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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 530 में से

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५४ वरिवस्यारहस्ये
१३. मन्त्रों के दशविध-संस्कार—
मन्त्र-सिद्धि के लिए मन्त्रों का संस्कार आवश्यक है । मन्त्रों के संस्कार की
दश विधियाँ (दशविध मन्त्र-संस्कार) हैं जो निम्न हैं—१. जनन, २. दीपन, ३.
बोधन, ४. ताड़न, ५. अभिषेक, ६. विमलीकरण, ७. जीवन, ८. तर्पण, ९.
गोपान, १०. आप्यायन ॥१
‘उड्डीशतन्त्र’ में मन्त्रों के विशुद्धीकरण या मन्त्र-संस्कार के लिए दशविध
संस्कारों का विधान किया गया है । भगवान् शिव रावण से कहते हैं—
“सम्यगनुष्ठितो मन्त्रो यदि सिद्धो न जायते । पुनस्तेनैव कर्तव्यं ततः सिद्धोभवेत्
ध्रुवम् । पुनरनुष्ठितो मन्त्रो यदि सिद्धो न जायते । पुनस्तेनैव कर्तव्यं ततः सिद्धो न
संशयः । पुनः सोऽनुष्ठितो मन्त्रो यदि सिद्धो न जायते । उपायास्तत्र कर्तव्याः सप्त
रावण प्रेमतः ॥” सारांश यह है कि यदि सम्यक् अनुष्ठानपूर्वक मन्त्र जप करने पर
भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता तो उसको पुनः जपना चाहिए, यदि फिर भी सिद्ध नहीं
होता तो पुनः उसका जप करना चाहिए, किन्तु यदि फिर भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता
तब उस मन्त्र का संस्कार करना चाहिए । ये संस्कार दस प्रकार के हैं जिनका
ऊपर उल्लेख किया जा चुका है ।
मन्त्रगत दोषों के कारण भी मन्त्र सिद्ध नहीं होते । अतः उनके निराकरण
हेतु भी कतिपय उपाय किये जाते हैं जो निम्न हैं—
१. जनन, २. दीपन, ३. बोधन, ४. ताड़न, ५. अभिषेक, ६. विमली-
करण, ७. जीवन, ८. तर्पण, ९. गोपन, १०. आप्यायन ॥२
१. जनन संस्कार—मातृकायंत्र का निर्माण करके यंत्र को स्वर्णपात्र में कुंकुम,
चन्दन या भस्म से अंकित करना चाहिए । अङ्कन-विधि निम्न है—
१. शक्तिमन्त्र का संस्कार—कुंकुम से
२. विष्णुमन्त्र का संस्कार—चन्दन से
३. शिवमन्त्र का संस्कार—भस्म से करना चाहिए ।
इस मातृका-यंत्र से मन्त्रवर्णों का पर्याय-क्रम से उद्धार करना ‘जनन’ कहलाता
है । उद्धृत मन्त्र वर्णों को पंक्ति क्रम से प्रणव द्वारा संपुटित करके एक-एक वर्ण
सौ-सौ बार जपना चाहिए ।३ यह संस्कार कहलाता है—‘जनन संस्कार’ ॥
भोजपत्र पर गोरोचन, कुंकुम एवं चन्दन प्रभृति से आत्माभिमुख त्रिकोण
निर्मित करके उसके तीनों कोनों में ७” ७ समान रेखाएँ खींचिए । ऐसा करने से
४९ कोष्ठ बनेंगे । उनमें ईशानकोण से मातृकावर्ण लिखकर देवता का
आह्वान-पूजन करके मन्त्र को एक-एक वर्ण का उद्धार करके भिन्न पत्र पर
लिखिए । यही मन्त्र-विधान ‘जनन-संस्कार’ कहलाता है ।
१. ‘गौतमीयतन्त्र’, ‘शाक्तानन्द तरंगिणी’ २. ‘गौतमीयतन्त्र’
३. विश्वसार तन्त्र