वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५५
२. दीपन संस्कार—“हंसो कृष्णाय नमः सोऽहं' या 'ॐह्रीं', 'ॐश्रीं'—इन
तीन मन्त्रों द्वारा देवमन्त्र को पुटित करके १०८ बार जप करने से दीपन
संस्कार होता है ।
३. 'बोधन संस्कार'—मन्त्र की वर्णसंख्यानुसार करवीर कुसुमों से 'रं' मन्त्र
के उच्चारणपूर्वक हवन करना ही 'बोधनसंस्कार' कहलाता है । या—'हूँ'
बीज-सम्पुटित मन्त्र का पाँच हजार बार जप करने से बोधनसंस्कार
सम्पन्न होता है यथा—“हूँ कृष्णाय नमः हूँ” ।
४. ताड़न संस्कार—मन्त्र को फट् से सम्पुटित करके एक हजार बार जप
करने से ताड़न संस्कार सम्पन्न होता है । यथा—'फट् कृष्णाय नमः
फट्' मन्त्र से या मन्त्र के सभी वर्णों को पृथक्-पृथक् लिखकर 'यं' मन्त्र
का उच्चारण करते हुए चन्दन जल से प्रत्येक को सौ या दस बार
ताड़ित करना 'ताड़नसंस्कार' है ।
५. अभिलेख संस्कार—भोजपत्र पर मन्त्र लिखकर 'रां हंसः' इस मन्त्र से
अभिमंत्रित करते हुए हजार बार जपे हुए जल से अश्वत्थ पत्र आदि से
मन्त्र का अभिषेक करना चाहिए । या समस्त मन्त्र-वर्णों को लिखकर
वर्णसंख्यक रक्त करवीर पुष्पों द्वारा 'रं' मन्त्र से एक-एक बार समस्त
वर्णों को अभिमंत्रित करके अश्वत्थ पत्रों द्वारा मन्त्रोक्त-विधान द्वारा सभी
मन्त्र-वर्णों का सिञ्चन करना चाहिए । यही पद्धति—'अभिषेक' है ।
६. विमलीकरण संस्कार—'ॐत्रों वषट्'—इन वर्णों से मन्त्र को सम्पुटित
करके एक हजार बार जप करने से—'विमलीकरण' संस्कार सम्पन्न होता
है यथा—“ॐत्रों वषट् कृष्णाय नमः वषट् त्रों ॐ” । या दूसरे विधान
के अनुसार—सुषुम्ना के मूल एवं मध्य भाग में देवमन्त्र का चिन्तन
करके ज्योतित मन्त्र—'ॐ हौं' में मल तत्र को दग्ध करना 'विमलीकरण
संस्कार' कहलाता है ।
७. जीवन संस्कार—'स्वधा', 'वषट्' मूल मन्त्र का एक हजार बार जप
करना ही जीवन संस्कार है—यथा—“स्वधा वषट् कृष्णाय` नमः वषट्
स्वधा” मन्त्र-वर्णों को पंक्ति-क्रम में प्रणव द्वारा संपुटित करके एक-एक
वर्ण का दस बार जप करना जीवन-संस्कार कहलाता है ।
८. तर्पण संस्कार—दुग्ध, जल, घृत के द्वारा मूल मन्त्र का उच्चारण करते
हुए सौ बार तर्पण करना 'तर्पण संस्कार' कहलाता हैं । अन्य विधि के
अनुसार—ज्योति मन्त्र द्वारा देव मन्त्र की वर्ण संख्या के अनुसार जल से
तर्पण कराना 'मन्त्र-तर्पण' कहलाता है—१. शक्तिमन्त्र में तर्पण—मधु से
२. विष्णुमन्त्र में तर्पण—कपूरयुक्त जल से ३. शिवमन्त्र में तर्पण—
दुग्ध-घृत से किया जाता है ।
९. गोपन संस्कार—'ह्रीं' बीज से सम्पुटित मन्त्र का एक हजार बार जप