वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५९
'पूजा' नाम न पुष्पाद्यैर्यामतिः क्रियते दृढ़ा।
निर्विकल्पे परेव्योम्नि सा पूजा ह्यादशल्लयः ॥१
मन्त्र, मन्त्री एवं मन्त्रवाच्य देवता तीनों को एक समझकर जप करना ही
यथार्थ जप है क्योंकि अन्यथा सिद्धि संभव नहीं—
'पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिध्यति कदाचन ॥'
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—महामन्त्रात्मक अकृतकाहंविमर्शारूढ़ जो जो
आलापादि हैं उनका स्वात्मदेवता विमर्शनिवृर्तावर्तनात्मा जो जप है वही कथा है ।
यह कथा ही 'जप' है ।
जप—अर्थानुसंधानपूर्वक मन्त्रोच्चारण ही 'जप' है । विद्यानन्द ने जप को
आणव-शाक्त-शांभव उपायों से अनुप्राणित कहा है । यद्यपि अर्थानुसंधानरहित
मन्त्राक्षरों की पुनरावृत्तिरूप यह साधना भी 'मन्त्र' कही जाती है किन्तु योगसूत्रकार
पतञ्जलि ने—'तज्जपस्तदर्थ भावनम्' (१।२८) कहकर जप के साथ अर्थभावन की
अनिवार्यता प्रतिपादित की है । इसीलिए 'योगिनीहृदय' में छः प्रकार के एवं
'वरिवस्यारहस्यम्' में पन्द्रह प्रकार के अर्थ बताए गए हैं ।
(क) त्रैपुरदर्शन में जप-लक्षण—त्रैपुरदर्शन में जप के निम्न लक्षण बताए
गए हैं—१. मन्त्र के वर्णों का उच्चारण २. शून्य ३. विषुव ४. अवस्था ५.
चक्र ॥
“एवमवस्थाशून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्चषट्सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ॥ (वरि०)
अर्थात् मन्त्रों के वर्णों का उच्चारण करते हुए पाँच अवस्था । छः शून्य एवं
सात विषुवों के साथ नौ चक्रों का स्मरण करना एवं मन्त्र के अर्थ का चिन्तन
'जप' कहलाता है ।२-३ वामकेश्वरदर्शन में जप के समय तीन निम्न तत्त्वों का
विधान किया गया है२—१. चक्रभावन २. अवस्थापञ्चक आदि. ॥
(ख) जप के प्रकार—जप के मुख्य प्रकार निम्न हैं—१. वाचिक वैखरी जप
२. उपांशु जप ३. मानस जप ॥ जप के अन्य प्रकार भी है । यथा नित्य,
नैमित्तिक, प्रायश्चित्त, भ्रामरी, अजपा ।
(ग) प्रातःकृत्य-विधान—ध्यान एवं जप—'तारारहस्य', 'तारागम',
'महानीलतन्त्र', 'तारानिगम', 'तारासार' आदि ग्रन्थों में कहा गया है कि मन्त्रसिद्धि
के लिए यह प्रातःकृत्य आवश्यक है क्योंकि इसके बिना सिद्धि संभव नहीं—
१. विज्ञान भैरव २. वरिवस्यारहस्यम्
३. 'जपनं जपः', 'जपः स्यादक्षरावृत्ति' (जप मानसे च (भ्वा०प०से०) 'व्यधजपोः'
सूत्र से जप निष्पन्न होता है ।) जप का फल—'पठतो नास्ति मूर्खत्वं जपतो नास्ति
पातकम् ।'