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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 530 में से

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पृष्ठ 57

भूमिका ४७
२. वैखरी वाणी = तुरीय वाणी । (मनुष्यों द्वारा बोली जाने वाली वाणी ।)
इनमें तीन गुप्त वाणियों में भी गुप्त हैं 'पश्यन्ती' एवं 'पश्यन्ती' से भी
अधिक गुप्त है 'परावाणी' । यहीं परावाणी है—ओंकार । ओंकार ही सब कुछ
है—उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, वेद के प्रमाण देखिए—
१. 'ॐ कार एवेदं सर्वम्' (छा०उप०)—यह सब कुछ (समस्त जगत्) ओंकार
ही है ।
२. 'ॐ तद्ब्रह्म' (मु०उप०)—ॐ वह अचिन्त्य परात्पर परमात्मा है ।। प्रणव
(ओंकार ही पर एवं अपर) ब्रह्म है
३. “प्रणवोऽपरं ब्रह्मप्रणवश्च परः स्मृतः । अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवो-
ऽव्ययः ।।”
४. 'ॐ मित्येत्' (क०उप०)—ओंकार ही यह सब (जगत्) है ।
५. 'ॐमिति ब्रह्म' (तै०उप० १।८।१)—ओंकार ही ब्रह्म है ।
६. 'एतदालम्बनम्' (क०उ० १।२।१७)—यही ओंकार ही आलम्बन है ।
७. 'एतद्वैसत्यकाम' (प्र० ३०५।२)—हे सत्यकाम । यह ओंकार है और यही
पर एवं अपर ब्रह्म है ।
८. 'ओमित्यात्मानं युञ्जीत' (मैत्र्यु० ६।३)—आत्मा का ॐ इस प्रकार ध्यान
करे ।
९. 'ओंकार एवेदं सर्वम्' (छा० ३०२।२३)—यह सब ओंकार ही है ।
१०. ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं । तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोंकार
एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ।। (माण्डूक्योपनिषदः १।१)
—ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है । यह जो कुछ भूत, भविष्यत् एवं
वर्तमान है—उसी की व्याख्या है । इसलिए यह सब ओंकार ही है ।
इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ।
११. 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्' (माण्डूक्यो० १।२)
—यह सब ब्रह्म ही है । यह आत्मा ही ब्रह्म है । वह यह आत्मा चार
पादों वाला है ।
१२. सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो
मकार इति ।। (माण्डुक्य० १।८)—वह यह आत्मा अक्षर की दृष्टि से
ओंकार है, वह मात्राओं को विषय करके स्थित है । पाद ही मात्रा हैं
और मात्रा ही पाद हैं । वे मात्रा अकार, उकार एवं मकार हैं । (क)
ओंकार की प्रथममात्रा—'अकार' । (ख) ओंकार की द्वितीय मात्रा—
'उकार' । (ग) ओंकार की तृतीय मात्रा—'मकार' ।
४ वरि. भू.