वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५१
१. ब्राह्मी—सृष्टि ॥ अधिष्ठाता—ब्रह्मा ॥ = 'अ' ॥
२. वैष्णवी—स्थिति ॥ अधिष्ठाता—विष्णु ॥ = 'उ' ॥
३. महेश्वरी—लय ॥ अधिष्ठाता—महेश ॥ = 'म' ॥
प्रकृति का अस्पंदनांश = चिदात्मा का प्रकृति में प्रतिबिम्बन—(यथा सूर्य का
दर्पण में)—प्रकृति का दो रूप में विभाजन'—स्पंदनांशमय प्रकृति का जड़ अंश
(२) अस्पंदनांश चेतन के अंशरूप में—'अपरा प्रकृति' । वाचक = 'अपर प्रणव ॥
वाच्य = 'परप्रणव' । वाच्य + वाचक प्रणव का संयोग—'विवृच्छक्ति'—जगत् की
सृष्टि ॥ परब्रह्म की 'ईक्षणशक्ति' ('तदैक्षत बहुस्याम प्रजायेय') = जगत् की सृष्टि
का महाकारण । ईक्षण शक्ति—विवृच्छक्ति का उत्प्रेरित होना—सृष्टि-सङ्कल्प । यही
सृष्टि-सङ्कल्प है—'पर्यालोचना' (Cosmic Ideation) ॥ ब्रह्म में सिसृक्षा-सङ्कल्प
(सङ्कल्प-स्फुरण) ब्रह्म की दो शक्तियों—स्पन्दन + अस्पन्दन—का संयोग—गुणत्रय
की साम्यावस्था रूप प्रकृतिरूप महाशक्ति का आविर्भाव—(चिदात्मा का प्रकृति में
प्रतिबिम्बन के कारण प्रकृति में संक्षोभ)—
१. स्पंदनांशमय प्रकृति का जडांश 'अ' 'उ' 'म' द्वारा सृष्टि
२. अस्पनंशमय प्रकृति स्थिति, संहार
८. 'मन्त्र' के अवयव—(ॐकार की एकादश कलाएँ)—
मकार, उकार एवं अकार का वर्ण—परामर्श ही 'मन्त्र' है ।
१. 'अ' 'उ' 'म' = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति ॥
२. बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद = तुरीयावस्था ॥
३. नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना, उन्मना = तुरीयातीतावस्था ॥
'अवस्थातीत' = मात्राहीन या अमात्र शिव । उन्मना से परे कोई अन्य
अवस्था नहीं है । अ-उ-म = जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति के वाचक हैं । इन तीनों को
मिलाकर एकाकार कर देने पर जो अविभक्त ज्योतिर्मय ज्ञान उदित होता है उसे ही
'बिन्दु' कहा जाता है । यह भ्रूमध्य में प्राप्त होता है ।
१. 'बिन्दु' में ज्ञेयों का भेद विगलित है—अभिन्न ज्ञेयता की स्थिति है ।
किन्तु इसमें ज्ञानांश का नहीं ज्ञेयांश का प्राधान्य है । 'अर्द्धचन्द्र' में ज्ञानांश का
प्राधान्य है ज्ञेयांश गौण है । 'निरोधिका' में ज्ञेयभाव की सर्वथा निवृत्ति है । यहीं
से नाद में प्रवेश होता है किन्तु अयोगी का प्रवेश नहीं हो पाता । वाच्यों का
अभेद 'बिन्दु' में एवं वाचकों का अभेद नाद नादान्त में रहता है । 'बिन्दु' ईश्वर
है । 'नाद' सदाशिव है । 'समना' पर्यन्त शक्ति 'शिवतत्त्व' है । समना-लङ्घन शुद्ध
आत्मरूप में प्रतिष्ठा । 'उन्मना' का त्याग नहीं होता—परमशिव भाव की प्राप्ति ही
'उन्मना' का त्याग है । 'उन्मना' परमात्मा का समवायिनी शक्ति है । उन्मना
व्यापक एवं समना व्याप्य है । 'व्यापिनी' समना का अपरभाव है । व्यापिनी
महाशून्य है । समना भी शून्य है और यह व्यापिनी की परावस्था है । महाशून्य
का अतिक्रमण—समना की प्राप्ति ॥ व्यापिनी का अपरभाव ही है 'शक्ति' । यह