वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४९
में यही ओंकार है—'एको नादात्मको वर्णः सर्ववर्णविभागवान् । 'सोऽनस्तमित-
रूपत्वादनाहत इहोदितः ।। (तन्त्रालोक ६ आ०)
मन्त्र का लक्ष्य है 'देवता' किन्तु देवता का मूल है 'बीज' । क्योंकि देवता
के शरीर का जन्म इसी बीज से होता है—"देवतायाः शरीरं तु बीजादुत्पद्यते
ध्रुवम् ।।''१ मूल बीजों का भी आदिमूल बीज है ओंकार ।। समस्त वर्णों के पीछे
एक अनाहत वर्ण है जो कि अनवरत रूप से नादात्मक है । वर्णात्मक मन्त्रों में
सर्वदा सतत् उच्चाररूप अनाहत नाद सञ्चरित होता रहता है और वह अनाहत नाद
अन्य कोई ओंकार ही है । मन्त्रों में संवित् ही स्पन्दित होती है । मन्त्रों में स्पन्द
भी स्फुरित है । यथा अरघट्ट के चक्र में यदि बाल्टी को ठीक कर लिया जाय तो
ठीक काम करने लगती है—'यथेष्ट पानी लाती है—तद्वत् अनुसंधान-बल से
यत्नपूर्वक देवता रूप होने से मन्त्र द्वारा तादात्म्य की प्राप्ति होती है । चूँकि भेद
भी स्पन्दाधीन है प्राण भी स्पन्दाधीन है अतः प्राणानुशासन के साथ भेद-निवृत्ति-
पूर्वक अभेदात्मक जप के लिए प्राण-साम्य भी आवश्यक है । प्राणों की
साम्यावस्था सुषुम्णा में है । 'मानसजप' में प्राणशक्ति के उदय, सङ्गम एवं शान्ति
में जप किया जाता है । प्राणशक्ति के उदयस्थान कुण्डलिनी में, हृदयदेश में एवं
(जहाँ प्राणशक्ति शान्त होती है उस) ऊर्ध्व देश में जप किया जाता है ।२ इस जप
में ओंकार का ही जप होता है । जप के सात स्थान हैं—उदय-सङ्गम-शान्त के
अतिरिक्त प्राणापान के प्रवाह में, अक्ष नाड़ीचक्र सूत्रों में, हृदयदेश के 'हंस' नामक
स्थान में, एवं सहस्रार में—सप्त प्रकार का जप है । यही है मानस जाप-अजपा
जाप जो कि मूलतः ओंकार से अनुप्राणित है ।३
७. प्रणवरूप 'मूलमन्त्र' के अवयव—मूलमन्त्र 'प्रणव' है । इसी कारण
प्रत्येक मन्त्र के प्रारंभ में उसको जोड़ा जाता है । इस मूल मन्त्र के द्वादश अवयव
हैं जो कि निम्न हैं—
१. अकार, २. उकार, ३. मकार, ४. बिन्दु, ५. अर्धचन्द्र, ६. निरोधिनी,
७. नाद, ८. नादान्त, ९. व्यापिनी, १०. शक्ति, ११. समना, १२. उन्मना—
'अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्द्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समनाश्चेति सामयाः ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ।।'४
“अकारं ब्रह्मणो रूपं उकारं विष्णुरूपवत् । मकारं रुद्ररूपं स्यादर्धमात्रं
परात्मकम् । वाचं तत्परमं ब्रह्मवाचकः प्रणवः स्मृतः । वाच्यवाचक सम्बन्धस्तयोः
स्यादौपचारिकः ।।"—बृहन्नारदीय
१. शाक्तानन्दतरंगिणी, यामल
२-३. अभिनवगुप्त—'तन्त्रालोक' (३१ आ०)
४. नेत्रतन्त्र