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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 530 में से

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पृष्ठ 53

भूमिका ४३
‘साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं’—कहने का तात्पर्य यह है कि
आत्मा ही शिव है । यह आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है क्योंकि यह
बोद्धा है । संवित् ही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र शिवरूप हैं ।
मन्त्र एवं जप वर्णात्मक होने पर भी मूलतः संविदात्मक हैं आन्तर-विकास की
निष्पत्ति हैं—आत्मोल्लास का अपर पर्याय हैं । इसीलिए ‘बौद्धायन संहिता’ में कहा
गया है कि—‘चन्द्रमा शान्त हो जाय एवं सूर्य का उदय भी न हो, उस समय
समस्त देवों का विलय एवं समस्त मन्त्रों का उदय हुआ करता है ।।'
‘मालिनीविजय’-नामक ग्रन्थ में भी इसी तथ्य को पुष्टि करते हुए कहा गया है
कि—‘जिस अवस्था में जीव अन्य आधारों से विनिर्मुक्त होकर स्वस्वरूप में लीन हो
जाता है वही अवस्था मन्त्रों के उद्भव का स्थान है ।'
यह भी कहा गया है कि—‘‘जब पुरुष का चित्त धर्माधर्म के संधि-स्थल में
निरुद्ध हो जाता है तब वह जो कुछ भी बोलता है वही ‘मन्त्र’ हो जाता है ।
केवल स्वर, वर्ण मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते ।।'’
“धर्माधर्मान्तरे चित्तं निरुद्धं यत्तदा तु सः ।
यद्वक्ति स भवेन्मन्त्रः किं पुनर्मातृकोत्थितः ॥”
इसीलिए कहा गया है कि अनिरुद्ध चित्त वाला साधक जिस मन्त्र का जप
करता है वे मन्त्र उस स्थिति में पशुभाव में स्थित रहते हैं किन्तु जब उन्हीं मन्त्रों
का सुषुम्णा नाड़ी से उच्चारण होने लगता है तब वे ही मन्त्र ‘पशुपति’ बन जाते
हैं¹—
“पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवलः वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णोऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥”
मन को चेतन करके उठाना होगा । सुषुम्ना का स्रोत ही चैतन्य की धारा
है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्णा की धारा में डाल देना होगा ।²
यह जाग्रत मन ही मन्त्रस्वरूप है । यही प्रबुद्ध कुण्डलिनी की स्फूर्ति है ।
जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए शिवसूत्र में कहा गया है—‘चित्तमन्त्रः’ हृदयाकाश
में मन लीन होने पर पुनः व्युत्थित होकर बहुमुखी दौड़ने लगता है महाकाश में
एकीभूत मन उत्थित होने पर एकमुखी होकर दौड़ता है । अतः मन को और ऊपर
उठाकर (मन को कम्पनहीन करके) मन को विकल्पहीन करना होगा । यही मन
जाग्रत मन “मन्त्र” है—‘‘चित्तं मन्त्रः ।’’
१. हंस पारमेश्वर
२. शक्तिसम्पन्न शब्दराशि ही मन्त्र है । निरुद्ध, कम्पन-शून्य, हृदयाकाश एवं
महाकाश को अतिक्रान्त करके विकल्प-शून्य स्थिति में आरूढ़ एवं सुषुम्णा धारा में लीन
मन ही मन्त्र है । इसी से ‘चित्तं मन्त्रः’ कहा गया है ।