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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 530 में से

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पृष्ठ 56

४६ वरिवस्यारहस्ये
पदार्थों की समष्टि है । शब्द का अर्थ से जो सम्बंध है वह है तीन प्रकार का—
१. अभेद सम्बन्ध, २. भेदाभेद सम्बन्ध, ३. भेद सम्बन्ध ।
पश्यन्ती अवस्था = यहाँ शब्दार्थ में अभेद सम्बंध है । यहाँ जो शब्द है वही
अर्थ है, जो अर्थ है वही शब्द है ।
मध्यमावस्था = यहाँ शब्दार्थ में भेदाभेद सम्बंध है ।
वैखरीअवस्था = यहाँ शब्द से अर्थ का भेद सम्बंध है । (परावस्था में शब्द,
अर्थ, ज्ञान—पृथक्-पृथक् रूप में भासमान नहीं होते ।)
मातृका ही प्रत्यवमर्शनकारिणी शक्ति है । मातृकाशक्ति के जुड़ने पर ही
‘प्रकाश’ अपने को प्रकाश के रूप में पहचान पाता है अन्यथा नहीं । ‘अहं’ में
भी मातृका की ही क्रीड़ा है । ‘पूर्णाहन्ता’ (पूर्ण अहं या परमेश्वर के स्वरूप) को
भी मातृका द्वारा ही पकड़ा जा सकता है । (पूर्णत्व उन्मनी अवस्था में है ।)
मन्त्र को जो देवता से अभिन्न कहा गया है—उसका अर्थ यही है कि
मन्त्राक्षर वैखरीभाव (भेदराज्य) एवं मध्यमाभाव (भेदाभेद राज्य) का त्याग करके
पश्यन्तीभाव (अभेद राज्य) तक यात्रा करें जहाँ कि शब्द से उसका अर्थ (वाचक
से उसका वाच्य) अभिन्न रूप से दिखाई दे अर्थात् मन्त्र से मन्त्रवाच्य अभिन्न रूप
में दर्शन दे, अर्थात् जहाँ मन्त्र एवं उसके वाच्यदेवता में रञ्चमात्र भी भेद दृष्टिगत न
हो । जहाँ मन्त्र और उसका देवता दोनों एक हैं वह अवस्था ही मन्त्र का
वास्तविक अर्थ है । चूँकि पश्यन्ती की अवस्था में शब्द और अर्थ अभिन्न रूप से
स्थित हैं उसी प्रकार वहाँ मन्त्र और उसका अर्थ रूप देवता भी अभिन्न रूप में
स्थित हैं अतः मन्त्र वहाँ देवता के रूप में एवं देवता मन्त्र के रूप में एवं दोनों
एक दूसरे के रूप में दृष्टिगत होंगे । ‘मन्त्र’ अपने वास्तविक स्तर पर देवता से
अभिन्न रूप में ही स्थित रहते हैं अतः मन्त्र की इसी मूल आदर्श दशा को दिखाने
के लिए कहा गया है कि मन्त्र ही देवता है ।
६. ओंकार (प्रणव) और मन्त्र—ओंकार ही महामन्त्र है । वेदों में कहा
गया है कि मनोभावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस वाणी का
उपयोग किया जाता है उसके चार प्रकार हैं । उसे केवल ‘मनीषी ब्राह्मण’ ही
जानते हैं अन्य नहीं । इनमें तीन वाणियाँ गुहा में गुप्तरूप से स्थित हैं । केवल
चौथी वाणी ही मनुष्य बोला करते हैं अन्य वाणियाँ नहीं क्योंकि अन्य वाणियों का
(गुप्त तीन वाणियों का) ज्ञानमात्र मनीषी ब्राह्मणों को ही है अन्य को नहीं—
‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति, तुरीयो वाचो मनुष्या वदन्ति ॥
सारांश—
१. परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा वाणी (मनुष्यों को अज्ञात । केवल मनीषी
ब्राह्मणों को ज्ञात)