सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

भूमिका ६१
समुद्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥''—इत्युक्तनीत्या. सा सर्वस्वात्मेशामर्शसंपदः ।
जानिपालन धर्मत्वाज्जप इत्यभिधीयते ॥'' अथेदृग्विधयोगीन्द्रविषं यापि च या कथा ।
जपः सोऽपि जनस्योक्तो जनिपालनयोगतः ॥''¹ इसी तथ्य को उपनिषदों में भी
प्रतिपादित किया गया है—‘सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः । हंस हंसेत्यतो
मन्त्रं जीवो जपति नित्यशः । षट्शतानि दिवरात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः । जपो देव्या
विनिर्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥''
जप होता है मन्त्र का और 'मन्त्रमयी भूमि' है मध्यमा-भूमि ॥ मध्यमावाक्
मन्त्ररूप में ही आत्मप्रकाशन करती है । वैखरी भूमि में चिदंश आच्छन्न रहता है ।
मध्यमा में नादमय चिद्रश्मि नित्य विराजमान है । 'मध्यमा' है—दो प्रान्तों का
मध्यवर्ती—१. एक प्रान्त में दिव्य पश्यन्ती २. दूसरे प्राप्त में पाशव वैखरी ।
मध्यमा दोनों का सेतु है ।
उन्मनापर्यन्त सम्पूर्ण मन्त्रावयवों का १०८१७ बार उच्चारण—नाद का अन्त
एवं परमपद की प्राप्ति ॥
२०. जप के साथ मन्त्रार्थ भावना—
“नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति । भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं
हविर्ज्वलति ॥’’² भास्कराचार्य ने मन्त्रों के निम्न अर्थ बताए हैं—१. प्रतिपाद्यार्थ २.
भावार्थ ३. संप्रदायार्थ ४. निगर्भार्थ ५. कौलिकार्थ ६. रहस्यार्थ ७. महातत्त्वार्थ ८.
नामार्थ ९. शब्दरूपार्थ १०. नामैकदेशार्थ ११. शाक्तार्थ १२. सामरस्यार्थ १३.
समस्तार्थ १४. सगुणार्थ १५. महावाक्यार्थ ॥ पञ्चदशीमन्त्र में जितने वर्ण हैं
(अर्थात् १५) उतने ही अर्थ हैं ।³
'योगिनीहृदय' में भी मन्त्रार्थ के विभिन्न प्रकार समुद्दिष्ट हैं यथा—भावार्थ,
संप्रदायार्थ, कौलिकार्थ, निगर्भार्थ, महातत्त्वार्थ, रहस्यार्थ आदि ॥
१. मन्त्र के अवयवभूत अक्षर का अर्थ ही है—‘भावार्थ' ।
२. परमात्मा के मुख से या अवतरणक्रम या परम्परागत ज्ञान—'संप्रदायार्थ' है।
३. परमात्मा, गुरु एवं आत्मा का ऐक्यानुसंधान ही है—'निगर्भार्थ' ।
४. चक्र, देवता, विद्या, गुरु एवं साधक का ऐक्यानुसंधान है—'कौलिकार्थ' ।
५. कुण्डलीरूपा विद्या ही साधक की स्वात्मा है ऐसा ऐक्यानुंधान है—
'रहस्यार्थ' ।
६. विश्वातीतः एवं विश्वमय निज गुरु के द्वारा प्रबोधित स्वकीय आत्मा का
ऐक्यानुप्रवेश ही है—‘महातत्त्वार्थ' ।⁴
भास्करराचार्य के मतानुसार—
१. ‘प्रतिपाद्यार्थ'—प्रथम अर्थ है । अन्य अर्थ निम्न हैं—

१. शिवसूत्रवार्तिकम् २-३. वरिवस्यारहस्यम् (२।५४)
४. गोपीनाथ कविराज—'भा० सं० और साधना'