वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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१. 'अ'—ब्राह्मी—मनोबीज (= सृष्टि) ॥
२. 'उ'—वैष्णवी—प्राणबीज (= स्थिति) ॥
३. 'म'—माहेश्वरी—अहं बीज (= प्रलय) ॥
(क) सूक्ष्म शब्दशक्ति = 'सृष्टिबीज' = नादशास्त्र की परिभाषा में यही है—
'मनोबिन्दु' ॥
(ख) स्थूल शब्दशक्ति = 'प्राणबिन्दु' = सृष्टि का स्थिति बीज ॥
(ग) अतिस्थूल शब्दशक्ति = 'अहंबिन्दु' = सृष्टि का लय बीज ॥
'अ' = मनोबीज के आदिकारण के रूप में निगूढ़ रहने वाली
निनादशक्ति ।
'उ' = प्राणबीज के आदिकारण के रूप में निगूढ़ रहने वाली
निनादशक्ति ।
'म' = लय बीज के आदिकारण के रूप में निगूढ़, रहने वाली
निनादशक्ति ।
स्थूल शब्दशक्ति—में वैष्णवीशक्ति स्थित है । अधिष्ठाता = विष्णुः
वैष्णवीशक्ति—प्राणबिन्दु । (प्राणबिन्दु की उत्पत्ति का आदिकारण वैष्णवीशक्ति है ।)
अत्यन्त स्थूल शब्दशक्ति—में अधिष्ठाता = महेश्वर (लयशक्ति का अभिमानी
देवता) ॥
(परब्रह्म के ईक्षण के प्रभाव से वृवृच्छक्ति में उत्पन्न अतिस्थूल नाद ही
माहेश्वरीशक्ति का प्राण है । यही शक्ति विश्वप्रलय का महाकारण है ।)
सूक्ष्म शब्दशक्ति—इस शब्द में रहने वाली नादशक्ति ब्राह्मीशक्ति है ।
अधिष्ठाता = ब्रह्मा ॥
प्रकृति की साम्यावस्था में 'संक्षोभ'—
'संक्षोभ'—अकार में से सूक्ष्म शब्द की उत्पत्ति ।
'संक्षोभ'—उकार में से स्थूल शब्द की उत्पत्ति ।
'संक्षोभ'—मकार में से अतिस्थूल शब्द की उत्पत्ति ।
(प्रणव या ओंकार के अ, उ, म—इन तीन अङ्गों से उद्भूत इन महाशक्तियों
से क्रमशः 'मनोबीज', 'प्राणबीज' एवं 'अहंबीज' में सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कारण
बीज प्रकट हुए ।)
ओंकार (प्रणव) के दो प्रकार—१. पर प्रणव २. अपर प्रणव । पराप्रकृति
('परप्रणव') की सन्निधि या सत्तामात्र से 'अपर प्रणव' (अपरा प्रकृति) में सङ्कल्प
विवृति का प्रारंभ—अकार-उकार-मकार के रूप में विभाजन । ब्रह्म की तीन
शक्तियाँ—