वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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यथा—‘ह्रीं कृष्णाय नमः ह्रीं’ या मन्त्र को विप्रकट रखने से गुप्ति या
गोपन संस्कार संपादित होता है ।
१०. आप्यायन संस्कार—‘हौं’ बीज सम्पुटित मन्त्र का एक हजार बार जप
करने से आप्यायन संस्कार निष्पादित होता है यथा—‘‘हौं कृष्णाय नमः
हौं’’ । अन्य विधान के अनुसार—मन्त्र के समस्त वर्णों को कुशोदक
या पुष्पोदक द्वारा ज्योतिर्मन्त्र में आप्यायित करने की आख्या ही
‘आप्यायन’ है । इस पद्धति से सुसंस्कृत मन्त्र आशु सिद्धिप्रद होते हैं ।
मन्त्र का इस प्रकार जप करने पर भी एक सामान्य जप-विधान कथमपि
विस्मृत नहीं करना चाहिए कि जप—१. तन्निष्ठ, २. तद्गतप्राण, ३. तच्चित्त, ४.
तत्परायण, ५. तत्पदार्थानुसंधान के साथ अनन्यमन से करना चाहिए—‘तन्निष्ठ
तद्गतप्राण तच्चित्तस्तत्परायणः । तत्पदार्थानुसंधानं कुर्वन्मन्त्रं जपेत् प्रिये ॥’¹
यह भी आवश्यक है कि जो भी जप किया जाय उसकी गणना भी कर ली
जाय क्योंकि—‘‘गणनाहीनो जपो निष्फलः ॥’’ अक्षत, हाथों के पर्व, धान्य, पुष्प,
चन्दन, मृतिका आदि द्वारा कभी मन्त्र की गणना नहीं करनी चाहिए इसीलिए जप
के लिए माला-विधान है ।
महासेतु (बीजाक्षर) के बिना भी जपा हुआ मन्त्र भी निष्फल हुआ करता है ।
आदि में महासेतु फिर सेतु का जप करने के बाद ही मन्त्र का जप करना चाहिए
अन्यथा मन्त्र-जप निष्फल होता है ।²
१४. मन्त्र के संस्कार—
जननं जीवनं पश्चात्ताडनं बोधनं तथा ।
तथाभिषेको विमलीकरणाप्यने मनोः ॥ ७५ ॥
तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्र संस्क्रियाः ।
मन्त्राणां मातृकामध्यादुद्धारो जननं स्मृतम् ॥ ७६ ॥³
नवविध मन्त्रवाद—दीपनं बोधनं चैव ताडनं चाभिषेचनम् । विमलीकरणं चैव
तथेन्धननिवेशनम् । संतर्पणं गुप्तिभाव आप्यायो नवमस्तथा । एवं नवप्रकारेण
मन्त्रवादमशेषतः । यो जानाति स जानाति मन्त्रसाधनमुत्तमम् ॥ ये नौ तत्त्व ही
‘मन्त्र-साधन’ हैं ।⁴
‘दीपन’ = मन्त्र के प्रणव द्वारा । ‘बोधन’ = नमः शब्द द्वारा । ‘ताडन’ =
‘फट्’ द्वारा । ‘अभिषेचन’ = वौषट् द्वारा । ‘विमलीकरण’ = ‘स्वाहा’ द्वारा ।
‘इन्धन-निवेशन’ = दाह्यपाशविषादिदहन, हुङ्कार द्वारा विनियोजन । ‘तर्पण’ =
बलवत्ताधान और प्रतिवर्ण लङ्कार से संपुटीकरण । ‘गुप्तिभाव’ = रक्षणाम् ।
नेत्रनाथ का संपुटीकृत अयुत जप द्वारा । ‘आप्यायन’ = पुनर्जातबल का पुष्ट्याधान
१. शा० (९, १७) २-३. ‘शाक्तानन्द तरंगिणी’
४. नेत्रतन्त्र (१८।१६-८)