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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 530 में से

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पृष्ठ 67

भूमिका ५७

(वाङ्गार द्वारा प्रतिवर्ण संपुटीकरण करने से) ।१ यहीं है मन्त्रों का दशविध संस्कार ।
'शारदातिलक' में शान्ति-वशीकरण-स्तंभन-विद्वेषण-उच्चाटन-मारण अभिचारों में—
ग्रथन-विदर्भ-संपुट-रोधन-योग-पल्लव—विन्यासों का उल्लेख किया गया है ।
१५. आराधनीय मन्त्र—
नेत्रतन्त्र-(१८।१२-१३) में निम्न मन्त्रों को ही आराधनीय कहा गया है—१.
सिद्ध २. सुसिद्ध—'सिद्धं साध्यं सुसिद्धं च तथैवारि त्वमेव च । ज्ञात्वा सर्वमशेषेण
मन्त्रन्यासं समाचरेत् ॥' सिद्धादिमन्त्रों के परिज्ञान के उपाय के लिए 'स्वच्छन्दतन्त्र'
(८।२४) अवलोकनीय है ।२
मन्त्रों का उदयास्त—मन्त्रों का उदयास्त, व्याप्ति, ध्यान, मुद्रा भी जानना
आवश्यक है ।३
१६. मन्त्रों के नौ तत्त्व—
'कामधेनुतन्त्र' में मन्त्रों के निम्न नौ तत्त्वों का उल्लेख किया गया है—
'देवतत्त्वं प्राणतत्त्वं बिन्दुतत्त्वं च सुन्दरि । ज्ञानतत्त्वं शक्तितत्त्वं योनितत्त्वं तथैव च ।
नवतत्त्वमिदं प्रोक्तं कामधेनु मतं प्रिये ॥'
१७ मन्त्र के स्थान—
मन्त्रों के छः स्थान हैं और वही पर मन्त्र स्थित हैं—और इन्हें 'स्थानस्थ'
कहा गया है—(१) सकल (२) निष्कल (३) सूक्ष्म (४) सकल निष्कल
(५) कलाभिन्न (६) कलातीत ('षोढामन्त्रं शिवोऽब्रवीत् ।) मन्त्र के ये छः प्रकार
हैं—१. सकल मन्त्र—ब्रह्मरंध्रस्थ २. निष्कल मन्त्रस्थान—ब्रह्मरंध्र के नीचे ३.
सूक्ष्म—मानस ४. सकलनिष्कल मन्त्र का स्थान—हृदय ५. कलाभिन्न मन्त्र का
स्थान—बिन्दु ६. कलातीत मन्त्र—बिन्दु से ऊपर का स्थान ॥
१८. सर्वथा ग्राह्यमन्त्र—
हंसमन्त्र, अष्टाक्षरमन्त्र, पञ्चाक्षरमन्त्र, एक, दो, तीन आदि बीजरूपमन्त्र—में
सिद्धादि शोधन की आवश्यकता नहीं है— "स्वप्नलब्धे स्त्रिया दत्ते मालामन्त्रे च
त्र्यक्षरे । वैदिकेषु च सर्वेषु सिद्धादीन्नैव शोधयेत् । हंसस्याष्टाक्षरस्यापि तथा पञ्चाक्षरे
च । हंस स्याष्टाक्षरस्यापि तथा पञ्चाक्षरस्य च । एकद्वित्र्यादि बीजस्य सिद्धादीन्नैव
शोधयेत् ॥" (स्वप्नप्राप्त, नारीगुरु से प्राप्त, बीस अक्षरों से अधिक अक्षरों वाला
मन्त्र, त्र्यक्षरान्त, वैदिक मन्त्रों में—सिद्धादि शोधन की आवश्यकता नहीं है ।)
१९. जप—
हृदयाकाश (अनाहत प्रदेश) में सर्वदा ही भगवती का आनन्दमय स्वरूप
नादरूप में परिणत होकर चारों ओर संसर्पित है । मन बाह्यमुखी होने के कारण
१. शारदातिलक (२।११२) २. स्वच्छन्द तन्त्र (८।२४)
३. नेत्रतन्त्र (१८।१३-१४)