वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'प्रातःकृत्यं विना देवि ! न सिद्धिर्जायते शिवे'—मन्त्र-साधना में सिद्धि का अन्य
विधान इस प्रकार है ।
(घ) जप एवं पूजा का सोपान-बद्ध विधान—'तारारहस्य' में इसका विधान
इस प्रकार दिया गया है—१. (स्नान के पूर्व) ब्रह्ममुहूर्त वेला में उठकर पद्मासन
या स्वस्तिकासन में स्थित होकर सिर में द्वादशाक्षरोपेत पद्म के भीतर सहस्रदलपद्म
में स्थित श्वेतवर्ण सद्गुरु के वामभाग में स्थित रक्तवर्ण शक्ति का ध्यान करके
मानसोपचार से उनका पूजन करके ऐं (वाग्भव मन्त्र) का १०८ बार जप करके
एवं जप-समर्पण करते हुए—'अखण्डमण्डलाकारं... नमः ।' मन्त्र द्वारा उनका
अभिवादन करके, चैतन्य आत्मा का अनुभव करना चाहिए । 'सहस्रारे महापद्मे
कर्पूरधवलं गुरुम् । उत्थाय पश्चिमे यामे तच्चैतन्यं समाचरेत्” । इसके बाद
स्वस्तिकासनस्थ होकर उन कुण्डलिनी देवी का ध्यान करें जो कि मूलाधार में साढ़े
तीन बार वलयान्वित होकर स्वयंभूलिङ्ग को वेष्टित करके स्थित हैं—परब्रह्ममयी
हैं—जो अनेक प्रणवों की एकाकृति हैं—उन कुण्डलिनी देवी को चित्रिणी नामक
ब्रह्मनाड़ी में प्रविष्ट कराना चाहिए और उन्हें सभी कमलों में घुमाकर हृत्पद्म में
लाकर उनका मानसोपचारों से पूजन करना चाहिए । उनके मध्य में रक्तवर्ण
आदिशक्ति का ध्यान करना चाहिए । इसके बाद, मूल मन्त्र का जप करना चाहिए
तभी सिद्धि मिल सकती है ।
(ङ) जप-क्रम—आँ ह्रीं क्रौं (कुल्लुका मन्त्र) का जप शीर्षस्थान में १०
बार, मुख में 'सेतु' (हौ) का जप ७ बार, हृदय में पुट (ऐं) का जप ॐकार के
साथ करने से तारोपासना में मन्त्रसिद्धि होती है—
“कुल्लुकां प्रजपेच्छीर्षे दशधा मन्त्रसिद्धये ।
मुखे सेतुं सप्तधा च प्रणवेन पुटं हृदि ॥” १
'जप' के सम्बन्ध में विभिन्न दार्शनिकों की दृष्टियाँ—
महामन्त्रात्मकाकृतकाहंविमर्शीरूढस्य यद्यदालापादि तत्तदस्यस्वात्मदेवता विमर्शा-
नवरतावर्तनात्मा जपो जायते । २
'वरदराज' वार्तिक में 'जप' की व्याख्या करते हुए कहते हैं— “महामन्त्रमयं
नौमि रूपं ते स्वच्छशीतलम् । अपूर्वामोदसुभगं परामृतरसोल्बणम् । इति श्रीप्रत्यभिज्ञा-
कृद्दैशिकप्रोक्तया दिशा । अकृत्रिमाहाममर्शमयेस्वात्मावमर्शिनः । या या स्वैराभिलापात्मा
कथा याथार्थ्यवादिनः । भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या । जपः सोऽत्र
स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥” ३
प्रत्येक जीव अहर्निश जो 'सोऽहं सोऽहं' या 'हंसः हंसः' का जप किया
करता है वही 'जप' है—षट्शतानि दिवारात्रं सहस्रान्येक विंशतिः । जपो देव्याः
१. 'तारारहस्य'
२. क्षेमराज—'शिवसूत्रविमर्शिनी' (सूत्र २७) ३. शिवसूत्रवार्तिकम्