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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 530 में से

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४२ वरिवस्यारहस्ये
शक्ति के ताने-बाने से विनिर्मित मन्त्राक्षरों का ही ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति
परम व्योम में निवास करती है और परमामृत से समृद्ध है।—उक्त पद्धति से जप
करने पर मन्त्र अपना स्वस्वरूप उद्घाटित कर देता है और अपने ऊपर से
आवरण का उन्मोचन कर देता है।
‘श्रीकालपरा’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—शब्दनादात्मक हैं। उनके
साथ प्रत्यय, (संवित्) संलग्न रहता है और उनमें वृद्धि करता है। मन्त्रबोध के
स्वरूप में स्थित जो संवित् है वह मन्त्र से अभिन्न है अतः वह आत्म-बोध करा
देती है।
‘सङ्कर्षणसूत्र’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है।
भाव एवं अभाव उसकी दिशाएँ एवं परिष्कार है। वह स्वसंवेदन-संवेद्य है। वह
प्रकृति का विषय भी है साथ ही वह प्रकृत्यातीत भी है। यही है मन्त्रों का
प्रत्ययात्मक कारण। मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णरूप से प्रकट होते है। वे शाश्वत
पदरूप मन्त्र मनुष्य के कर-चरण आदि के समान है। वीर्य के योग से प्रत्येक
काल में ये मन्त्र-प्रयोग सिद्ध होते हैं।१
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप
किये जाने पर वह लक्ष बार किए गए जप के समान फल वाला हो जाता ‘है।२
‘जयसंहिता’-नामक ग्रन्थ में इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुए कहा गया है
कि—जब एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाते हैं
तब ऐसे जप को लक्षसंख्या से भी अधिक महनीय समझना चाहिए। इन्हीं भावों
को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्रा सर्वज्ञबलशालिनः।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः॥”३
ये मन्त्र-साधक चित्त की प्रवृत्ति-निवृत्ति के निमित्त (साधक की इच्छा होने पर)
शक्तिस्वभाव में लीन हो जाते हैं क्योंकि मन्त्र स्वस्वभाव के अनुगामी एवं शक्तिरूप
हैं।४
‘कालपरा’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—पर अक्षर रूप विटप में अनेक
शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनके विवर्त शक्तिरूप में वर्णों के माध्यम से प्रकट होते हैं।
ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण शान्त एवं निरञ्जन हैं। मन्त्र सर्वज्ञ एवं
सर्वकर्ता हैं। मन्त्र शिवधर्मी हैं। आचार्य कल्लट ने ‘स्पन्दकारिका’ में इसकी पुष्टि
करते हुए कहा है—
“तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः।
सहसाधक चित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः॥”५
१. संकर्षणसूत्र २. स्पन्द प्रदीपिका
३. स्पन्द कारिका ४. स्पन्द प्रदीपिका
५. स्पन्द कारिका