भूमिका ४५
"बिन्दुतत्त्वं प्रजप्याथ ज्ञानतत्त्वं च सुन्दरि । प्राणतत्त्वं च चार्वङ्गि देवतत्त्वं
तथैव च । जपतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं ध्यानतत्त्वं सुलोचने ।।''१
वैसे तो समस्त 'मन्त्र' वर्णात्मक हैं किन्तु वे मात्र वर्णात्मक नहीं हैं—
शक्त्यात्मक भी हैं—'सर्वेवर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये । शक्तिस्तु
मातृका ज्ञेया सा च ज्ञेया शिवात्मिका ।।''
'मन्त्र' स्थूल अक्षर से ऊपरी धरातल की वस्तु हैं । इसीलिए कहा गया है—
'मन्त्रे चाक्षर बुद्धिस्स्याद् गुरौ तु मानवः प्रिये । देवतायाः वरारोहे प्रतिबुद्धिस्तु जायते ।
किं तस्य जप पूजायां सर्वं व्यर्थं कदर्थनम् ।।''२
'स्पन्दप्रदीपिका' में मन्त्र के चार तत्त्व बताए गए हैं—१. बीज, २. पिण्ड,
३. पद, ४. नाम । मन्त्र के दो कार्य बताए गए हैं—१. मनन, २. त्राण ।।
'शब्द', 'मन्त्र', 'ओंकार' एवं देवता तत्त्वतः अभिन्न हैं । समस्त मन्त्रों की
मूल एवं सर्वोच्च प्रकृति ॐकार है । अर्धमात्रादिक में जो प्रतिफलित चैतन्य है
वही 'मन्त्र' है ।
समग्र विश्व की उत्पत्ति शब्द द्वारा हुई है । 'समस्त विश्व शब्द में ही विधृत
है ।'' शब्दातीत परमपद का साक्षात्कार करने हेतु भी शब्द का आश्रय लेना पड़ता
है तथा शब्द-राज्य का भेदन करने हेतु भी शब्द का आश्रय लेना पड़ता है । सृष्टि
में रहने एवं सृष्टि से बाहर जाने दोनों के लिए शब्द ही एक मात्र आलम्बन है ।
इसीलिए शब्द को पकड़कर शब्दातीत परब्रह्म पद में जाने का विधान किया गया
है । मन्त्रों का मूल उद्भवस्थान (योनि) 'ज्ञानशक्ति' है—
'ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः । सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रा-
रणिवत्स्थिताः ।' मन्त्रों के अवयवभूत वर्णों की भी आत्मा है—'मातृका' । इसी
मातृका से मन्त्र निर्मित होते हैं—
मातृका या महामातृका ही विश्वजननी है । शब्दब्रह्म ही यह परामातृका है ।
अस्तित्व के तीन स्तर हैं—१. 'दिव्य समरसभूमि' = यहाँ न तरङ्ग है, न स्पंदन,
न विमर्शन, न सृष्टि, न संरक्षण, न संहार, न तिरोधान, न अनुग्रह, न
शिव-शक्ति, न जीव जगत् । अद्वय परम स्थिति की वह अवस्था जहाँ पूर्ण सत्य
अपनी महिमा में पूर्णतः विराजमान है । २. द्वितीयावस्था = यहाँ परब्रह्म भी है
और शब्दब्रह्म भी । परावाक् ही शब्दब्रह्म है । यही है युगलभाव की अवस्था—
'शिवशक्ति की समरसावस्था' । यह सामरस्य नित्य है । यह 'यामल', 'युगनद्ध',
'युगल' की अवस्था है । सृष्टि के मूल में है—'बिन्दु' । स्वातन्त्र्य—स्पन्दन द्वारा
'बिन्दु' का स्पर्श—रेखा रूप में बिन्दु की परिणति—त्रिकोण = (सृष्टि की मूल
योनि) ।।
शब्द, अर्थ एवं ज्ञान परस्पर सम्बद्ध हैं । अर्थ ही जगत् है क्योंकि वह
१-२. कामधेनु तन्त्र

४६ वरिवस्यारहस्ये
पदार्थों की समष्टि है । शब्द का अर्थ से जो सम्बंध है वह है तीन प्रकार का—
१. अभेद सम्बन्ध, २. भेदाभेद सम्बन्ध, ३. भेद सम्बन्ध ।
पश्यन्ती अवस्था = यहाँ शब्दार्थ में अभेद सम्बंध है । यहाँ जो शब्द है वही
अर्थ है, जो अर्थ है वही शब्द है ।
मध्यमावस्था = यहाँ शब्दार्थ में भेदाभेद सम्बंध है ।
वैखरीअवस्था = यहाँ शब्द से अर्थ का भेद सम्बंध है । (परावस्था में शब्द,
अर्थ, ज्ञान—पृथक्-पृथक् रूप में भासमान नहीं होते ।)
मातृका ही प्रत्यवमर्शनकारिणी शक्ति है । मातृकाशक्ति के जुड़ने पर ही
‘प्रकाश’ अपने को प्रकाश के रूप में पहचान पाता है अन्यथा नहीं । ‘अहं’ में
भी मातृका की ही क्रीड़ा है । ‘पूर्णाहन्ता’ (पूर्ण अहं या परमेश्वर के स्वरूप) को
भी मातृका द्वारा ही पकड़ा जा सकता है । (पूर्णत्व उन्मनी अवस्था में है ।)
मन्त्र को जो देवता से अभिन्न कहा गया है—उसका अर्थ यही है कि
मन्त्राक्षर वैखरीभाव (भेदराज्य) एवं मध्यमाभाव (भेदाभेद राज्य) का त्याग करके
पश्यन्तीभाव (अभेद राज्य) तक यात्रा करें जहाँ कि शब्द से उसका अर्थ (वाचक
से उसका वाच्य) अभिन्न रूप से दिखाई दे अर्थात् मन्त्र से मन्त्रवाच्य अभिन्न रूप
में दर्शन दे, अर्थात् जहाँ मन्त्र एवं उसके वाच्यदेवता में रञ्चमात्र भी भेद दृष्टिगत न
हो । जहाँ मन्त्र और उसका देवता दोनों एक हैं वह अवस्था ही मन्त्र का
वास्तविक अर्थ है । चूँकि पश्यन्ती की अवस्था में शब्द और अर्थ अभिन्न रूप से
स्थित हैं उसी प्रकार वहाँ मन्त्र और उसका अर्थ रूप देवता भी अभिन्न रूप में
स्थित हैं अतः मन्त्र वहाँ देवता के रूप में एवं देवता मन्त्र के रूप में एवं दोनों
एक दूसरे के रूप में दृष्टिगत होंगे । ‘मन्त्र’ अपने वास्तविक स्तर पर देवता से
अभिन्न रूप में ही स्थित रहते हैं अतः मन्त्र की इसी मूल आदर्श दशा को दिखाने
के लिए कहा गया है कि मन्त्र ही देवता है ।
६. ओंकार (प्रणव) और मन्त्र—ओंकार ही महामन्त्र है । वेदों में कहा
गया है कि मनोभावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस वाणी का
उपयोग किया जाता है उसके चार प्रकार हैं । उसे केवल ‘मनीषी ब्राह्मण’ ही
जानते हैं अन्य नहीं । इनमें तीन वाणियाँ गुहा में गुप्तरूप से स्थित हैं । केवल
चौथी वाणी ही मनुष्य बोला करते हैं अन्य वाणियाँ नहीं क्योंकि अन्य वाणियों का
(गुप्त तीन वाणियों का) ज्ञानमात्र मनीषी ब्राह्मणों को ही है अन्य को नहीं—
‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति, तुरीयो वाचो मनुष्या वदन्ति ॥
सारांश—
१. परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा वाणी (मनुष्यों को अज्ञात । केवल मनीषी
ब्राह्मणों को ज्ञात)

भूमिका ४७
२. वैखरी वाणी = तुरीय वाणी । (मनुष्यों द्वारा बोली जाने वाली वाणी ।)
इनमें तीन गुप्त वाणियों में भी गुप्त हैं 'पश्यन्ती' एवं 'पश्यन्ती' से भी
अधिक गुप्त है 'परावाणी' । यहीं परावाणी है—ओंकार । ओंकार ही सब कुछ
है—उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, वेद के प्रमाण देखिए—
१. 'ॐ कार एवेदं सर्वम्' (छा०उप०)—यह सब कुछ (समस्त जगत्) ओंकार
ही है ।
२. 'ॐ तद्ब्रह्म' (मु०उप०)—ॐ वह अचिन्त्य परात्पर परमात्मा है ।। प्रणव
(ओंकार ही पर एवं अपर) ब्रह्म है
३. “प्रणवोऽपरं ब्रह्मप्रणवश्च परः स्मृतः । अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवो-
ऽव्ययः ।।”
४. 'ॐ मित्येत्' (क०उप०)—ओंकार ही यह सब (जगत्) है ।
५. 'ॐमिति ब्रह्म' (तै०उप० १।८।१)—ओंकार ही ब्रह्म है ।
६. 'एतदालम्बनम्' (क०उ० १।२।१७)—यही ओंकार ही आलम्बन है ।
७. 'एतद्वैसत्यकाम' (प्र० ३०५।२)—हे सत्यकाम । यह ओंकार है और यही
पर एवं अपर ब्रह्म है ।
८. 'ओमित्यात्मानं युञ्जीत' (मैत्र्यु० ६।३)—आत्मा का ॐ इस प्रकार ध्यान
करे ।
९. 'ओंकार एवेदं सर्वम्' (छा० ३०२।२३)—यह सब ओंकार ही है ।
१०. ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं । तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोंकार
एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ।। (माण्डूक्योपनिषदः १।१)
—ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है । यह जो कुछ भूत, भविष्यत् एवं
वर्तमान है—उसी की व्याख्या है । इसलिए यह सब ओंकार ही है ।
इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ।
११. 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्' (माण्डूक्यो० १।२)
—यह सब ब्रह्म ही है । यह आत्मा ही ब्रह्म है । वह यह आत्मा चार
पादों वाला है ।
१२. सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो
मकार इति ।। (माण्डुक्य० १।८)—वह यह आत्मा अक्षर की दृष्टि से
ओंकार है, वह मात्राओं को विषय करके स्थित है । पाद ही मात्रा हैं
और मात्रा ही पाद हैं । वे मात्रा अकार, उकार एवं मकार हैं । (क)
ओंकार की प्रथममात्रा—'अकार' । (ख) ओंकार की द्वितीय मात्रा—
'उकार' । (ग) ओंकार की तृतीय मात्रा—'मकार' ।
४ वरि. भू.

४८ वरिवस्यारहस्ये
(क) जागरित स्थान = 'वैश्वानर' = ॐ की प्रथममात्रा = 'अ' ॥
(ख) स्वप्न स्थान = 'तैजस' = ॐ की द्वितीयमात्रा = 'उ' ॥
(ग) सुषुप्ति स्थान = 'प्राज्ञ' = ॐ की तृतीयमात्रा = 'म' ॥
(घ) तुरीय, तुरीयातीत = आत्मा का तुरीयपाद = तुरीयआत्मा = मात्रा-शून्य ॐ
'अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव
संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।'—(माण्डू० १।१२) ॥
(ङ) 'प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् । सर्वव्यापिनमोंकारम् ॥'—
(माण्डू० का० २८)—ओंकार हृदयस्थ ईश्वर है ।
यह ओंकार 'अनादिनिधन ब्रह्म' है—'शब्दतत्त्व' है—'अक्षर' है—'जगत्'
इसीका 'विवर्त' है—
“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥”
यही ओंकार 'शब्दब्रह्म' है एवं इसी 'शब्दब्रह्म' से 'परब्रह्म' की प्राप्ति होती
है—'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।' ध्वनि का स्थूल शरीर—'आकाश'
है । ध्वनि का सूक्ष्म शरीर 'शब्दतन्मात्रा' है । ध्वनि का सूक्ष्मतम कारण शरीर—
'परशब्द' है । यही 'परशब्द' ओंकार है ।
यह वही शब्द है जो मानव पिण्ड में 'गगनशिखर' में प्रकाशित होता है—
'गगनशिखर महँ शब्द प्रकास्या तहँ बूझै अलखबिनाणी'¹, 'शब्द' (ओंकार) ही
ताला है, शब्द ही कुञ्जी है । शब्द ही शब्द को जगाता है । शब्द का शब्द से
परिचय होने पर शब्द, शब्द में समा जाता है ॥'' (शब्दहिं ताला, शब्दहिं कूची
शब्दहिं शब्द समाया । शब्दहिं शब्द से परचा हुवा शब्दहिं शब्द समाया ।²)
इसीलिए आचार्य रामानन्द ने कहा था—''शब्द को सीख ले, शब्द को बूझ ले,
शब्द से शब्द पहिचान भाई ॥''
शब्द—समस्त वर्णमाला, समस्त प्रकृत्यण्ड, मायाण्ड, शाक्ताण्ड, ब्रह्माण्ड,
समस्त जीव-जगत् ॥ पञ्चअवस्थाएँ—त्रिलोक, तैंतिस कोटि देवता, त्रिदेव,
वेदचतुष्टय, समस्तशास्त्र, समस्तमन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर आदि सारे अस्तित्व ॥
मन्त्र का वाच्य है परमात्मा । मन्त्र-साधना का लक्ष्य है परमात्मा, आत्मा एवं
ब्रह्म की प्राप्ति । चूँकि ओंकार ही आत्मा है—परमात्मा है, और ब्रह्म है—इसीलिए
सारे मन्त्रों के पूर्व ओंकार का प्रयोग किया जाता है यथा—'भुवनेश्वरी का मन्त्र
(ॐ ह्रीं ह्रीं ओं ओं) विष्णु का मन्त्र—(सेतु) ॐविष्णवे ॐ । कृष्ण का मन्त्र—
(सेतु) ॐ क्लीं ॐ । तारा का मन्त्र—(सेतु) 'ॐ ह्रीं' । समस्त वर्णों के मूल
१-२. गोरखनाथ

भूमिका ४९
में यही ओंकार है—'एको नादात्मको वर्णः सर्ववर्णविभागवान् । 'सोऽनस्तमित-
रूपत्वादनाहत इहोदितः ।। (तन्त्रालोक ६ आ०)
मन्त्र का लक्ष्य है 'देवता' किन्तु देवता का मूल है 'बीज' । क्योंकि देवता
के शरीर का जन्म इसी बीज से होता है—"देवतायाः शरीरं तु बीजादुत्पद्यते
ध्रुवम् ।।''१ मूल बीजों का भी आदिमूल बीज है ओंकार ।। समस्त वर्णों के पीछे
एक अनाहत वर्ण है जो कि अनवरत रूप से नादात्मक है । वर्णात्मक मन्त्रों में
सर्वदा सतत् उच्चाररूप अनाहत नाद सञ्चरित होता रहता है और वह अनाहत नाद
अन्य कोई ओंकार ही है । मन्त्रों में संवित् ही स्पन्दित होती है । मन्त्रों में स्पन्द
भी स्फुरित है । यथा अरघट्ट के चक्र में यदि बाल्टी को ठीक कर लिया जाय तो
ठीक काम करने लगती है—'यथेष्ट पानी लाती है—तद्वत् अनुसंधान-बल से
यत्नपूर्वक देवता रूप होने से मन्त्र द्वारा तादात्म्य की प्राप्ति होती है । चूँकि भेद
भी स्पन्दाधीन है प्राण भी स्पन्दाधीन है अतः प्राणानुशासन के साथ भेद-निवृत्ति-
पूर्वक अभेदात्मक जप के लिए प्राण-साम्य भी आवश्यक है । प्राणों की
साम्यावस्था सुषुम्णा में है । 'मानसजप' में प्राणशक्ति के उदय, सङ्गम एवं शान्ति
में जप किया जाता है । प्राणशक्ति के उदयस्थान कुण्डलिनी में, हृदयदेश में एवं
(जहाँ प्राणशक्ति शान्त होती है उस) ऊर्ध्व देश में जप किया जाता है ।२ इस जप
में ओंकार का ही जप होता है । जप के सात स्थान हैं—उदय-सङ्गम-शान्त के
अतिरिक्त प्राणापान के प्रवाह में, अक्ष नाड़ीचक्र सूत्रों में, हृदयदेश के 'हंस' नामक
स्थान में, एवं सहस्रार में—सप्त प्रकार का जप है । यही है मानस जाप-अजपा
जाप जो कि मूलतः ओंकार से अनुप्राणित है ।३
७. प्रणवरूप 'मूलमन्त्र' के अवयव—मूलमन्त्र 'प्रणव' है । इसी कारण
प्रत्येक मन्त्र के प्रारंभ में उसको जोड़ा जाता है । इस मूल मन्त्र के द्वादश अवयव
हैं जो कि निम्न हैं—
१. अकार, २. उकार, ३. मकार, ४. बिन्दु, ५. अर्धचन्द्र, ६. निरोधिनी,
७. नाद, ८. नादान्त, ९. व्यापिनी, १०. शक्ति, ११. समना, १२. उन्मना—
'अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्द्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समनाश्चेति सामयाः ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ।।'४
“अकारं ब्रह्मणो रूपं उकारं विष्णुरूपवत् । मकारं रुद्ररूपं स्यादर्धमात्रं
परात्मकम् । वाचं तत्परमं ब्रह्मवाचकः प्रणवः स्मृतः । वाच्यवाचक सम्बन्धस्तयोः
स्यादौपचारिकः ।।"—बृहन्नारदीय
१. शाक्तानन्दतरंगिणी, यामल
२-३. अभिनवगुप्त—'तन्त्रालोक' (३१ आ०)
४. नेत्रतन्त्र

५० वरिवस्यारहस्ये
१. 'अ'—ब्राह्मी—मनोबीज (= सृष्टि) ॥
२. 'उ'—वैष्णवी—प्राणबीज (= स्थिति) ॥
३. 'म'—माहेश्वरी—अहं बीज (= प्रलय) ॥
(क) सूक्ष्म शब्दशक्ति = 'सृष्टिबीज' = नादशास्त्र की परिभाषा में यही है—
'मनोबिन्दु' ॥
(ख) स्थूल शब्दशक्ति = 'प्राणबिन्दु' = सृष्टि का स्थिति बीज ॥
(ग) अतिस्थूल शब्दशक्ति = 'अहंबिन्दु' = सृष्टि का लय बीज ॥
'अ' = मनोबीज के आदिकारण के रूप में निगूढ़ रहने वाली
निनादशक्ति ।
'उ' = प्राणबीज के आदिकारण के रूप में निगूढ़ रहने वाली
निनादशक्ति ।
'म' = लय बीज के आदिकारण के रूप में निगूढ़, रहने वाली
निनादशक्ति ।
स्थूल शब्दशक्ति—में वैष्णवीशक्ति स्थित है । अधिष्ठाता = विष्णुः
वैष्णवीशक्ति—प्राणबिन्दु । (प्राणबिन्दु की उत्पत्ति का आदिकारण वैष्णवीशक्ति है ।)
अत्यन्त स्थूल शब्दशक्ति—में अधिष्ठाता = महेश्वर (लयशक्ति का अभिमानी
देवता) ॥
(परब्रह्म के ईक्षण के प्रभाव से वृवृच्छक्ति में उत्पन्न अतिस्थूल नाद ही
माहेश्वरीशक्ति का प्राण है । यही शक्ति विश्वप्रलय का महाकारण है ।)
सूक्ष्म शब्दशक्ति—इस शब्द में रहने वाली नादशक्ति ब्राह्मीशक्ति है ।
अधिष्ठाता = ब्रह्मा ॥
प्रकृति की साम्यावस्था में 'संक्षोभ'—
'संक्षोभ'—अकार में से सूक्ष्म शब्द की उत्पत्ति ।
'संक्षोभ'—उकार में से स्थूल शब्द की उत्पत्ति ।
'संक्षोभ'—मकार में से अतिस्थूल शब्द की उत्पत्ति ।
(प्रणव या ओंकार के अ, उ, म—इन तीन अङ्गों से उद्भूत इन महाशक्तियों
से क्रमशः 'मनोबीज', 'प्राणबीज' एवं 'अहंबीज' में सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कारण
बीज प्रकट हुए ।)
ओंकार (प्रणव) के दो प्रकार—१. पर प्रणव २. अपर प्रणव । पराप्रकृति
('परप्रणव') की सन्निधि या सत्तामात्र से 'अपर प्रणव' (अपरा प्रकृति) में सङ्कल्प
विवृति का प्रारंभ—अकार-उकार-मकार के रूप में विभाजन । ब्रह्म की तीन
शक्तियाँ—

भूमिका ५१
१. ब्राह्मी—सृष्टि ॥ अधिष्ठाता—ब्रह्मा ॥ = 'अ' ॥
२. वैष्णवी—स्थिति ॥ अधिष्ठाता—विष्णु ॥ = 'उ' ॥
३. महेश्वरी—लय ॥ अधिष्ठाता—महेश ॥ = 'म' ॥
प्रकृति का अस्पंदनांश = चिदात्मा का प्रकृति में प्रतिबिम्बन—(यथा सूर्य का
दर्पण में)—प्रकृति का दो रूप में विभाजन'—स्पंदनांशमय प्रकृति का जड़ अंश
(२) अस्पंदनांश चेतन के अंशरूप में—'अपरा प्रकृति' । वाचक = 'अपर प्रणव ॥
वाच्य = 'परप्रणव' । वाच्य + वाचक प्रणव का संयोग—'विवृच्छक्ति'—जगत् की
सृष्टि ॥ परब्रह्म की 'ईक्षणशक्ति' ('तदैक्षत बहुस्याम प्रजायेय') = जगत् की सृष्टि
का महाकारण । ईक्षण शक्ति—विवृच्छक्ति का उत्प्रेरित होना—सृष्टि-सङ्कल्प । यही
सृष्टि-सङ्कल्प है—'पर्यालोचना' (Cosmic Ideation) ॥ ब्रह्म में सिसृक्षा-सङ्कल्प
(सङ्कल्प-स्फुरण) ब्रह्म की दो शक्तियों—स्पन्दन + अस्पन्दन—का संयोग—गुणत्रय
की साम्यावस्था रूप प्रकृतिरूप महाशक्ति का आविर्भाव—(चिदात्मा का प्रकृति में
प्रतिबिम्बन के कारण प्रकृति में संक्षोभ)—
१. स्पंदनांशमय प्रकृति का जडांश 'अ' 'उ' 'म' द्वारा सृष्टि
२. अस्पनंशमय प्रकृति स्थिति, संहार
८. 'मन्त्र' के अवयव—(ॐकार की एकादश कलाएँ)—
मकार, उकार एवं अकार का वर्ण—परामर्श ही 'मन्त्र' है ।
१. 'अ' 'उ' 'म' = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति ॥
२. बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद = तुरीयावस्था ॥
३. नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना, उन्मना = तुरीयातीतावस्था ॥
'अवस्थातीत' = मात्राहीन या अमात्र शिव । उन्मना से परे कोई अन्य
अवस्था नहीं है । अ-उ-म = जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति के वाचक हैं । इन तीनों को
मिलाकर एकाकार कर देने पर जो अविभक्त ज्योतिर्मय ज्ञान उदित होता है उसे ही
'बिन्दु' कहा जाता है । यह भ्रूमध्य में प्राप्त होता है ।
१. 'बिन्दु' में ज्ञेयों का भेद विगलित है—अभिन्न ज्ञेयता की स्थिति है ।
किन्तु इसमें ज्ञानांश का नहीं ज्ञेयांश का प्राधान्य है । 'अर्द्धचन्द्र' में ज्ञानांश का
प्राधान्य है ज्ञेयांश गौण है । 'निरोधिका' में ज्ञेयभाव की सर्वथा निवृत्ति है । यहीं
से नाद में प्रवेश होता है किन्तु अयोगी का प्रवेश नहीं हो पाता । वाच्यों का
अभेद 'बिन्दु' में एवं वाचकों का अभेद नाद नादान्त में रहता है । 'बिन्दु' ईश्वर
है । 'नाद' सदाशिव है । 'समना' पर्यन्त शक्ति 'शिवतत्त्व' है । समना-लङ्घन शुद्ध
आत्मरूप में प्रतिष्ठा । 'उन्मना' का त्याग नहीं होता—परमशिव भाव की प्राप्ति ही
'उन्मना' का त्याग है । 'उन्मना' परमात्मा का समवायिनी शक्ति है । उन्मना
व्यापक एवं समना व्याप्य है । 'व्यापिनी' समना का अपरभाव है । व्यापिनी
महाशून्य है । समना भी शून्य है और यह व्यापिनी की परावस्था है । महाशून्य
का अतिक्रमण—समना की प्राप्ति ॥ व्यापिनी का अपरभाव ही है 'शक्ति' । यह

५२ वरिवस्यारहस्ये
आनन्दात्मिका स्पर्शानुभूतियुक्ता है । इसका अतिक्रम—व्यापिनी । स्पर्शरूपा शक्ति
का अपर भाव है—नादान्तव्यापी नाद ।। नाद का अपरभाव है बिन्दुरूपा ज्योति ।।
ज्योति का अपरभाव है ‘मन्त्र’ ।। मन्त्र का अपरभाव है ब्रह्मा-विष्णु-महेश । त्रिदेवों
का अपरभाव हैं—तत्त्वसमूह ।।
मन्त्र के अवयव सारांशतः निम्न हैं—१. ६ शून्य, २. ५ अवस्थाएँ, ३. ७
विषुव ।। ५ अवस्थाएँ—जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत ।।
‘शून्य’—द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम, द्वादश । ५ अवान्तर शून्य
(प्रथम ५) ।। महाशून्य = छठवाँ ।।
परमात्मा के छः प्रकार के स्थूल रूप हैं—उनमें एक ‘मन्त्र’ भी है यथा—१.
भुवन २. विग्रह ३. ज्योति या बिन्दु ४. व्यापिनी या आकाश ५. नाद या शब्द
६. मन्त्र ।।
‘सप्तविषुव’—प्राणविषुव, मन्त्रविषुव, नाड़ीविषुव, प्रशान्तविषुव शक्तिविषुव,
कालविषुव, तत्त्वविषुव ।।
प्राण, आत्मा एवं मन के परस्पर योग को ‘प्राणविषुव’, नाद को जापक की
आत्मा समझने की भावना करना ‘मन्त्रविषुव’ मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त
बीजशिखरवर्ती नाद के उच्चरित होने पर ‘नाड़ीविषुव’, शक्ति में नादान्तपर्यन्त
मन्त्रावयवों की लय-भावना करना ‘प्रशान्तविषुव’ एवं शक्ति के मध्य आगत नाद के
समनापर्यन्त चिन्तन को ‘शक्तिविषुव’ कहते हैं । कालातीत उन्मनापर्यन्त नाद के
चिन्तन को ‘कालविषुव’ कहते हैं । उन्मनाभेदन करने के साथ ही ‘नाद’ का अन्त
होता है इसके पूर्व नहीं । इस स्थिति में तत्वबोध स्वयमेव हो जाता है । चैतन्य
का यह अभिव्यक्ति स्थान ही ‘तत्त्वविषुव’ कहलाता है । इसकेबाद ही ‘परमपद’ है।
९. मन्त्र के अङ्ग—प्रत्येक अङ्ग के निम्न अङ्ग होते हैं—
१. आन्तरिक अङ्ग—वर्ण-संख्या, उद्धार, काल (मात्रा), उच्चारण, स्थान,
प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, आकार आदि विद्या के आन्तरिक अङ्ग हैं ।
२. बाह्य अङ्ग—ऋषि, छन्दस्, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति कीलक,
न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा ।
“आन्तरिक अङ्ग प्रायः दुर्लभ हैं । इनका समादर प्रायः अन्तर्मुखी लोगों द्वारा
किया जाता है । इन्हीं की सन्तुष्टि के लिए इस रहस्य वरिवस्या का प्रतिपादन
किया गया ।।’’१ “इसका परित्याग करके जड़ों द्वारा जो बाह्याडम्बरों की उपासना
की जाती है वह प्राणहीन शरीर या सूत्रहीन पुतली की भाँति अग्राह्य है ।”२
जो मन्त्र के तत्त्वों को बिना जाने महाविद्या का जप करता है उसके समस्त
प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं अतः उसके जप एवं पूजन से क्या लाभ? ‘अज्ञात्वा
१-२. भास्कराचार्य—‘वरिवस्यारहस्यम्’

भूमिका ५३
मन्त्रतत्वानि महाविद्यां जपेत्तु यः । सर्वं तस्य वृथा देवि । किं तस्य जपपूजनैः ।
ध्यानावधारणे चैव तथा योगसमाधिना । वर्णज्ञानं यदा नास्ति किं तस्य जप पूजनै ?'१
१०. मन्त्र और मन्त्रयोग—
योग की चार शैलियों में प्रथम शैली है—'मन्त्रयोग' । 'मन्त्रयोग' क्या है?
प्राणी का अहर्निश (श्वास-प्रश्वास के द्वारा) 'ह' एवं 'सः' का जप एवं इसे—'सोऽहं'
के रूप में परिणतीकरण ।। 'मन्त्रयोग' के निम्न सोलह अङ्ग है—भक्ति, शुद्धि,
आसन, पञ्चाङ्गसेवन, आचार, धारणा, दिव्यदेशसेवन, प्राणक्रिया, मुद्रा, तर्पण,
हवन, बलि, याग, जप, ध्यान और समाधि ।। योग-साधन की चार शैलियों में से
प्रथम शैली है मन्त्रयोग ।। मन्त्रयोग का सिद्धान्त यह है कि परमात्मा से भाव, भाव
से नामरूप एवं उसका विकार एवं विलासमय यह संसार है । जिस क्रम से सृष्टि
हुई उसके विपरीत मार्ग से ही लय होगा । परमात्मा से भाव एवं भाव से नामरूप
द्वारा सृष्टि हुई जिससे जीव बंधन में पड़े हुए हैं—यदि इस बंधन से मुक्ति-लाभ
करना हो तो प्रथम नाम-रूप का आश्रय लेकर, नाम-रूप से भाव में, और भाव
से भावग्राही परमात्मा में चित्तवृत्ति का लय होने पर ही मुक्ति होगी । इसी कारण
ऋषियों ने नाम एवं रूप के अवलम्बन से साधन की विधियाँ बतायी हैं—इसी का
नाम 'मन्त्रयोग' है ।
“नामरूपात्मिका सृष्टिर्यस्मात्तदवलम्बनात् ।
बंधनान्मुच्यमानोऽयं मुक्तिमाप्नोति साधकः ॥
तामेव भूमिमालम्ब्य स्खलनं यत्र जायते ।
उत्तिष्ठति जनः सर्वोऽध्यक्षेणैतत्त्समीक्ष्यते ॥''
११. मन्त्रों के पञ्चलक्षण—
साधकों के सामने मन्त्र पञ्चधास्थित हुआ करते हैं—'स्पर्शनं चावलोकञ्च
संभाषा बिन्दुदर्शनम् । स्वयमावेशनं चैव मन्त्राणां पञ्च च लक्षणम् ।।' (उत्तरषट्क)
मन्त्र-सिद्धि के प्रतिबन्धक—नेत्रतन्त्र (८।५९-६२) में निम्न विघ्नों को
मन्त्रसिद्धि का प्रतिबन्धक माना है—'भावहीनास्तु ये मन्त्राः शक्तिहीनास्तु कीलिताः ।
वर्णमात्राविहीनास्तु गुर्वागमविवर्जिताः । भ्रष्टाम्नायविहीना ये आगमोज्झितविघ्निताः । न
सिद्ध्यन्ति यदा देवि जप्ता इष्टाः सहस्त्रशः ।। असिद्धा रिपवो ये च सर्वांशक-
विवर्जिताः । आद्यन्तसंपुटेनैव साद्यर्णेन तु रोधिताः ।।" (८।५९-६२)
१२. मन्त्रों में दोषोत्पादन—
नेत्रतन्त्र (१६।३३-३६) में मन्त्रों के इन दोषों का इस प्रकार वर्णन किया
गया है—'कीलनं चैत मन्त्राणां भेदनं मोहनं तथा । संत्रासं ताडनं चैव जृंभनं स्तंभनं
तथा । रिपुत्वकरणं चान्यत् प्रत्यंगिरत्वमेव च । सर्वहानिविधायित्वं क्रियते दुष्टमंत्रिभिः ।
एवं दशप्रकारेण प्रयतन्ते हि हिंसकाः'' ।। आदि ।।
१. कामधेनु तन्त्र

५४ वरिवस्यारहस्ये
१३. मन्त्रों के दशविध-संस्कार—
मन्त्र-सिद्धि के लिए मन्त्रों का संस्कार आवश्यक है । मन्त्रों के संस्कार की
दश विधियाँ (दशविध मन्त्र-संस्कार) हैं जो निम्न हैं—१. जनन, २. दीपन, ३.
बोधन, ४. ताड़न, ५. अभिषेक, ६. विमलीकरण, ७. जीवन, ८. तर्पण, ९.
गोपान, १०. आप्यायन ॥१
‘उड्डीशतन्त्र’ में मन्त्रों के विशुद्धीकरण या मन्त्र-संस्कार के लिए दशविध
संस्कारों का विधान किया गया है । भगवान् शिव रावण से कहते हैं—
“सम्यगनुष्ठितो मन्त्रो यदि सिद्धो न जायते । पुनस्तेनैव कर्तव्यं ततः सिद्धोभवेत्
ध्रुवम् । पुनरनुष्ठितो मन्त्रो यदि सिद्धो न जायते । पुनस्तेनैव कर्तव्यं ततः सिद्धो न
संशयः । पुनः सोऽनुष्ठितो मन्त्रो यदि सिद्धो न जायते । उपायास्तत्र कर्तव्याः सप्त
रावण प्रेमतः ॥” सारांश यह है कि यदि सम्यक् अनुष्ठानपूर्वक मन्त्र जप करने पर
भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता तो उसको पुनः जपना चाहिए, यदि फिर भी सिद्ध नहीं
होता तो पुनः उसका जप करना चाहिए, किन्तु यदि फिर भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता
तब उस मन्त्र का संस्कार करना चाहिए । ये संस्कार दस प्रकार के हैं जिनका
ऊपर उल्लेख किया जा चुका है ।
मन्त्रगत दोषों के कारण भी मन्त्र सिद्ध नहीं होते । अतः उनके निराकरण
हेतु भी कतिपय उपाय किये जाते हैं जो निम्न हैं—
१. जनन, २. दीपन, ३. बोधन, ४. ताड़न, ५. अभिषेक, ६. विमली-
करण, ७. जीवन, ८. तर्पण, ९. गोपन, १०. आप्यायन ॥२
१. जनन संस्कार—मातृकायंत्र का निर्माण करके यंत्र को स्वर्णपात्र में कुंकुम,
चन्दन या भस्म से अंकित करना चाहिए । अङ्कन-विधि निम्न है—
१. शक्तिमन्त्र का संस्कार—कुंकुम से
२. विष्णुमन्त्र का संस्कार—चन्दन से
३. शिवमन्त्र का संस्कार—भस्म से करना चाहिए ।
इस मातृका-यंत्र से मन्त्रवर्णों का पर्याय-क्रम से उद्धार करना ‘जनन’ कहलाता
है । उद्धृत मन्त्र वर्णों को पंक्ति क्रम से प्रणव द्वारा संपुटित करके एक-एक वर्ण
सौ-सौ बार जपना चाहिए ।३ यह संस्कार कहलाता है—‘जनन संस्कार’ ॥
भोजपत्र पर गोरोचन, कुंकुम एवं चन्दन प्रभृति से आत्माभिमुख त्रिकोण
निर्मित करके उसके तीनों कोनों में ७” ७ समान रेखाएँ खींचिए । ऐसा करने से
४९ कोष्ठ बनेंगे । उनमें ईशानकोण से मातृकावर्ण लिखकर देवता का
आह्वान-पूजन करके मन्त्र को एक-एक वर्ण का उद्धार करके भिन्न पत्र पर
लिखिए । यही मन्त्र-विधान ‘जनन-संस्कार’ कहलाता है ।
१. ‘गौतमीयतन्त्र’, ‘शाक्तानन्द तरंगिणी’ २. ‘गौतमीयतन्त्र’
३. विश्वसार तन्त्र

भूमिका ५५
२. दीपन संस्कार—“हंसो कृष्णाय नमः सोऽहं' या 'ॐह्रीं', 'ॐश्रीं'—इन
तीन मन्त्रों द्वारा देवमन्त्र को पुटित करके १०८ बार जप करने से दीपन
संस्कार होता है ।
३. 'बोधन संस्कार'—मन्त्र की वर्णसंख्यानुसार करवीर कुसुमों से 'रं' मन्त्र
के उच्चारणपूर्वक हवन करना ही 'बोधनसंस्कार' कहलाता है । या—'हूँ'
बीज-सम्पुटित मन्त्र का पाँच हजार बार जप करने से बोधनसंस्कार
सम्पन्न होता है यथा—“हूँ कृष्णाय नमः हूँ” ।
४. ताड़न संस्कार—मन्त्र को फट् से सम्पुटित करके एक हजार बार जप
करने से ताड़न संस्कार सम्पन्न होता है । यथा—'फट् कृष्णाय नमः
फट्' मन्त्र से या मन्त्र के सभी वर्णों को पृथक्-पृथक् लिखकर 'यं' मन्त्र
का उच्चारण करते हुए चन्दन जल से प्रत्येक को सौ या दस बार
ताड़ित करना 'ताड़नसंस्कार' है ।
५. अभिलेख संस्कार—भोजपत्र पर मन्त्र लिखकर 'रां हंसः' इस मन्त्र से
अभिमंत्रित करते हुए हजार बार जपे हुए जल से अश्वत्थ पत्र आदि से
मन्त्र का अभिषेक करना चाहिए । या समस्त मन्त्र-वर्णों को लिखकर
वर्णसंख्यक रक्त करवीर पुष्पों द्वारा 'रं' मन्त्र से एक-एक बार समस्त
वर्णों को अभिमंत्रित करके अश्वत्थ पत्रों द्वारा मन्त्रोक्त-विधान द्वारा सभी
मन्त्र-वर्णों का सिञ्चन करना चाहिए । यही पद्धति—'अभिषेक' है ।
६. विमलीकरण संस्कार—'ॐत्रों वषट्'—इन वर्णों से मन्त्र को सम्पुटित
करके एक हजार बार जप करने से—'विमलीकरण' संस्कार सम्पन्न होता
है यथा—“ॐत्रों वषट् कृष्णाय नमः वषट् त्रों ॐ” । या दूसरे विधान
के अनुसार—सुषुम्ना के मूल एवं मध्य भाग में देवमन्त्र का चिन्तन
करके ज्योतित मन्त्र—'ॐ हौं' में मल तत्र को दग्ध करना 'विमलीकरण
संस्कार' कहलाता है ।
७. जीवन संस्कार—'स्वधा', 'वषट्' मूल मन्त्र का एक हजार बार जप
करना ही जीवन संस्कार है—यथा—“स्वधा वषट् कृष्णाय` नमः वषट्
स्वधा” मन्त्र-वर्णों को पंक्ति-क्रम में प्रणव द्वारा संपुटित करके एक-एक
वर्ण का दस बार जप करना जीवन-संस्कार कहलाता है ।
८. तर्पण संस्कार—दुग्ध, जल, घृत के द्वारा मूल मन्त्र का उच्चारण करते
हुए सौ बार तर्पण करना 'तर्पण संस्कार' कहलाता हैं । अन्य विधि के
अनुसार—ज्योति मन्त्र द्वारा देव मन्त्र की वर्ण संख्या के अनुसार जल से
तर्पण कराना 'मन्त्र-तर्पण' कहलाता है—१. शक्तिमन्त्र में तर्पण—मधु से
२. विष्णुमन्त्र में तर्पण—कपूरयुक्त जल से ३. शिवमन्त्र में तर्पण—
दुग्ध-घृत से किया जाता है ।
९. गोपन संस्कार—'ह्रीं' बीज से सम्पुटित मन्त्र का एक हजार बार जप

५६ वरिवस्यारहस्ये
यथा—‘ह्रीं कृष्णाय नमः ह्रीं’ या मन्त्र को विप्रकट रखने से गुप्ति या
गोपन संस्कार संपादित होता है ।
१०. आप्यायन संस्कार—‘हौं’ बीज सम्पुटित मन्त्र का एक हजार बार जप
करने से आप्यायन संस्कार निष्पादित होता है यथा—‘‘हौं कृष्णाय नमः
हौं’’ । अन्य विधान के अनुसार—मन्त्र के समस्त वर्णों को कुशोदक
या पुष्पोदक द्वारा ज्योतिर्मन्त्र में आप्यायित करने की आख्या ही
‘आप्यायन’ है । इस पद्धति से सुसंस्कृत मन्त्र आशु सिद्धिप्रद होते हैं ।
मन्त्र का इस प्रकार जप करने पर भी एक सामान्य जप-विधान कथमपि
विस्मृत नहीं करना चाहिए कि जप—१. तन्निष्ठ, २. तद्गतप्राण, ३. तच्चित्त, ४.
तत्परायण, ५. तत्पदार्थानुसंधान के साथ अनन्यमन से करना चाहिए—‘तन्निष्ठ
तद्गतप्राण तच्चित्तस्तत्परायणः । तत्पदार्थानुसंधानं कुर्वन्मन्त्रं जपेत् प्रिये ॥’¹
यह भी आवश्यक है कि जो भी जप किया जाय उसकी गणना भी कर ली
जाय क्योंकि—‘‘गणनाहीनो जपो निष्फलः ॥’’ अक्षत, हाथों के पर्व, धान्य, पुष्प,
चन्दन, मृतिका आदि द्वारा कभी मन्त्र की गणना नहीं करनी चाहिए इसीलिए जप
के लिए माला-विधान है ।
महासेतु (बीजाक्षर) के बिना भी जपा हुआ मन्त्र भी निष्फल हुआ करता है ।
आदि में महासेतु फिर सेतु का जप करने के बाद ही मन्त्र का जप करना चाहिए
अन्यथा मन्त्र-जप निष्फल होता है ।²
१४. मन्त्र के संस्कार—
जननं जीवनं पश्चात्ताडनं बोधनं तथा ।
तथाभिषेको विमलीकरणाप्यने मनोः ॥ ७५ ॥
तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्र संस्क्रियाः ।
मन्त्राणां मातृकामध्यादुद्धारो जननं स्मृतम् ॥ ७६ ॥³
नवविध मन्त्रवाद—दीपनं बोधनं चैव ताडनं चाभिषेचनम् । विमलीकरणं चैव
तथेन्धननिवेशनम् । संतर्पणं गुप्तिभाव आप्यायो नवमस्तथा । एवं नवप्रकारेण
मन्त्रवादमशेषतः । यो जानाति स जानाति मन्त्रसाधनमुत्तमम् ॥ ये नौ तत्त्व ही
‘मन्त्र-साधन’ हैं ।⁴
‘दीपन’ = मन्त्र के प्रणव द्वारा । ‘बोधन’ = नमः शब्द द्वारा । ‘ताडन’ =
‘फट्’ द्वारा । ‘अभिषेचन’ = वौषट् द्वारा । ‘विमलीकरण’ = ‘स्वाहा’ द्वारा ।
‘इन्धन-निवेशन’ = दाह्यपाशविषादिदहन, हुङ्कार द्वारा विनियोजन । ‘तर्पण’ =
बलवत्ताधान और प्रतिवर्ण लङ्कार से संपुटीकरण । ‘गुप्तिभाव’ = रक्षणाम् ।
नेत्रनाथ का संपुटीकृत अयुत जप द्वारा । ‘आप्यायन’ = पुनर्जातबल का पुष्ट्याधान
१. शा० (९, १७) २-३. ‘शाक्तानन्द तरंगिणी’
४. नेत्रतन्त्र (१८।१६-८)

भूमिका ५७

(वाङ्गार द्वारा प्रतिवर्ण संपुटीकरण करने से) ।१ यहीं है मन्त्रों का दशविध संस्कार ।
'शारदातिलक' में शान्ति-वशीकरण-स्तंभन-विद्वेषण-उच्चाटन-मारण अभिचारों में—
ग्रथन-विदर्भ-संपुट-रोधन-योग-पल्लव—विन्यासों का उल्लेख किया गया है ।
१५. आराधनीय मन्त्र—
नेत्रतन्त्र-(१८।१२-१३) में निम्न मन्त्रों को ही आराधनीय कहा गया है—१.
सिद्ध २. सुसिद्ध—'सिद्धं साध्यं सुसिद्धं च तथैवारि त्वमेव च । ज्ञात्वा सर्वमशेषेण
मन्त्रन्यासं समाचरेत् ॥' सिद्धादिमन्त्रों के परिज्ञान के उपाय के लिए 'स्वच्छन्दतन्त्र'
(८।२४) अवलोकनीय है ।२
मन्त्रों का उदयास्त—मन्त्रों का उदयास्त, व्याप्ति, ध्यान, मुद्रा भी जानना
आवश्यक है ।३
१६. मन्त्रों के नौ तत्त्व—
'कामधेनुतन्त्र' में मन्त्रों के निम्न नौ तत्त्वों का उल्लेख किया गया है—
'देवतत्त्वं प्राणतत्त्वं बिन्दुतत्त्वं च सुन्दरि । ज्ञानतत्त्वं शक्तितत्त्वं योनितत्त्वं तथैव च ।
नवतत्त्वमिदं प्रोक्तं कामधेनु मतं प्रिये ॥'
१७ मन्त्र के स्थान—
मन्त्रों के छः स्थान हैं और वही पर मन्त्र स्थित हैं—और इन्हें 'स्थानस्थ'
कहा गया है—(१) सकल (२) निष्कल (३) सूक्ष्म (४) सकल निष्कल
(५) कलाभिन्न (६) कलातीत ('षोढामन्त्रं शिवोऽब्रवीत् ।) मन्त्र के ये छः प्रकार
हैं—१. सकल मन्त्र—ब्रह्मरंध्रस्थ २. निष्कल मन्त्रस्थान—ब्रह्मरंध्र के नीचे ३.
सूक्ष्म—मानस ४. सकलनिष्कल मन्त्र का स्थान—हृदय ५. कलाभिन्न मन्त्र का
स्थान—बिन्दु ६. कलातीत मन्त्र—बिन्दु से ऊपर का स्थान ॥
१८. सर्वथा ग्राह्यमन्त्र—
हंसमन्त्र, अष्टाक्षरमन्त्र, पञ्चाक्षरमन्त्र, एक, दो, तीन आदि बीजरूपमन्त्र—में
सिद्धादि शोधन की आवश्यकता नहीं है— "स्वप्नलब्धे स्त्रिया दत्ते मालामन्त्रे च
त्र्यक्षरे । वैदिकेषु च सर्वेषु सिद्धादीन्नैव शोधयेत् । हंसस्याष्टाक्षरस्यापि तथा पञ्चाक्षरे
च । हंस स्याष्टाक्षरस्यापि तथा पञ्चाक्षरस्य च । एकद्वित्र्यादि बीजस्य सिद्धादीन्नैव
शोधयेत् ॥" (स्वप्नप्राप्त, नारीगुरु से प्राप्त, बीस अक्षरों से अधिक अक्षरों वाला
मन्त्र, त्र्यक्षरान्त, वैदिक मन्त्रों में—सिद्धादि शोधन की आवश्यकता नहीं है ।)
१९. जप—
हृदयाकाश (अनाहत प्रदेश) में सर्वदा ही भगवती का आनन्दमय स्वरूप
नादरूप में परिणत होकर चारों ओर संसर्पित है । मन बाह्यमुखी होने के कारण
१. शारदातिलक (२।११२) २. स्वच्छन्द तन्त्र (८।२४)
३. नेत्रतन्त्र (१८।१३-१४)

५८ वरिवस्यारहस्ये
इसे सुन नहीं पाता । मध्यमा-भूमि में जब नाद के सहित मन्त्र स्वभावतः ध्वनित
हो उठता है तभी उसे 'आन्तर जप' मानना चाहिए । अपने-अपने विषयों से
समस्त इन्द्रियों का सञ्चार निरुद्ध करके आभ्यन्तर नाद का उच्चारण करना ही
वास्तविक जप है—
"संयम्येन्द्रियग्रामं प्रोचरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्य जपो जपः ॥"१
शुद्ध विद्या भूमि में स्थित विघ्नेश्वररूपी श्रीगुरु के मुख से निकली वाणी
'मध्यमावाक्' के रूप में प्रकट होती है । यह वाणी सहस्रदल कमल के दलों से
हृदयपर्यन्त श्रुतिगोचर होती है ।
'तन्त्रालोक' में अभिनवगुप्त ने 'जप' का निम्न लक्षण बताया है—
"तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥" (१।९०)
शिव के परावाक्स्वभाव, अनाहतनादमयस्वरूप का बार-बार परामर्श करना ही
'जप' है ।
'शिवसूत्र' में कहा गया है—'कथाजपः' ॥ (३।३७)
'विज्ञानभैरव' में 'जप' का स्वरूप इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
'भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥' (वि०भै०)
'अहमेव परोहंसः शिवः परमकारणम्' (स्व० ४।३९९)—इस प्रकार अहर्निश
स्वभावतः प्रवर्तमान अपने प्राणमय अजपास्वरूप का विमर्श (विमर्शना)—इस
अनाहतनादरूपी शब्द (सोऽहं हंसः) की निरन्तर भावना ही 'जप' है । जपनीय
मन्त्र भी स्वयं नादात्मक ब्रह्म ही है जिसमें कि अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप
का सतत् परामर्श होता रहता है ।
'श्रीकण्ठीसंहिता' में ठीक ही कहा गया है कि—मन्त्र और मन्त्री (मन्त्र +
मन्त्रजापक) तथा मन्त्राधिष्ठात्री देवता—ये कभी पृथक नहीं माने जाते । भावनात्मक
जप यही नादात्मक मन्त्र है ।
ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनीकार प्रश्न उठाते हैं कि शब्दावृत्ति से ही तो जप-सिद्धि
होती है परावाक्स्वभाव अनाहत नाद का जप कैसे किया जा सकता है?—इसका
उत्तर देते हुए वे स्वयं कहते हैं कि—स्वात्मस्वरूप एक बार ही प्रकाशित होता है
बार-बार उसके प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं होती उसी प्रकार यह जप भी
एक बार ही प्रत्यभिज्ञात होता है और अपने प्राणशक्ति के इस स्वाभाविक व्यापार
को एक बार पहचान लेने पर फिर बार-बार इसको पहचानने की आवश्यकता नहीं
होती ।२ इसीलिए पूजा भी बाह्य-प्रयास नहीं है प्रत्युत्—
१. योगिनीहृदय 'दीपिका' (पृ० १९५) २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी

भूमिका ५९
'पूजा' नाम न पुष्पाद्यैर्यामतिः क्रियते दृढ़ा।
निर्विकल्पे परेव्योम्नि सा पूजा ह्यादशल्लयः ॥१
मन्त्र, मन्त्री एवं मन्त्रवाच्य देवता तीनों को एक समझकर जप करना ही
यथार्थ जप है क्योंकि अन्यथा सिद्धि संभव नहीं—
'पृथङ्‌मन्त्रः पृथङ्‌मन्त्री न सिध्यति कदाचन ॥'
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—महामन्त्रात्मक अकृतकाहंविमर्शारूढ़ जो जो
आलापादि हैं उनका स्वात्मदेवता विमर्शनिवृर्तावर्तनात्मा जो जप है वही कथा है ।
यह कथा ही 'जप' है ।
जप—अर्थानुसंधानपूर्वक मन्त्रोच्चारण ही 'जप' है । विद्यानन्द ने जप को
आणव-शाक्त-शांभव उपायों से अनुप्राणित कहा है । यद्यपि अर्थानुसंधानरहित
मन्त्राक्षरों की पुनरावृत्तिरूप यह साधना भी 'मन्त्र' कही जाती है किन्तु योगसूत्रकार
पतञ्जलि ने—'तज्जपस्तदर्थ भावनम्' (१।२८) कहकर जप के साथ अर्थभावन की
अनिवार्यता प्रतिपादित की है । इसीलिए 'योगिनीहृदय' में छः प्रकार के एवं
'वरिवस्यारहस्यम्' में पन्द्रह प्रकार के अर्थ बताए गए हैं ।
(क) त्रैपुरदर्शन में जप-लक्षण—त्रैपुरदर्शन में जप के निम्न लक्षण बताए
गए हैं—१. मन्त्र के वर्णों का उच्चारण २. शून्य ३. विषुव ४. अवस्था ५.
चक्र ॥
“एवमवस्थाशून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्चषट्सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ॥ (वरि०)
अर्थात् मन्त्रों के वर्णों का उच्चारण करते हुए पाँच अवस्था । छः शून्य एवं
सात विषुवों के साथ नौ चक्रों का स्मरण करना एवं मन्त्र के अर्थ का चिन्तन
'जप' कहलाता है ।२-३ वामकेश्वरदर्शन में जप के समय तीन निम्न तत्त्वों का
विधान किया गया है२—१. चक्रभावन २. अवस्थापञ्चक आदि. ॥
(ख) जप के प्रकार—जप के मुख्य प्रकार निम्न हैं—१. वाचिक वैखरी जप
२. उपांशु जप ३. मानस जप ॥ जप के अन्य प्रकार भी है । यथा नित्य,
नैमित्तिक, प्रायश्चित्त, भ्रामरी, अजपा ।
(ग) प्रातःकृत्य-विधान—ध्यान एवं जप—'तारारहस्य', 'तारागम',
'महानीलतन्त्र', 'तारानिगम', 'तारासार' आदि ग्रन्थों में कहा गया है कि मन्त्रसिद्धि
के लिए यह प्रातःकृत्य आवश्यक है क्योंकि इसके बिना सिद्धि संभव नहीं—
१. विज्ञान भैरव २. वरिवस्यारहस्यम्
३. 'जपनं जपः', 'जपः स्यादक्षरावृत्ति' (जप मानसे च (भ्वा०प०से०) 'व्यधजपोः'
सूत्र से जप निष्पन्न होता है ।) जप का फल—'पठतो नास्ति मूर्खत्वं जपतो नास्ति
पातकम् ।'

६० वरिवस्यारहस्ये
'प्रातःकृत्यं विना देवि ! न सिद्धिर्जायते शिवे'—मन्त्र-साधना में सिद्धि का अन्य
विधान इस प्रकार है ।
(घ) जप एवं पूजा का सोपान-बद्ध विधान—'तारारहस्य' में इसका विधान
इस प्रकार दिया गया है—१. (स्नान के पूर्व) ब्रह्ममुहूर्त वेला में उठकर पद्मासन
या स्वस्तिकासन में स्थित होकर सिर में द्वादशाक्षरोपेत पद्म के भीतर सहस्रदलपद्म
में स्थित श्वेतवर्ण सद्गुरु के वामभाग में स्थित रक्तवर्ण शक्ति का ध्यान करके
मानसोपचार से उनका पूजन करके ऐं (वाग्भव मन्त्र) का १०८ बार जप करके
एवं जप-समर्पण करते हुए—'अखण्डमण्डलाकारं... नमः ।' मन्त्र द्वारा उनका
अभिवादन करके, चैतन्य आत्मा का अनुभव करना चाहिए । 'सहस्रारे महापद्मे
कर्पूरधवलं गुरुम् । उत्थाय पश्चिमे यामे तच्चैतन्यं समाचरेत्” । इसके बाद
स्वस्तिकासनस्थ होकर उन कुण्डलिनी देवी का ध्यान करें जो कि मूलाधार में साढ़े
तीन बार वलयान्वित होकर स्वयंभूलिङ्ग को वेष्टित करके स्थित हैं—परब्रह्ममयी
हैं—जो अनेक प्रणवों की एकाकृति हैं—उन कुण्डलिनी देवी को चित्रिणी नामक
ब्रह्मनाड़ी में प्रविष्ट कराना चाहिए और उन्हें सभी कमलों में घुमाकर हृत्पद्म में
लाकर उनका मानसोपचारों से पूजन करना चाहिए । उनके मध्य में रक्तवर्ण
आदिशक्ति का ध्यान करना चाहिए । इसके बाद, मूल मन्त्र का जप करना चाहिए
तभी सिद्धि मिल सकती है ।
(ङ) जप-क्रम—आँ ह्रीं क्रौं (कुल्लुका मन्त्र) का जप शीर्षस्थान में १०
बार, मुख में 'सेतु' (हौ) का जप ७ बार, हृदय में पुट (ऐं) का जप ॐकार के
साथ करने से तारोपासना में मन्त्रसिद्धि होती है—
“कुल्लुकां प्रजपेच्छीर्षे दशधा मन्त्रसिद्धये ।
मुखे सेतुं सप्तधा च प्रणवेन पुटं हृदि ॥” १
'जप' के सम्बन्ध में विभिन्न दार्शनिकों की दृष्टियाँ—
महामन्त्रात्मकाकृतकाहंविमर्शीरूढस्य यद्यदालापादि तत्तदस्यस्वात्मदेवता विमर्शा-
नवरतावर्तनात्मा जपो जायते । २
'वरदराज' वार्तिक में 'जप' की व्याख्या करते हुए कहते हैं— “महामन्त्रमयं
नौमि रूपं ते स्वच्छशीतलम् । अपूर्वामोदसुभगं परामृतरसोल्बणम् । इति श्रीप्रत्यभिज्ञा-
कृद्दैशिकप्रोक्तया दिशा । अकृत्रिमाहाममर्शमयेस्वात्मावमर्शिनः । या या स्वैराभिलापात्मा
कथा याथार्थ्यवादिनः । भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या । जपः सोऽत्र
स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥” ३
प्रत्येक जीव अहर्निश जो 'सोऽहं सोऽहं' या 'हंसः हंसः' का जप किया
करता है वही 'जप' है—षट्शतानि दिवारात्रं सहस्रान्येक विंशतिः । जपो देव्याः
१. 'तारारहस्य'
२. क्षेमराज—'शिवसूत्रविमर्शिनी' (सूत्र २७) ३. शिवसूत्रवार्तिकम्

भूमिका ६१
समुद्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥''—इत्युक्तनीत्या. सा सर्वस्वात्मेशामर्शसंपदः ।
जानिपालन धर्मत्वाज्जप इत्यभिधीयते ॥'' अथेदृग्विधयोगीन्द्रविषं यापि च या कथा ।
जपः सोऽपि जनस्योक्तो जनिपालनयोगतः ॥''¹ इसी तथ्य को उपनिषदों में भी
प्रतिपादित किया गया है—‘सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः । हंस हंसेत्यतो
मन्त्रं जीवो जपति नित्यशः । षट्शतानि दिवरात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः । जपो देव्या
विनिर्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥''
जप होता है मन्त्र का और 'मन्त्रमयी भूमि' है मध्यमा-भूमि ॥ मध्यमावाक्
मन्त्ररूप में ही आत्मप्रकाशन करती है । वैखरी भूमि में चिदंश आच्छन्न रहता है ।
मध्यमा में नादमय चिद्रश्मि नित्य विराजमान है । 'मध्यमा' है—दो प्रान्तों का
मध्यवर्ती—१. एक प्रान्त में दिव्य पश्यन्ती २. दूसरे प्राप्त में पाशव वैखरी ।
मध्यमा दोनों का सेतु है ।
उन्मनापर्यन्त सम्पूर्ण मन्त्रावयवों का १०८१७ बार उच्चारण—नाद का अन्त
एवं परमपद की प्राप्ति ॥
२०. जप के साथ मन्त्रार्थ भावना—
“नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति । भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं
हविर्ज्वलति ॥’’² भास्कराचार्य ने मन्त्रों के निम्न अर्थ बताए हैं—१. प्रतिपाद्यार्थ २.
भावार्थ ३. संप्रदायार्थ ४. निगर्भार्थ ५. कौलिकार्थ ६. रहस्यार्थ ७. महातत्त्वार्थ ८.
नामार्थ ९. शब्दरूपार्थ १०. नामैकदेशार्थ ११. शाक्तार्थ १२. सामरस्यार्थ १३.
समस्तार्थ १४. सगुणार्थ १५. महावाक्यार्थ ॥ पञ्चदशीमन्त्र में जितने वर्ण हैं
(अर्थात् १५) उतने ही अर्थ हैं ।³
'योगिनीहृदय' में भी मन्त्रार्थ के विभिन्न प्रकार समुद्दिष्ट हैं यथा—भावार्थ,
संप्रदायार्थ, कौलिकार्थ, निगर्भार्थ, महातत्त्वार्थ, रहस्यार्थ आदि ॥
१. मन्त्र के अवयवभूत अक्षर का अर्थ ही है—‘भावार्थ' ।
२. परमात्मा के मुख से या अवतरणक्रम या परम्परागत ज्ञान—'संप्रदायार्थ' है।
३. परमात्मा, गुरु एवं आत्मा का ऐक्यानुसंधान ही है—'निगर्भार्थ' ।
४. चक्र, देवता, विद्या, गुरु एवं साधक का ऐक्यानुसंधान है—'कौलिकार्थ' ।
५. कुण्डलीरूपा विद्या ही साधक की स्वात्मा है ऐसा ऐक्यानुंधान है—
'रहस्यार्थ' ।
६. विश्वातीतः एवं विश्वमय निज गुरु के द्वारा प्रबोधित स्वकीय आत्मा का
ऐक्यानुप्रवेश ही है—‘महातत्त्वार्थ' ।⁴
भास्करराचार्य के मतानुसार—
१. ‘प्रतिपाद्यार्थ'—प्रथम अर्थ है । अन्य अर्थ निम्न हैं—

१. शिवसूत्रवार्तिकम् २-३. वरिवस्यारहस्यम् (२।५४)
४. गोपीनाथ कविराज—'भा० सं० और साधना'