वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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आनन्दात्मिका स्पर्शानुभूतियुक्ता है । इसका अतिक्रम—व्यापिनी । स्पर्शरूपा शक्ति
का अपर भाव है—नादान्तव्यापी नाद ।। नाद का अपरभाव है बिन्दुरूपा ज्योति ।।
ज्योति का अपरभाव है ‘मन्त्र’ ।। मन्त्र का अपरभाव है ब्रह्मा-विष्णु-महेश । त्रिदेवों
का अपरभाव हैं—तत्त्वसमूह ।।
मन्त्र के अवयव सारांशतः निम्न हैं—१. ६ शून्य, २. ५ अवस्थाएँ, ३. ७
विषुव ।। ५ अवस्थाएँ—जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत ।।
‘शून्य’—द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम, द्वादश । ५ अवान्तर शून्य
(प्रथम ५) ।। महाशून्य = छठवाँ ।।
परमात्मा के छः प्रकार के स्थूल रूप हैं—उनमें एक ‘मन्त्र’ भी है यथा—१.
भुवन २. विग्रह ३. ज्योति या बिन्दु ४. व्यापिनी या आकाश ५. नाद या शब्द
६. मन्त्र ।।
‘सप्तविषुव’—प्राणविषुव, मन्त्रविषुव, नाड़ीविषुव, प्रशान्तविषुव शक्तिविषुव,
कालविषुव, तत्त्वविषुव ।।
प्राण, आत्मा एवं मन के परस्पर योग को ‘प्राणविषुव’, नाद को जापक की
आत्मा समझने की भावना करना ‘मन्त्रविषुव’ मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त
बीजशिखरवर्ती नाद के उच्चरित होने पर ‘नाड़ीविषुव’, शक्ति में नादान्तपर्यन्त
मन्त्रावयवों की लय-भावना करना ‘प्रशान्तविषुव’ एवं शक्ति के मध्य आगत नाद के
समनापर्यन्त चिन्तन को ‘शक्तिविषुव’ कहते हैं । कालातीत उन्मनापर्यन्त नाद के
चिन्तन को ‘कालविषुव’ कहते हैं । उन्मनाभेदन करने के साथ ही ‘नाद’ का अन्त
होता है इसके पूर्व नहीं । इस स्थिति में तत्वबोध स्वयमेव हो जाता है । चैतन्य
का यह अभिव्यक्ति स्थान ही ‘तत्त्वविषुव’ कहलाता है । इसकेबाद ही ‘परमपद’ है।
९. मन्त्र के अङ्ग—प्रत्येक अङ्ग के निम्न अङ्ग होते हैं—
१. आन्तरिक अङ्ग—वर्ण-संख्या, उद्धार, काल (मात्रा), उच्चारण, स्थान,
प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, आकार आदि विद्या के आन्तरिक अङ्ग हैं ।
२. बाह्य अङ्ग—ऋषि, छन्दस्, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति कीलक,
न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा ।
“आन्तरिक अङ्ग प्रायः दुर्लभ हैं । इनका समादर प्रायः अन्तर्मुखी लोगों द्वारा
किया जाता है । इन्हीं की सन्तुष्टि के लिए इस रहस्य वरिवस्या का प्रतिपादन
किया गया ।।’’१ “इसका परित्याग करके जड़ों द्वारा जो बाह्याडम्बरों की उपासना
की जाती है वह प्राणहीन शरीर या सूत्रहीन पुतली की भाँति अग्राह्य है ।”२
जो मन्त्र के तत्त्वों को बिना जाने महाविद्या का जप करता है उसके समस्त
प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं अतः उसके जप एवं पूजन से क्या लाभ? ‘अज्ञात्वा
१-२. भास्कराचार्य—‘वरिवस्यारहस्यम्’