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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 530 में से

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पृष्ठ 58

४८ वरिवस्यारहस्ये
(क) जागरित स्थान = 'वैश्वानर' = ॐ की प्रथममात्रा = 'अ' ॥
(ख) स्वप्न स्थान = 'तैजस' = ॐ की द्वितीयमात्रा = 'उ' ॥
(ग) सुषुप्ति स्थान = 'प्राज्ञ' = ॐ की तृतीयमात्रा = 'म' ॥
(घ) तुरीय, तुरीयातीत = आत्मा का तुरीयपाद = तुरीयआत्मा = मात्रा-शून्य ॐ
'अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव
संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।'—(माण्डू० १।१२) ॥
(ङ) 'प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् । सर्वव्यापिनमोंकारम् ॥'—
(माण्डू० का० २८)—ओंकार हृदयस्थ ईश्वर है ।
यह ओंकार 'अनादिनिधन ब्रह्म' है—'शब्दतत्त्व' है—'अक्षर' है—'जगत्'
इसीका 'विवर्त' है—
“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥”
यही ओंकार 'शब्दब्रह्म' है एवं इसी 'शब्दब्रह्म' से 'परब्रह्म' की प्राप्ति होती
है—'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।' ध्वनि का स्थूल शरीर—'आकाश'
है । ध्वनि का सूक्ष्म शरीर 'शब्दतन्मात्रा' है । ध्वनि का सूक्ष्मतम कारण शरीर—
'परशब्द' है । यही 'परशब्द' ओंकार है ।
यह वही शब्द है जो मानव पिण्ड में 'गगनशिखर' में प्रकाशित होता है—
'गगनशिखर महँ शब्द प्रकास्या तहँ बूझै अलखबिनाणी'¹, 'शब्द' (ओंकार) ही
ताला है, शब्द ही कुञ्जी है । शब्द ही शब्द को जगाता है । शब्द का शब्द से
परिचय होने पर शब्द, शब्द में समा जाता है ॥'' (शब्दहिं ताला, शब्दहिं कूची
शब्दहिं शब्द समाया । शब्दहिं शब्द से परचा हुवा शब्दहिं शब्द समाया ।²)
इसीलिए आचार्य रामानन्द ने कहा था—''शब्द को सीख ले, शब्द को बूझ ले,
शब्द से शब्द पहिचान भाई ॥''
शब्द—समस्त वर्णमाला, समस्त प्रकृत्यण्ड, मायाण्ड, शाक्ताण्ड, ब्रह्माण्ड,
समस्त जीव-जगत् ॥ पञ्चअवस्थाएँ—त्रिलोक, तैंतिस कोटि देवता, त्रिदेव,
वेदचतुष्टय, समस्तशास्त्र, समस्तमन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर आदि सारे अस्तित्व ॥
मन्त्र का वाच्य है परमात्मा । मन्त्र-साधना का लक्ष्य है परमात्मा, आत्मा एवं
ब्रह्म की प्राप्ति । चूँकि ओंकार ही आत्मा है—परमात्मा है, और ब्रह्म है—इसीलिए
सारे मन्त्रों के पूर्व ओंकार का प्रयोग किया जाता है यथा—'भुवनेश्वरी का मन्त्र
(ॐ ह्रीं ह्रीं ओं ओं) विष्णु का मन्त्र—(सेतु) ॐविष्णवे ॐ । कृष्ण का मन्त्र—
(सेतु) ॐ क्लीं ॐ । तारा का मन्त्र—(सेतु) 'ॐ ह्रीं' । समस्त वर्णों के मूल
१-२. गोरखनाथ