वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४५
"बिन्दुतत्त्वं प्रजप्याथ ज्ञानतत्त्वं च सुन्दरि । प्राणतत्त्वं च चार्वङ्गि देवतत्त्वं
तथैव च । जपतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं ध्यानतत्त्वं सुलोचने ।।''१
वैसे तो समस्त 'मन्त्र' वर्णात्मक हैं किन्तु वे मात्र वर्णात्मक नहीं हैं—
शक्त्यात्मक भी हैं—'सर्वेवर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये । शक्तिस्तु
मातृका ज्ञेया सा च ज्ञेया शिवात्मिका ।।''
'मन्त्र' स्थूल अक्षर से ऊपरी धरातल की वस्तु हैं । इसीलिए कहा गया है—
'मन्त्रे चाक्षर बुद्धिस्स्याद् गुरौ तु मानवः प्रिये । देवतायाः वरारोहे प्रतिबुद्धिस्तु जायते ।
किं तस्य जप पूजायां सर्वं व्यर्थं कदर्थनम् ।।''२
'स्पन्दप्रदीपिका' में मन्त्र के चार तत्त्व बताए गए हैं—१. बीज, २. पिण्ड,
३. पद, ४. नाम । मन्त्र के दो कार्य बताए गए हैं—१. मनन, २. त्राण ।।
'शब्द', 'मन्त्र', 'ओंकार' एवं देवता तत्त्वतः अभिन्न हैं । समस्त मन्त्रों की
मूल एवं सर्वोच्च प्रकृति ॐकार है । अर्धमात्रादिक में जो प्रतिफलित चैतन्य है
वही 'मन्त्र' है ।
समग्र विश्व की उत्पत्ति शब्द द्वारा हुई है । 'समस्त विश्व शब्द में ही विधृत
है ।'' शब्दातीत परमपद का साक्षात्कार करने हेतु भी शब्द का आश्रय लेना पड़ता
है तथा शब्द-राज्य का भेदन करने हेतु भी शब्द का आश्रय लेना पड़ता है । सृष्टि
में रहने एवं सृष्टि से बाहर जाने दोनों के लिए शब्द ही एक मात्र आलम्बन है ।
इसीलिए शब्द को पकड़कर शब्दातीत परब्रह्म पद में जाने का विधान किया गया
है । मन्त्रों का मूल उद्भवस्थान (योनि) 'ज्ञानशक्ति' है—
'ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः । सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रा-
रणिवत्स्थिताः ।' मन्त्रों के अवयवभूत वर्णों की भी आत्मा है—'मातृका' । इसी
मातृका से मन्त्र निर्मित होते हैं—
मातृका या महामातृका ही विश्वजननी है । शब्दब्रह्म ही यह परामातृका है ।
अस्तित्व के तीन स्तर हैं—१. 'दिव्य समरसभूमि' = यहाँ न तरङ्ग है, न स्पंदन,
न विमर्शन, न सृष्टि, न संरक्षण, न संहार, न तिरोधान, न अनुग्रह, न
शिव-शक्ति, न जीव जगत् । अद्वय परम स्थिति की वह अवस्था जहाँ पूर्ण सत्य
अपनी महिमा में पूर्णतः विराजमान है । २. द्वितीयावस्था = यहाँ परब्रह्म भी है
और शब्दब्रह्म भी । परावाक् ही शब्दब्रह्म है । यही है युगलभाव की अवस्था—
'शिवशक्ति की समरसावस्था' । यह सामरस्य नित्य है । यह 'यामल', 'युगनद्ध',
'युगल' की अवस्था है । सृष्टि के मूल में है—'बिन्दु' । स्वातन्त्र्य—स्पन्दन द्वारा
'बिन्दु' का स्पर्श—रेखा रूप में बिन्दु की परिणति—त्रिकोण = (सृष्टि की मूल
योनि) ।।
शब्द, अर्थ एवं ज्ञान परस्पर सम्बद्ध हैं । अर्थ ही जगत् है क्योंकि वह
१-२. कामधेनु तन्त्र