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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 530 में से

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पृष्ठ 54

४४ वरिवस्यारहस्ये
'मननंविश्वविज्ञानं त्राणं संसारसङ्कटात् ।
यतः करोति संसिद्धो मन्त्र इत्युच्यते प्रिये ।।'१
आगमों में कहा गया है—'मननात्राणधर्माणो मन्त्राः स्युः परिकीर्तिताः ।।'
शिवसूत्र में कहा है—'चित्तं मन्त्रः ।।'
'मंत्रिगुप्तभाषणे' (चु०प०से०) से घञ् (३।३।१९, १८) करने पर मन्त्र शब्द
निष्पन्न होता है । इसका अर्थ निम्न है—"मन्त्रो वेदविशेषे स्याद्देवादीनां च साधने ।
गुह्यवादेऽपि च पुमान् ।"२ "वेदे भेदे गुह्यवादे मन्त्रः"३ "मन्त्र्यतेऽनेन इति मन्त्रः ।।"
मन्त्र = 'मन्त्रणम्' ।।
४. 'शाक्तानन्दतरंगिणी' की दृष्टि—
ब्रह्मानन्दगिरि ने 'शाक्तानन्दतरंगिणी' के नवमोल्लास में कहा है कि—"मन्त्र"
सुनिश्चित वर्णों की शाब्दिक पुनरावृत्ति या जिह्वा का वर्णावृत्तिरूप अध्यवसाय नहीं है
बल्कि “मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनम्” तथा 'मन्त्र' देवता से पृथक् कोई सत्ता नहीं है
प्रत्युत मन्त्र वही है जो देवता है अतः मन्त्र एवं देवता में अभेद है—
“वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ।।”४
'मन्त्रार्थ' की व्याख्या करते हुए ब्रह्मानन्दगिरि कहते हैं कि—"हे देवी !
मन्त्रार्थ को सावधानी से हृदयङ्गम कीजिए । आधारपद्म में विद्या को गुरुस्फटिक के
सदृश कल्पित करें, लिङ्ग स्थान में बंधूक के समान, नाभि में स्फटिक के समान
हृदय में मरकत के समान, विशुद्ध चक्र में हरे रङ्ग में, आज्ञाचक्र में
'चतुर्वर्णानुरंजित' रूप में कल्पित करें ।" 'रुद्रयामल' में कहा गया है कि—मन्त्र
को गुरु के पास ले जाकर गुरुभक्ति दिखाकर गुरु से—१. मन्त्र का कान २. मन्त्र
का मुख ३. मन्त्र का नेत्र, एवं ४. मन्त्र का प्राण—यत्नपूर्वक जानना चाहिए ।
फिर मन्त्र का 'कीलक' जानकर मन्त्र की पुरुष्क्रिया की जानी चाहिए ।
“मन्त्रंनीत्वा गुरोः पार्श्वे गुरुभक्तिपुरःसरः ।
मन्त्रस्य श्रोत्रास्य नेत्रप्राणान् विज्ञाय यत्नतः ।।”५
मन्त्र के श्रोत्रादिक के ज्ञान के बिना मन्त्र-जाप—दारिद्र्य, विपत्ति, नरक ।।६
उदाहरणार्थ काली मन्त्र लें—
कालीमन्त्र का—१. श्रोत्र—बिन्दु, २. मुख—नाद, ३. हृदय—ककार, ४.
नेत्र—वह्नि ५. कीलक—दीर्घीकार,।७
१. देवतत्त्व, २. प्राणतत्त्व, ३. बिन्दुतत्त्व, ४. ज्ञानतत्त्व, ५. शक्तितत्त्व, ६.
योनितत्त्व आदि नव तत्त्व जानकर ही मन्त्र का जप करना चाहिए, अन्यथा नहीं ।

१. माहेश्वर तन्त्र (ज्ञानखण्ड) २. मेदिनी कोष
३. अमर कोष ४-६. शाक्तानन्दतरंगिणी
७. भूत डामर