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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 530 में से

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पृष्ठ 63

भूमिका ५३
मन्त्रतत्वानि महाविद्यां जपेत्तु यः । सर्वं तस्य वृथा देवि । किं तस्य जपपूजनैः ।
ध्यानावधारणे चैव तथा योगसमाधिना । वर्णज्ञानं यदा नास्ति किं तस्य जप पूजनै ?'१
१०. मन्त्र और मन्त्रयोग—
योग की चार शैलियों में प्रथम शैली है—'मन्त्रयोग' । 'मन्त्रयोग' क्या है?
प्राणी का अहर्निश (श्वास-प्रश्वास के द्वारा) 'ह' एवं 'सः' का जप एवं इसे—'सोऽहं'
के रूप में परिणतीकरण ।। 'मन्त्रयोग' के निम्न सोलह अङ्ग है—भक्ति, शुद्धि,
आसन, पञ्चाङ्गसेवन, आचार, धारणा, दिव्यदेशसेवन, प्राणक्रिया, मुद्रा, तर्पण,
हवन, बलि, याग, जप, ध्यान और समाधि ।। योग-साधन की चार शैलियों में से
प्रथम शैली है मन्त्रयोग ।। मन्त्रयोग का सिद्धान्त यह है कि परमात्मा से भाव, भाव
से नामरूप एवं उसका विकार एवं विलासमय यह संसार है । जिस क्रम से सृष्टि
हुई उसके विपरीत मार्ग से ही लय होगा । परमात्मा से भाव एवं भाव से नामरूप
द्वारा सृष्टि हुई जिससे जीव बंधन में पड़े हुए हैं—यदि इस बंधन से मुक्ति-लाभ
करना हो तो प्रथम नाम-रूप का आश्रय लेकर, नाम-रूप से भाव में, और भाव
से भावग्राही परमात्मा में चित्तवृत्ति का लय होने पर ही मुक्ति होगी । इसी कारण
ऋषियों ने नाम एवं रूप के अवलम्बन से साधन की विधियाँ बतायी हैं—इसी का
नाम 'मन्त्रयोग' है ।
“नामरूपात्मिका सृष्टिर्यस्मात्तदवलम्बनात् ।
बंधनान्मुच्यमानोऽयं मुक्तिमाप्नोति साधकः ॥
तामेव भूमिमालम्ब्य स्खलनं यत्र जायते ।
उत्तिष्ठति जनः सर्वोऽध्यक्षेणैतत्त्समीक्ष्यते ॥''
११. मन्त्रों के पञ्चलक्षण—
साधकों के सामने मन्त्र पञ्चधास्थित हुआ करते हैं—'स्पर्शनं चावलोकञ्च
संभाषा बिन्दुदर्शनम् । स्वयमावेशनं चैव मन्त्राणां पञ्च च लक्षणम् ।।' (उत्तरषट्क)
मन्त्र-सिद्धि के प्रतिबन्धक—नेत्रतन्त्र (८।५९-६२) में निम्न विघ्नों को
मन्त्रसिद्धि का प्रतिबन्धक माना है—'भावहीनास्तु ये मन्त्राः शक्तिहीनास्तु कीलिताः ।
वर्णमात्राविहीनास्तु गुर्वागमविवर्जिताः । भ्रष्टाम्नायविहीना ये आगमोज्झितविघ्निताः । न
सिद्ध्यन्ति यदा देवि जप्ता इष्टाः सहस्त्रशः ।। असिद्धा रिपवो ये च सर्वांशक-
विवर्जिताः । आद्यन्तसंपुटेनैव साद्यर्णेन तु रोधिताः ।।" (८।५९-६२)
१२. मन्त्रों में दोषोत्पादन—
नेत्रतन्त्र (१६।३३-३६) में मन्त्रों के इन दोषों का इस प्रकार वर्णन किया
गया है—'कीलनं चैत मन्त्राणां भेदनं मोहनं तथा । संत्रासं ताडनं चैव जृंभनं स्तंभनं
तथा । रिपुत्वकरणं चान्यत् प्रत्यंगिरत्वमेव च । सर्वहानिविधायित्वं क्रियते दुष्टमंत्रिभिः ।
एवं दशप्रकारेण प्रयतन्ते हि हिंसकाः'' ।। आदि ।।
१. कामधेनु तन्त्र