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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 530 में से

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५८ वरिवस्यारहस्ये
इसे सुन नहीं पाता । मध्यमा-भूमि में जब नाद के सहित मन्त्र स्वभावतः ध्वनित
हो उठता है तभी उसे 'आन्तर जप' मानना चाहिए । अपने-अपने विषयों से
समस्त इन्द्रियों का सञ्चार निरुद्ध करके आभ्यन्तर नाद का उच्चारण करना ही
वास्तविक जप है—
"संयम्येन्द्रियग्रामं प्रोचरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्य जपो जपः ॥"१
शुद्ध विद्या भूमि में स्थित विघ्नेश्वररूपी श्रीगुरु के मुख से निकली वाणी
'मध्यमावाक्' के रूप में प्रकट होती है । यह वाणी सहस्रदल कमल के दलों से
हृदयपर्यन्त श्रुतिगोचर होती है ।
'तन्त्रालोक' में अभिनवगुप्त ने 'जप' का निम्न लक्षण बताया है—
"तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥" (१।९०)
शिव के परावाक्स्वभाव, अनाहतनादमयस्वरूप का बार-बार परामर्श करना ही
'जप' है ।
'शिवसूत्र' में कहा गया है—'कथाजपः' ॥ (३।३७)
'विज्ञानभैरव' में 'जप' का स्वरूप इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
'भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥' (वि०भै०)
'अहमेव परोहंसः शिवः परमकारणम्' (स्व० ४।३९९)—इस प्रकार अहर्निश
स्वभावतः प्रवर्तमान अपने प्राणमय अजपास्वरूप का विमर्श (विमर्शना)—इस
अनाहतनादरूपी शब्द (सोऽहं हंसः) की निरन्तर भावना ही 'जप' है । जपनीय
मन्त्र भी स्वयं नादात्मक ब्रह्म ही है जिसमें कि अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप
का सतत् परामर्श होता रहता है ।
'श्रीकण्ठीसंहिता' में ठीक ही कहा गया है कि—मन्त्र और मन्त्री (मन्त्र +
मन्त्रजापक) तथा मन्त्राधिष्ठात्री देवता—ये कभी पृथक नहीं माने जाते । भावनात्मक
जप यही नादात्मक मन्त्र है ।
ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनीकार प्रश्न उठाते हैं कि शब्दावृत्ति से ही तो जप-सिद्धि
होती है परावाक्स्वभाव अनाहत नाद का जप कैसे किया जा सकता है?—इसका
उत्तर देते हुए वे स्वयं कहते हैं कि—स्वात्मस्वरूप एक बार ही प्रकाशित होता है
बार-बार उसके प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं होती उसी प्रकार यह जप भी
एक बार ही प्रत्यभिज्ञात होता है और अपने प्राणशक्ति के इस स्वाभाविक व्यापार
को एक बार पहचान लेने पर फिर बार-बार इसको पहचानने की आवश्यकता नहीं
होती ।२ इसीलिए पूजा भी बाह्य-प्रयास नहीं है प्रत्युत्—
१. योगिनीहृदय 'दीपिका' (पृ० १९५) २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी