वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
९४ वरिवस्यारहस्ये
| नादों का क्रमाङ्क | ९ नाद या प्रणव के अवयव | स्थान | कलाएँ | अवस्था | आकार | उच्चारण काल (काल की मात्रा या अवधि) | पूर्ण ध्वनि की मात्रा | आकार का स्पष्टीकरण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ४ | बिन्दु | आज्ञा चक्र के ऊपर ललाट में | ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती, सुप्रभा, विमला, शिवा | सुषुप्ति | १२८ लव | १/२ | दीप के सदृश वृत्ताकार | |
| ५ | अर्धचन्द्र<br>अर्द्धेन्दु | बिन्दु के ऊपर | रुन्धती, रोधनी, रौद्री, ज्ञानबोधा, तमोपहा, निरोधिका | तुर्यावस्था | ६४ लव | १/४ | आधे चन्द्र के समान | |
| ६ | निरोधिका | अर्धचन्द्र के ऊपर | इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका | ३२ लव | १/८ | त्रिकोणाकृति : चन्द्रिका की भाँति | ||
| ७ | नाद | निरोधिका के ऊपर | ऊर्ध्वग | १६ लव | १/१६ | दो बिन्दुओं के मध्य पद्मराग मणिवत दण्ड के समान | ||
| ८ | नादान्त | नाद के ऊपर | सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा, व्यापिनी | ८ लव | १/३२ | वाम भाग में बिन्दु एवं हल के समान : तड़ित के समान |
प्रथमोऽंशः ९५
| नादों का क्रमाङ्क | ९ नाद या प्रणव के अवयव | स्थान | कलाएँ | अवस्था | आकार | उच्चारण काल (काल की मात्रा या अवधि) | पूर्ण ध्वनि की मात्रा | आकार का स्पष्टीकरण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | शक्ति | नादान्त के ऊपर | व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, अनाथा, अनाश्रिता | ४ लव | १/६४ | जिसमें दो तिरछे बिन्दु हों। वामबिन्दु से एक रेखा निकल रही हो। दक्षिण बिन्दु शिरा शून्य | ||
| १० | व्यापिनी (व्यापिका) | शक्ति के ऊपर | सर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति | २ लव | १/१२८ | बिन्दु से निकलता हुआ त्रिकोण | ||
| ११ | समना | व्यापिनी के ऊपर | १ लव | १/२५६ | ऊर्ध्व एवं अधोभागस्थ बिन्दुद्वय से संयुक्त रेखाकृति | |||
| १२ | उन्मना | समना के ऊपर | कालहीन | १/५१२ | ऊर्ध्वबिन्दु से हीन | |||
| ० | नौ कलाएँ |
९६ वरिवस्यारहस्ये
'बिन्दु'—'योगिनीहृदय' के अनुसार 'बिन्दु' दीपक के समतुल्य प्रकाशमान है
और यह ललाट में गोलबिन्दी के रूप में स्थित है । इसका उच्चारण-काल
अर्द्धमात्रा है । ह्रस्व स्वर का उच्चारण-काल 'मात्रा' कहलाता है और इसका आधा
काल अर्धमात्रा है जो कि बिन्दु के उच्चारण में प्रयुक्त होता है ।१
ह्रस्व का उच्चारण-काल एक मात्रा, दीर्घ का उच्चारण-काल दो मात्रा, प्लुत
का उच्चारण-काल तीन मात्रा एवं व्यञ्जन का उच्चारण-काल अर्धमात्रा हुआ करता
है—
'एक मात्रो भवेद्ध्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥'
'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः । तद्विगुणो गुर्वक्षरस्य । अतएव कामकला कमला
त्रिकोणा योनिश्च द्विमात्रा । हल्लेखायां द्वयोर्व्यञ्जनयोरे का मात्रा कामकलाया द्वे मात्रे
इति तिस्रः । बिन्दोरपि व्यञ्जन त्वादर्धमात्रा ॥'२
'बिन्दु' भाल के मध्य वृत्ताकार रूप से दीप की भाँति देदीप्यमान है—रहता
है—'मध्येकालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥'३ अमृतानन्द कहते हैं—
'दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्त सन्निवेशो बिन्दुः इति ॥'४ 'योगिनीहृदय' में बिन्दु
की व्याख्या केवल इस प्रकार की गई है—'दीपाकारो' । अर्थात् बिन्दु दीपक के
आकार का है—दीपक की जैसी कान्ति या भासन वाला है । बिन्दु आदि नव के
समूह को 'नाद' कहा जाता है । (व०र०)
बिन्दु का विस्तार—'स्वच्छन्द तन्त्र' में 'बिन्दु' के विस्तार के विषय में इस
प्रकार कहा गया है—"बिन्दावरणमूर्ध्वतः । 'सूर्यकोटि प्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ।
तन्मध्येशतकोटीनां संख्या योजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ।
पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभा कृतिः । निवृत्तिश्चं प्रतिष्ठा च विद्या शान्ति
सुक्रमात । परिवार्य स्थिता श्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना
शान्त्यतीता मनोन्मनी । पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दसबाह्निन्दु शेखराः । बिन्दुत्वं
समाख्यातं कोट्यर्बुद शतैर्वृतम् ॥'"५
बिन्दु को दीपाकार इसलिए कहा गया है क्योंकि दीपक का भासन जैसा
होता है वैसा ही बिन्दु का होता है—'दीपाकारो दीपकस्य यादृशं भासनं
तादृशम ।'’६ दीपस्यैवाकारः कान्तिर्यस्य स दीपाकारः ॥७ (१) निवृत्ति (२) प्रतिष्ठा
(३) विद्या (४) शान्ति—ये तत्पुरुष की कलायें हैं । इनका स्थान भ्रू मध्य है और
यह बिन्दुरूप ईश्वर तत्व में स्थित हैं । 'इन्दु' फिर 'बोधिनी' फिर 'नाद' फिर
१. भास्करराय—वरिवस्यारहस्यम् २. भास्करराय—'प्रकाश'
३. वरिवस्यारहस्यम् ४. दीपिका
५. नेत्रतन्त्र ६. दीपिका
७. सेतुबन्ध
प्रथमोऽंशः ९७
'महानाद' फिर 'कला' (आज्ञी) फिर 'उन्मनी' ।। 'बिन्दु एवं मात्रार्ध के ऊपर स्थित
है—'नाद' । 'नाद' के ऊपर स्थित है—'महानाद' (वायु के लय का स्थान) ।।
व्यापिका ही 'आज्ञी' है । आज्ञा चक्र, फिर-'बिन्दु' (शिव) फिर 'बोधिनी' (अर्धमात्रा
के आकार की) फिर 'नाद' (शिवशक्ति का संमिलन) (अर्धचन्द्र के, आकार का),
फिर व्यापिका, (वक्रा आज्ञी) फिर 'समनी' फिर 'उन्मनी' परशक्तिमय, अपने को
तीन रूपों में प्रकट करता है— (१) बिन्दु, (२) नाद, (३) बीज नाद । 'बिन्दु'
नादात्मक है । 'बीज' शक्ति है । 'नाद'—बिन्दु + बीज का सम्मिलन ।।
'बिन्दु'—आज्ञा चक्र के ऊर्ध्व में बिन्दु का स्थान है । 'बिन्दु' ही योगियों का
'तृतीय नेत्र' या 'ज्ञानचक्षु' है । इसी स्थान से ज्ञानभूमि की सूचना प्राप्त होती है ।
जब तक चित्त को एकाग्र करके उपसंहृत न किया जाय तब तक 'बिन्दु' में प्रवेश
पाना असंभव है क्योंकि विक्षिप्त अवस्था में बिन्दु स्थान में स्थिति संभव नहीं है ।
इस भूमि में साधक अहंभाव युक्त होकर और द्रष्टा बनकर निम्नवर्ती संसार को
तटस्थ दृष्टि से देख सकता है किन्तु बिन्दु में अहंभाव के पूर्ण समर्पण या विसर्जन
के पूर्व महाबिन्दु या शिवभाव की अभिव्यक्ति संभव नहीं है । बिन्दुभाव अधिगत
करने के उपरान्त साधक को समस्त कलाओं का क्षय करते-करते विगतकल
अवस्था प्राप्त करनी चाहिए । इस बिन्दु को 'चन्द्रबिन्दु' कहा जाता है । इसीलिए
इसकी उत्तरवर्ती अवस्था का अभिधान है—'अर्धचन्द्र' ।।
सृष्टि के मूल उत्स के रूप में जो तत्त्व स्थित है वह है—'बिन्दु' । यह
'महाबिन्दु' के नाम से प्रसिद्ध है । प्रकाश या शिवांश एवं विमर्श या शक्त्यंश
जब समभाव में प्रतिष्ठित रहते हैं तब उनकी आख्या 'बिन्दु' होती है । सृष्टि के
आरम्भ में एक ही बिन्दु तीन रूपों में विभाजित होकर उदित होता है । समष्टिगत
बिन्दु व्यष्टिरूपात्मना तीन बिन्दुओं में रूपान्तरित हो जाता है । 'अम्बिका' या
प्रकाशांश तथा 'शान्ता' या विमर्शांश इन दोनों का मूल स्रोत की सृष्टि का मूल
स्रोत है । अम्बिका का प्रकाशन— (१) वामा (२) ज्येष्ठा एवं (३) रौद्री नाम्नी
तीन शक्तियों एवं—'शान्ता' का प्रकाशन (१) इच्छा (२) ज्ञान एवं (३) क्रिया—
इन तीन शक्तियों के रूप में होता है । जहाँ अम्बिका एवं शान्ता साम्यभाव में
स्थित रहती हैं उसे समष्टि बिन्दु या मूल बिन्दु कहते हैं ।
(क) 'समष्टिबिन्दु' = अम्बिका एवं शान्ता में साम्यभाव की भूमि—
'परावाक्' ।।
(ख) 'व्यष्टि बिन्दु' = (१) वामा एवं इच्छा में साम्य से जिस बिन्दु का
आविर्भाव होता है—अर्थात = 'पश्यन्तीवाक्' ।।
(२) ज्येष्ठा एवं ज्ञान के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है—अर्थात् =
'मध्यमावाक्'
(३) रौद्री एवं क्रिया शक्ति के साम्य (दातादात्म्य) से जो बिन्दु प्रकट होता
है—अर्थात् = 'वैखरीवाक्'
७ वरि.
९८ वरिवस्यारहस्ये
यह त्रिकोण मूलत्रिकोण है । इसका मध्य बिन्दु 'परामातृका' है । तीन
दिशाओं के तीन बिन्दुओं को 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' कहते हैं । इस
त्रिकोण की वाम दिशा की वक्ररेखा 'पश्यन्तीवाक्' का प्रसार है । इसके ऊर्ध्व की
सरल रेखा 'मध्यमा वाक् का प्रसार है । इसके दक्षिण दिशा की रेखा 'वैखरी
वाक्' है । यही है योनिस্বরূপ विश्वमातृका का स्वरूप । समग्र विश्व का जो
मूलबिन्दू है वही सर्वोच्च बिन्दु है इसी बिन्दु से सर्वप्रथम त्रिकोण का जन्म होता
है । समग्र विश्व के केन्द्र में पराशक्ति के आत्मप्रकोशन की भूमि के रूप में इसी
त्रिकोण का प्रकटीकरण होता है । लुप्त हो जाता है । यह स्तर समाधिजन्य प्रज्ञा
से उत्कृष्टतर है । योगिगम्य पञ्चशून्यों में प्रथम शून्य बिन्दु है । जहाँ ज्ञाता, ज्ञान
एवं ज्ञेय एकाकार होते हैं वही, मात्रा से मात्राहीन में जाने की, भूमि 'बिन्दु' है ।
'बिन्दु' में काल विद्यमान है और उसकी मात्रा १२८ लवों की है—'बिन्दौ' लवाः
शतं ज्ञेया अष्टाविंशतिसंयुतम् ।'
अन्य चक्रों में काल की मात्रा निम्नानुसार है—(१) उन्मना—काल है ही नहीं
है । (२) 'समना'—एक लव (३) 'व्यापिका'—४ लव (४) 'नादान्त'—८ 'लव'
(५) 'नाद'—१६ लव (६) 'रोधिनी'—३२ लव (७) 'अर्धचन्द्र'—६४ लव (७)
'बिन्दु'—१२८ लव । नालिनीदलसंहति को सूची द्वारा अभिवेधन किये जाने पर
प्रत्येक दल के अभिवेधन में जितना समय लगता है उस काल को 'लव' कहा
जाता है—"दले दले तु यः कालः स कालो लवसंज्ञकः ॥१'
इन समस्त चक्रों की अवस्थायें निम्नानुसार हैं—(१) बिन्दु—सौषुप्त सन्निभ
(२) अर्धचन्द्र से नादान्त पर्यन्त तुर्यावस्था । (३) नादान्त से उन्मनी तक =
तुर्यातीता । अन्य मत—(१) बिन्दु—सुषुप्ति । (२) अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद =
तुर्यावस्था (३) नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना, उन्मनी = तुर्यातीत । तुर्यातीतपद
= आनन्दैकघनावस्थाः आकार निम्नानुसार है—
(१) महाबिन्दु (२) उन्मनी (३) समना (४) व्यापिका (५) शक्ति (६)
नादान्त (७) नाद (८) रोधिनी (९) अर्धचन्द्र (१०) बिन्दु
चूँकि "महाबिन्दु" काल एवं अवस्थाओं से परे हैं अतः उसकी किसी
अवस्था, काल, मात्रा आदि की कल्पना करना संभव नहीं है । "महाबिन्दु
समाश्रित्यावस्था कपि न संभवेत् ।"
'बिन्दु', 'अर्धचन्द्र', 'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त', 'शक्ति', 'व्यापिका',
'समना', एवं 'उन्मना' इन सभी का समष्टिगत नाम 'नाद' है—
"बिन्द्वर्ध चन्द्ररोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समतोन्मन्य इति नाद पदाभिधाः ॥"
ये सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, एवं सूक्ष्मतम काल से उपलक्षित हैं तथा इनकी विशिष्ट
१. शङ्कराचार्यः 'प्रपञ्चसारतन्त्र'
प्रथमोऽंशः ९९
ध्वनियाँ हैं तथा अनुस्वार विसर्गवत वर्ण है। अर्द्धचन्द्र से नीचे पूर्णचन्द्राकार ज्ञान
शक्ति प्रधान, नादपरामर्श को उदरस्थ किए हुए समस्त स्रष्टव्य वेद्य वर्ग से
अविभक्त, क्रियात्मकशक्त्यात्मा ईश्वर रूप 'बिन्दु' का उदय होता है।¹ इनका प्रकाश
करोड़ों सूर्यों के समान है। ये सृष्टि-संसार के कारण है।
“नाद”-ब्रह्मरन्ध्र के मुख में नादस्थान है। यह मन्त्र महेश्वरों से परिवृत है।
'उन्मना'-में काल नहीं है किन्तु 'नाद' में है। यह काल की मात्रा १६ लवों की
है-'नादे षोडशैलवाः पुनः ।।' 'नाद' सृष्टिप्राक अवस्था का वह स्तर है जो
तत्वतः 'सदाशिव' है एवं जो अप्रतिम वेग से प्रसरण करता हुआ समस्त जगत को
ध्वनि से आपूरित कर देता है—
“प्रसरत्यतिवेगेन ध्वनिनापूरयञ्जगत् ।
स नादो देवदेवेशः प्रोक्तश्चैव सदाशिवः ।।” (नेत्रतन्त्र)
अर्धचन्द्र की ऊर्ध्वभूमि में प्रतिष्ठित इस नाद पद की अनेक शक्तियाँ हैं।
नाद की निम्न शक्तियाँ हैं-(१) इंधिका (२) दीपिका (३) रोचिका (४) मोचिका
(५) ऊर्ध्वगामिनी ।
‘इंधिका दीपिका चैव रोचिका मोचिका तथा ।
ऊर्ध्वगामिन्यः यत्येताः कला नाद समुद्भवाः ।।'²
इनका विवरण निम्नानुसार है—
‘एताः स्वतन्त्रता युक्ताः सकले निष्कले स्थिताः ।
ज्ञानशक्तिस्वरूपास्तु ज्ञाताः सार्वज्ञ्यदायिकाः ॥'³
अर्धचन्द्रोर्ध्ववर्तिनी 'नादशक्ति' की शक्तियाँ विमर्श प्रधान एवं परदीप्तिमय हैं।⁴
बिन्दु आदि नव के समूह को 'नाद' कहा जाता है-“बिन्दादीनां नवानां तु
समष्टिर्नाद उच्यते ।।''५
ये 'बिन्दादि' निम्न हैं—(१) बिन्दु (२) अर्द्धचन्द्र (३) रोधिनी (४) नाद
(५) नादान्त (६) शक्ति (७) व्यापिका (८) समना (९) उन्मनी—
'बिन्द्धर्धचन्द्र रोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥
बिन्दादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ।⁶
'बिन्दौ तदर्धे रोधिन्यां नादे नादान्त एव च ॥
शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनि गोचरे ।
महाबिन्दौ पुनश्चैव त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ।।'⁷
१. 'बिन्दुश्चेश्वरः स्मृतः' (नेत्रतन्त्र) २-३. नेत्रतन्त्र
४. नेत्रोद्योत ५-६. वरिवस्यारहस्यम्
७. योगिनीहृदय (चक्र सङ्केत)
१०० वरिवस्यारहस्ये
भास्करराय कहते हैं कि यद्यपि बिन्दु विनिर्मुक्त आठ अष्ट अवयवों की आख्या
ही ‘नाद’ है तथापि व्यवहार-सौकर्य के लिए उसके सहित नौ के अवयवों की
समष्टि को ‘नाद’ कह दिया गया है—
‘यद्यपि बिन्दुविनिर्मुक्तानामष्टानामेव नाद संज्ञा मन्त्र शास्त्रे तथापि व्यवहार
सौकर्याय तत्सहितानामेव सात्र कृतेति साध्यम् ॥’१
“नाद” का काल मात्रा काल होता है—
‘संहत्यैकलवोनो मात्राकालोऽस्य नादस्य ।’२
मूलाधार से उठने वाला ‘नाद’ वर्णों के मध्य से होता हुआ सूत्र की भाँति
प्रतीत होता है—‘आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णमध्यगतः ॥’३
‘नाद’—‘निरोधिका’ के अनन्तर नादभूमि आती है । ‘नाद’ की मात्रा १/१६
है । नाद को चारों ओर से घेरकर अनन्त मन्त्र महेश्वर स्थित हैं । इसका स्थान
ब्रह्मरन्ध्र के मुख में है । विशुद्धचित् की तरङ्ग यहीं से प्रारम्भ होती है । इस भूमि
में त्रिगुणातीत विशुद्धचित् का आभासयुक्त शब्द श्रुतिगोचर होता है । ‘नाद’ मन्त्र
महेश्वररूपी महापुरुषों से परिवृत है । नाद के भीतर ही भुवन पञ्चक की मध्यवर्ती
शक्ति ‘ऊर्ध्वगा’ के नाम से प्रख्यात है । यहीं से शुद्ध चिद् बोध का शुभारम्भ
होता है । बिन्दु की परवर्ती अवस्था ही ‘नाद’ है । ‘बिन्दु’ का अनुभव भ्रूमध्य के
मध्य में होता है जबकि उसके भी ऊर्ध्व में ब्रह्मरन्ध्र की अंतिम सीमा तक ‘नाद’
का अनुभव होता है । नाद का आश्रय लेकर ही नाद के अन्त में पहुँचा जाता
है । वाचकों की महासमष्टि से एकीभूत स्थिति का नाम ‘नाद’ है । जिस प्रकार
बिन्दुरूप ज्योति में यथाभीष्ट अर्थ का साक्षात्कार होता है तद्वत् ‘नाद’ में निःशेष
विश्व, अनन्तवाचक एवं अनन्त मन्त्रों का साक्षात्कार होता है । परिणामतः प्रत्येक
मन्त्र चेतन होने पर नादावस्था में उपनीत होता है । ‘बिन्दु’ एवं ‘नाद’ जगत के
असंख्य वाच्यवाचकों की एकीभूत समष्टि के वाचक हैं । ‘नाद’ का अन्त हुए बिना
देहात्मबोध विगलित नहीं होता ।
मन्त्रशास्त्र में जिसे ‘मन्त्र चैतन्य’ की संज्ञा दी गई है वह प्राणात्मक नाद
शक्ति का उदय मात्र है । जिस प्रकार पयोधि में अनिल के आघात से ऊर्मियाँ
उठती हैं । तद्वत् ‘बिन्दु’ में भी ऊर्मियाँ उठती हैं । ये ऊर्मियाँ ही बाहर की ओर
‘नाद’ एवं ‘ज्योति’ के रूप में प्रकट होती है । ‘नाद’ का उदय वाक् के रूप में
एवं ‘ज्योति’ का उदय अर्थ के रूप में हुआ करता है ।
कुण्डलिनी के व्यक्त होने के साथ वेग उत्पन्न होता है । वेग के उत्पन्न होने
पर स्फोट उत्पन्न होता है । यह स्फोट ही ‘नाद’ है । ‘नाद’ से प्रकाश उत्पन्न
होता है । प्रकाश का व्यक्तरूप ही ‘महाबिन्दु’ है । जीव = सृष्टि में उत्पन्न ‘नाद’
ॐकार है । शब्द ब्रह्म (ओङ्कार) से ५२ मातृकाओं का जन्म होता है । इनमें
१. ‘प्रकाश’ २-३. वरिवस्यारहस्यम्
(१) ५० अक्षरम् (२) ५१वीं मातृका (प्रकाशरूपा) (३) ५२वीं मातृका पकाश
का प्रवाह—६वीं ‘जीवनकला’ है । ५० मातृकाएँ लोम एवं विलोम से १०० हैं ।
ये ही १०० मातृकाएँ १०० कुण्डल हैं । इन कुण्डलों को धारण किए हुई
मातृकामयी ‘कुण्डलिनी’ है । सहस्रार चक्र में अव्यक्त नाद है वही आज्ञा चक्र में
आकर ॐकार रूप में व्यक्त होता है । ॐसे उत्पन्न होने वाली ५० मातृकाओं
की अव्यक्त स्थिति का स्थान सहस्रार चक्र है और यही ‘अकुल स्थान’ है । यहीं
शिवशक्ति का स्थान है । ‘शक्ति’ व्यक्त है, ‘शिव’ अव्यक्त है ।
जब कुण्डलिनी उद्बुद्ध होकर ऊपर की ओर बढ़ती है तो उससे ‘स्फोट’ होता
है जिसे ‘नाद’ कहा जाता है । विवरण निम्नानुसार है—कुण्डलिनी का जागरण—
स्फोट (नाद)—प्रकाश—प्रकाश का व्यक्त रूप ‘महाबिन्दु’—(१) इच्छा (सूर्य,
ब्रह्मा), (२) ज्ञान (चन्द्र, विष्णु), (३) क्रिया (अग्नि, शिव) ।
यह ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में
व्यक्त रूप है । जो ‘नाद’ अनाहतभाव से समस्त विश्व में सर्वत्र व्याप्त है जब उसी
का प्रकाश व्यक्ति में होता है तब उसे ‘नाद’ कहते हैं । ‘स्फोट’ अखण्ड सत्ता
रूप ब्रह्मतत्त्व का वाचक है । ‘स्फोट’ शब्दब्रह्म है जबकि सत्ता ब्रह्म है । ‘स्फोट’
वाचक शब्द है जबकि सत्ता वाच्य है । यह ‘नाद’ मूलाधार में उदित होता है एवं
सहस्रार में लय हो जाता है ।
गोरक्षसिद्धान्त संग्रह में कहा गया है कि ‘नाथ’ का अंश ‘नाद’ है, नाद का
अंश प्राण है, शक्ति का अंश बिन्दु है एवं बिन्दु का अंश शरीर है । सृष्टि-क्रम
निम्नानुसार है—शिव + शक्ति (प्रकृति) का संयोग—सगुण शिव-शक्ति—परनाद—
परबिन्दु—अपरबिन्दु (-रुद्र) + बीज (-विष्णु) + अपर नाद (-ब्रह्मा) । सोपाधिशिव
- सोपाधिशक्ति का संयोग—विश्व में विक्षोभ (नाद, परनाद)—विक्षोभ में
क्रियाशीलता (बिन्दु, परबिन्दु) ।
नाद + बीज + बिन्दु = इच्छा + ज्ञान + क्रिया । अपरनाद = इच्छा ।
‘बीज’ = ज्ञान । अपरबिन्दु = क्रिया ।
‘नाद’ की भी अपनी श्रेणियाँ एवं स्तर हैं यथा—(१) नाद ब्रह्मग्रंथि का
भेदन करने पर ‘शून्य’ में और उसके ऊर्ध्व में (२) विष्णु ग्रंथि का भेदन करने
पर—‘अतिशून्य’ में, और उसके भी ऊर्ध्व में (३) रुद्र ग्रंथि का भेदन करने पर
‘महाशून्य’ में पहुँच जाता है ।
‘परमाकला’ नादशक्ति ही है । कुण्डलिनी मूलाधार पद्म में सुषुम्ना के प्रवेश
द्वार में (ब्रह्मद्वार में) मुख में अपनी पूँछ डालकर पायूपस्थ के मध्यवर्ती चतुरङ्गुल
प्रमाण योनिकन्द में सो रही है । यह कुलकुण्डलिनी ही मूल नाद शब्दब्रह्म है और
समस्त मन्त्र उसकी स्वरूप-विभूतियाँ हैं । इसी निमित्त इसे ‘मन्त्रदेवता’ एवं
(अक्षरमयी होने के कारण) ‘मातृका’ कहते हैं। इसे ही षट्चक्र निरूपमाकार ने
परमाकला (नाद शक्ति) कहा है—
१०२ वरिवस्यारहस्ये
तन्मध्ये परमा कलातिकुशला सूक्ष्मातिसूक्ष्मा परा । नित्यानन्दपरंपराति- कुशला
पीयूषधाराधरा ।
‘ब्रह्माऽदि कटाहमेव सकलं यद् भासया भासते ।
सेयं श्रीपरमेश्वरी विजयते नित्यं प्रबोधोदया ॥’
व्यापक एवं शिथिल अर्थों में ‘नाद’ शब्द बहुत व्यापक है क्योंकि इसके
भीतर ‘बिन्दु’, ‘अर्धचन्द्र’, ‘रोधिनी’, ‘नाद’, ‘नादान्त’, ‘शक्ति’, ‘व्यापिका’,
‘समना’ एवं ‘उन्मना’ ये सभी आ जाते हैं—
‘बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादनादान्त शक्तयः ।
व्यापिकासमनोन्मन्य इति नादपदाभिधाः ॥’ (पूर्णता प्रत्यभिज्ञा)
समस्त वर्णों में ‘नाद’ ही तो अनुस्यूत है—‘वर्णेषु नादोऽनुस्यूतः ॥’
नादनवक मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपुर-अनाहत-विशुद्धाख्यआज्ञा (चक्रषट्क) एवं नाद,
नादान्त एवं ब्रह्मरन्ध्र तक स्थित है—
‘नाद नवकं मूलाधारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च स्थितम् ॥’२
परमात्मा ने “ईक्षण” किया । ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ । इस ‘ईक्षण’ का
सम्बन्धं ‘पश्यन्ती’ वाक् से है । इस पश्यन्ती वाक् के वामादिक आठ अवयव हैं
जो कि अष्ट शक्तियाँ हैं । ये व्यष्टि-समष्टि रूप से नौ रूपों में व्यक्त होती हैं उन्हीं
से अविकृत शून्यादिक नौ नाद उत्पन्न होते हैं ।३ इन्हें ही ‘नाद’ एवं ‘ध्वनि’ आदि
कहा जाता है ।४ इन्हीं नौ नादों से अ-क-च-ट-त-प-य-श-ल (वर्ग नवक) वैखरी
मातृका का जन्म होता है ।५
‘नाद’ पद्मराग की कान्ति वाला, दो अण्डों के मध्य वर्तमान सिरा (नाडिका)
की भाँति विराजमान रहता है—‘नादस्तु पद्मरागवद्द्वयमध्यवर्तिनीव सिरा ॥’६ यही है
नाद का आकार—“बिन्दुद्वयान्तरे दण्डःशेवरूपो मणिप्रभः ॥” यह प्रश्वेत मणि के
समतुल्य प्रभास्वर है और इसका आकार दो बिन्दु एवं उसके मध्य खींची गई एक
रेखा के तुल्य है इसका उच्चारण-काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है ।
नादोत्पन्न कलायें निम्न हैं—
इन्धिका दीपिका चैव रोचिका मोचिका तथा ।
ऊर्ध्वगामिन्य इत्येताः कला नाद समुद्भवाः ॥७
(१) तारा (२) सुतारा (३) तरणी (४) तारयन्ती (५) सुतारिणी—ये ईशान
कलायें हैं । सदाशिवात्मक ‘नादतत्तव’ से सम्बद्ध हैं । ‘नाद कलायें’ निम्न हैं—(१)
इन्धिका (२) दीपिका (३) रोचिका (४) मोचिका ।
‘नादान्त’—नाद के अनन्तर नादान्त की भूमि आती है । इसकी मात्रा
१/३२ है । नादान्त ही तृतीय शून्य है । नाद एवं नादान्त आचार्यों द्वारा ईश्वर
१-६. प्रकाश .७. नेत्रतन्त्र
प्रथमोंऽशः १०३
पद के रूप में भी स्वीकृत किये गए हैं । इस भूमि में वेद्य का भेद प्रधान है और
समस्त वाचक शब्द अभिन्न रूप में विमर्शन का विषय है । इसके अनन्तर ललाट
में अनाहत नाद ध्वनित होता है । नादान्त अधः शक्ति द्वारा सकल जगत का
उद्भेदन करके ऊर्ध्वशक्ति में समाप्त होता है । यह नाड्याधार एवं ब्रह्मविल में
लीन है—और मोक्ष का द्वार अवरुद्ध करके स्थित है । यह ब्रह्मरन्ध्र में स्थित है ।
नादान्त भी शून्यपद वाच्य है । इस स्थान में नाद एवं चित् सद्भाव में स्थित है ।
नादान्त में काल तो है किंतु आठ लव का है—'नादान्तेऽष्टौलवा' । नादान्त की
कला केवल एक है और वह है 'ऊर्ध्वगा' ॥
परनादात्मक प्रकाशानन्दघन शिव से स्फोटात्मक शब्दब्रह्म अपनी ध्वनि
(अनुरणन) के द्वारा समस्त प्रपञ्च को आपूरित करता हुआ अप्रतिम वेग से सर्वत्र
फैल जाता है । इसी नाद को देवदेवेश सदाशिव कहा जाता है । उपर्युक्त
परनादात्मक शिव को परमेश्वरी परावाक्रूप 'उन्मना' समझना चाहिए तथा इसमें
घण्टा सदृश अनुरणन को 'नादान्त' समझना चाहिए ।¹
बाईं ओर स्थित बिन्दु से युक्त, विद्युत के समान प्रकाशित होने वाला
'नादान्त' हल की भाँति प्रतीत होता है—
'नादान्तस्तडिदाभः सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ॥'²
'ऊर्ध्वाग्रं दक्षिणारं लाङ्गलम् वामभागे बिन्दुरेक नादान्ताकारः ॥'³
'नादान्त' सौदामिनी के समतुल्य प्रभास्वर है । इसका आकार हल के समान
है और इसके वामभाग में एक बिन्दु रहता है । इसका उच्चारण-काल मात्रा का
बतीसवाँ भाग है ।
नादान्त की कलायें निम्नांकित हैं—'ऊर्ध्वगा' (मात्र एक कला है ।) नादान्त
का अवस्थान 'ब्रह्मरन्ध्र' में है । नाद के भीतर भुवनपञ्चक की मध्यवर्ती शक्ति ही
'ऊर्ध्वगा' है । ब्रह्मरन्ध्र की दृष्टि से—(ब्रह्मरन्ध्र सुषुम्ना के ऊपर स्थित है) ब्रह्मरन्ध्र
में 'नादान्त' है जबकि ब्रह्मरन्ध्र के मुख में 'नाद' का स्थान है । नादान्त 'शून्य'
है । 'ब्रह्मरन्ध्र' सुषुम्ना के ऊपर अवस्थित है जबकि 'शक्ति' ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर
अवस्थित है ।
'शक्ति'—नादान्त के अनन्तर स्थित चिद्भूमिस्वरूपिणी, ब्रह्मरन्ध्रो- परिस्थिता,
अनुन्मिषितविश्वगर्भा, विश्वाधारा, कलाचतुष्टयवेष्टिता, व्यापिनीकेन्द्रा इस भूमि का नाम
ही 'शक्ति है । इसकी मात्रा १/६४ है । इसके मध्य में ही आनन्दसत्ता की
अनुभूति होती है । इसके अनन्तर ब्रह्म की सगुण शक्ति के आनन्द का आभास
होता है । शक्ति से उन्मनी पर्यन्त प्रत्येक भूमि द्वादश आदित्यवत् समुज्ज्वल एवं
१. 'प्रसरत्यतिवेगेनध्वनिनापूरञ्जगत् । स नादो देवदेवेशः प्रोक्तश्चैव सदाशिव ॥'
(नेत्रतन्त्र)
२. 'वरिवस्यारहस्यम्' ३. प्रकाश
द्वितीय विश्राम: गायत्री-साधर्म्य, कामकला-स्वरूप एवं कुण्डलिनी सामरस्य
दीप्त है । पृथ्वी तक सभी तत्व, भुवन शक्ति के ही विस्तार है । शक्तितत्व ही
‘निरालम्बपुरी’ या अनाश्रित भुवन है । अनाश्रित भुवन के चतुर्दिक चार शक्तियाँ
हैं—मध्य में अनाश्रित शक्ति अवस्थित है । शिवरूपी अनाश्रित देव के उत्सङ्ग में
अनाश्रिता शक्ति प्रतिष्ठित है । शक्ति में आनन्दमय स्पर्श की अनुभूति होती है ।
‘ब्रह्मरन्ध्र’ सुषुम्ना के ऊपर है जबकि ‘शक्ति’ ब्रह्मरन्ध्र के भी ऊपर स्थित है।
यहीं ऊर्ध्वकुण्डलिनी प्रसुप्त, सर्पाकार एवं ऊर्णान्तन्तु सन्निभ प्रकाश करती हुई स्थित
है । समस्त अनुन्मिषित विश्व इन्हीं के गर्भ में स्थित है और इस प्रकार वे विश्वाधार
हैं । समस्त तत्व एवं भुवन इन्हीं का आश्रय लेकर स्थित हैं । इस भूमि में एक
अव्यक्त आनन्द की अनुभूति होती है । पृथ्वीपर्यन्त तत्व जो कुछ भी प्रसृत है—
अस्तित्व में है—सब ‘शक्ति तत्व’ का विस्तार है ।
शक्ति की कलायें = सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा और व्यापिनी—
ये ही शक्ति की कलायें हैं—
'सूक्ष्मा चैव सुसू
होता है । समना के अनन्तर जो 'उन्मना' है वही`
- Line 21:
'अमावस्या' है । 'बिन्दु' को पूर्णिमा कहने पर भी उसे पूर्णरूप से पूर्णिमा नहीं - Line 22:
कहा जा सकता क्योंकि प्रकृत पूर्णिमा षोडशी है पञ्चदशी नहीं । ठीक पूर्णिमा होने - Line 23:
पर पूर्णता अखण्ड रहती है और उसके अनन्तर कृष्णपक्ष नहीं आता । बिन्दु में - Line 24:
१५ कलाएँ हैं किन्तु एक कला नहीं है यही कला 'अमृतकला' या 'षोडशी' है । - Line 25:
समना अनाश्रित भुवन के ऊपर स्थित है । 'समना' ब्रह्मविल के बाहर अतीत मन - Line 26:
की भूमि है । इस भूमि में मन है भी और नहीं भी है । नादान्त से इस मन की - Line 27:
सूचना प्राप्त होती है । 'सूक्ष्म समष्टि मन' नाद में लय हो जाता है—समाप्त हो - Line 28:
जाता है उसके परे 'अतिमानस' है । 'समना' समस्त कारणों की कारणभूता एवं - Line 29:
महेश्वर की पराशक्ति है ब्रह्म की चिद्रूप ईसरमशक्ति 'समना' के रूप में अवतरित
१०६ वरिवस्यारहस्ये
बिन्दु का, निरोधिका में अर्धचन्द्र का अर्धांश है और यही क्रम 'समना' तक
चलता है । मात्रा का सूक्ष्म अंश केवल 'समना' तक ही है । 'उन्मना' अमात्र हैं
क्योंकि वहाँ मात्रा नहीं है क्योंकि वहाँ मन ही नहीं है और मन की ही तो मात्रायें
होती है ।
उन्मना तो कालशून्य है किन्तु समना में काल है । 'समना' से जो काल है
उसकी संज्ञा है एकाणुर्लव 'समनायां पुनःकाल एकाणुर्लव संज्ञकः ।'¹ वस्तुतः
'समना' ही सृष्टिव्यापारा है—
“समनासौ निविर्दिष्टा शक्तिः सर्वाध्ववर्तिनी ।
क्रीडीकरोति या विश्वं सहृत्य सृजते पुनः ॥” (नेत्र तन्त्र) ॥
समना की कलायें निम्नांकित हैं—
सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः ।
समना चेति विख्याता एताः शिवकलाः स्मृताः ।
इच्छाशक्तिमधिष्ठाय इच्छासिद्धिप्रदायिकाः ॥
शिव तत्वं समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभा ।
अनन्त शक्तिसंस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्तनिर्मलाः ॥²
'समना' की कलायें—सर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति ॥
समना व्योमरूपात्मिका है । इससे शून्य नाम्नी व्यापिनी शक्ति का उदय होता
है । सदाशिव अनाश्रित पदात्मक सम्पूर्ण भावाभासों की भित्ति रूप अशेष मनन,
मन्तव्य मात्रात्मक 'समना' है जो कि उन्मना की स्वस्वरूपगोपन क्रीड़ा के
परिणामस्वरूप स्फुरित होती है ।³ 'समना' का प्रकाश द्वादश आदित्यों के समतुल्य
है । एक सीधी रेखा के ऊपर एवं नीचे बिन्दु स्थापित कर देने से निर्मित होने
वाला आकार ही 'समना' का आकार है इसका उच्चारण-काल २५६वाँ भाग मात्र
है ।
'समना' की आकृति रेखा के ऊपर नीचे स्थित दो बिन्दुओं के समान होती
है—
'ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ॥'³
'बिन्दुद्वयान्तरालस्थऋजुरेखामयी पुनः समना ॥'⁴
'समना' और 'उन्मना' में अन्तर यह है कि ऊपर वाले बिन्दु के बिना
उपर्युक्त समना ही 'उन्मना' है ।⁵ भास्करराय कहते हैं—'सैवोर्ध्वबिन्दुहीनोन्मना'⁶ इसी
उन्मना के ऊपर 'महाबिन्दु' है—'तदूर्ध्व महाबिन्दु ॥'⁷
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. 'वरिवस्यारहस्यम्' ४. प्रकाश
५-७. 'वरिवस्यारहस्यम्'
प्रथमोऽंशः १०७
'उन्मना'—'समना' की ऊर्ध्ववर्ती भूमि ही 'उन्मना' है । उन्मना की मात्रा
१/५१२ है । अन्य आचार्यों की दृष्टि से इसके उच्चारण का काल नहीं है । यहीं
शब्दब्रह्मरूपी परम नाद का अन्त है । यही पञ्चम शून्य भी है और नव नादों में
नवम भूमि है । यह भूमि मन के अतीत है । मन के नहीं रहने से नाद भी नहीं
रहता एवं नाद के नहीं रहने से मन भी नहीं रहता । जब तक नाद का अन्त नहीं
होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना में नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना
में काल नहीं है किन्तु फिर भी उन्मना परम तत्व नहीं है क्योंकि उन्मना में भी
नाद का आत्यन्तिक लय नहीं है । उन्मना में कला का अभाव है तथापि नहीं
रहते हुए भी रहती है । इसकी स्थिति इसी प्रकार की है यथा—असम्प्रज्ञात समाधि
में चित्त वृत्ति रूप में नहीं रहता किन्तु तो भी रहता है । अर्थात् संस्कार रूप में
रहता है । समना में सूक्ष्ममन की विद्यमानता है किन्तु उन्मना में नहीं है, केवल
संस्कार है ।
नाद-श्रवण की दृष्टि से स्थिति इस प्रकार है—
(क) आवरणवशात् नाद न सुनाई देने पर-क्षिप्त, विक्षिप्त या मूढ़ दशा ।
(ख) नाद का श्रुतिगोचर होने पर-एकाग्रावस्था या ज्ञानावस्था ।
(ग) नाद-श्रवण के स्थगित होने पर-चित्त की निरोधावस्था ।
(इस अवस्था में मन की वृत्ति नहीं रहती संस्कारमात्र रूप में मन विद्यमान
रहता है । जब यह संस्कार भी नहीं रहता तब चिन्मात्र या शुद्ध आत्मा की
रूपस्थिति हुआ करती है ।)
जब तक नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त
ही नहीं शक्ति एवं समना में भी नाद का अन्त नहीं होता । शाक्त योगियों के मन
में तो उन्मना में भी नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना का भेदन करने के
अनन्तर उन्मना की ऊर्ध्व भूमि में ही 'नाद' का लय हो पाता है । और तभी
तत्वबोध या आत्मसाक्षात्कार संभव हो पाता है । उन्मनापर्यन्त समस्त मन्त्रावयव
१०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त एवं तत्वज्ञान का उदय हो पाता
है तथा परमपद की सम्प्राप्ति हो पाती है । ६ शून्य, ५ अवस्था एवं ७ विषुव के
कोलाहल से अतीत भूमि में ही विश्व की परम विश्रान्ति भूमि एवं परमानन्दस्वरूप
'परमपद' स्थित है । उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं और
उसके अनन्तर 'तत्वविषुव' है । 'नाद' तत्व का अभिव्यञ्जक तो है किन्तु जब तक
नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना के भेदन के बाद
ही नाद अन्त हो पाता है अतः स्पष्ट है कि उन्मनी में तत्वबोध नहीं हो पाता
अतः उन्मनी 'परमपद' नहीं माना जा सकता ॥
'उन्मना' वह प्रदेश है जहाँ न मन है, न मात्रा है, न काल है, न देश है,
न देवता है; न प्रपञ्च का कोई अंश है । यह विशुद्ध चिदानन्दभूमि है । यही परम
लक्ष्य है ।
१०८ वरिवस्यारहस्ये
मन्त्र शास्त्र की दृष्टि से प्रणव के द्वादशावयवों में 'उन्मना' अंतिम अवयव
है। जप विज्ञान एवं योग विज्ञान की सीढ़ी का अंतिम सोपान 'उन्मना' ही है—
साधना की अंतिम मंजिल उन्मना ही है क्योंकि उसके ऊपर तो साधना की गति
ही नहीं केवल साध्य मात्र का अवस्थान है।
'उन्मना' तक की यात्रा प्रत्येक साधक का कर्तव्य है क्योंकि उन्मना पद के
पूर्व तक मनोराज्य है और वह शुद्धाशुद्ध रूप में स्थित है। उसका अशुद्ध भाग
मायात्मक एवं विशुद्ध भाग शुद्धमायात्मक या योगमायात्मक है। उसके अशुद्ध भाग
में प्रणव के अवयवत्रय—अकार, उकार एवं मकार (स्थूल-सूक्ष्म-कारण, जाग्रत,
स्वप्न, सुषुप्ति) स्थित है और विशुद्ध भाग में बिन्दु—अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद,
नादान्त, शक्ति, व्यापिनी एवं समना स्थित है। और इनके अनन्तर सबसे अतीत
'उन्मना पद है जो मनोराज्य से अतीत है।
उन्मना में न तो मात्रा है और न तो काल है—“अमात्रमुन्मना शक्ति
कालस्तत्र न विद्यते ।।” उन्मना 'परमाशक्ति' है और शिवरूपिणी है—
'सा शक्तिः परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्रमात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते सदा ॥' १
वस्तुतः परविमर्शमयी अहन्तकरसा पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है
जो कि स्वरूप गोपनक्रीड़ोत्सुका होकर 'समना' के रूप में स्फुरित होती है ।२
एक प्रश्न उठता है कि क्या मन की अन्तिम सीमा 'बुद्धि' के पूर्व तक ही
है और उसके बाद उसका प्रसार नहीं है क्योंकि श्रुति में कहा गया है—'मनसस्तु
परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान परः ।।' वस्तुतः ऐसा नहीं है क्योंकि मन 'समना' तक
है। उपर्युक्त वेदा श्रुति-वाक्य मात्र अन्तःकरण के अवयव रूप मन की ओर इंगित
कर रहा है जिसके चार अवयव हैं—(१) 'मन' (२) 'बुद्धि' (३) 'चित्त' (४)
'अहङ्कार'। 'योग' एवं तन्त्रशास्त्र में विवेचित मन के इस सूक्ष्मतम एवं व्यापक
स्वरूप की ओर उसका सङ्केत नहीं है।
उन्मना का उच्चारण-काल मात्रा का ५१२वाँ भाग है। अन्य आचार्यों ने
कहा है कि उन्मनी कला मन से अतीत होने के कारण आकार-शून्य है। 'विज्ञान
भैरव' के ४२वें श्लोक में 'शून्या' शब्द से 'उन्मनी' को ही अङ्गीकृत किया गया
है। आचार्य भास्करराय ने 'समना' एवं 'उन्मना' का उच्चारण-काल मात्रा का
२५६वाँ भाग ही स्वीकार किया है। योगी अमृतानन्द ने उन्मना को निराकारा एवं
निरुच्चारा माना है। 'उन्मना' अतीत मन के भी अतीत हैं। नौ नादों में यह
नवम् नाद है ।३
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. बिन्दु में जिस नाद समूह की सूचना मिलती है 'उन्मना' में उसका अन्त हो
जाता है।
प्रथमोऽंशः १०९
भास्करराय और अमृतानन्द की दृष्टि: एक विश्लेषण—
चूँकि योग-भूमियों का (१) 'सकल' (२) 'सकल-निष्कल' एवं (३)
'निष्कल'—इन तीन खण्डों में वर्गीकरण करके उन्मनापर्यन्त भूमियों को
सकल-निष्कल खण्डों में अवस्थित माना गया है अतः 'उन्मना' का भी कोई
आकार मानना चाहिए । यदि उसका कोई आकार स्वीकार कर लिया जाता है तो
उसका कोई उच्चारण-काल भी होना चाहिए और वह समना से सूक्ष्मतर होना
चाहिए । 'उन्मना' काल-हीन है—अमात्रक है + निवृत्ति से लेकर शान्त्यतीत आदि
कलायें । प्राणचार, भुवन एवं देवताओं की गति नहीं है । इससे आगे केवल
अनामय पर तत्त्व की स्थिति है—
'यावत्सा समना शक्तिः तदूर्ध्वे चोन्मना स्मृता । नात्र कालः कलाश्वारो न तत्त्वं
न च देवता । सुनिर्वाणं परं शुद्धं गुरुवक्त्रं तदुच्यते । तदतीतं वरारोहे परं
तत्त्वमनामयम् ।।'१
'स्वच्छन्द तन्त्र' और 'योगिनी हृदय' में मतभेद—
स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है कि 'नात्र कालः कलाश्वारो न तत्त्वं न च
देवताः ।।' अर्थात् उन्मना में काल नहीं है । 'योगिनीहृदय' में कहा गया है कि
उन्मना में भी काल है । इसीलिए आचार्य भास्करराय मखिन कहते हैं कि—
'यथा समनायाः कालः तथैवोन्मनी ।
एक लवात्मक एव काल इति यावत् ।।'२
'समना' और 'उन्मना' में भेद क्या है?—यदि 'समना' की ही भाँति
'उन्मना' में भी काल है तो 'समना' एवं 'उन्मना' में भेद ही क्या है? आचार्य
भास्करराय का कथन है कि आकृति से सूक्ष्म होने के कारण विद्यमान भी काल
'उन्मना' में दुर्लक्ष्य रहता है । यही उसका परत्व है ।
'स्वच्छन्द तन्त्र' में भी उन्मना के अन्त में ही कालहीनता का उल्लेख है
यथा—(१) उन्मन्यते परे योज्यो न कालस्तत्रविद्यते ।३ (२) ऊर्ध्वं मुन्मनसो यत्र तत्र
कालो न विद्यते ।।४
क्या 'स्वच्छन्दतन्त्र' में आत्मविरोधी दृष्टियाँ प्रस्तुत की गई है?—इसका
समाधान इस प्रकार किया जा सकता है—
(१) 'काल' के दो भेद हैं—(क) पर काल (ख) अपर काल । अपर काल
ही 'उन्मनी' है । पर कालात्मा ही उन्मनी शक्ति एवं लव आदि कार्यों का निष्पादक
है । चरम तत्व पर कालात्मा चिद्रूप है और कुण्डलिनी रूप उन्मनी शक्ति उनकी
उपाधि है ।५
१. स्वच्छन्द तन्त्र (पटल १०) २. भास्करराय : सेतुबन्ध
३. स्वच्छन्द तन्त्र ३।११।११ ४. स्वच्छन्द तन्त्र २८६।४
५. 'प्रयोगक्रम दीपिका'
११० वरिवस्यारहस्ये
(२) आचार्य पद्मपादाचार्य कहते हैं कि 'वही साक्षिलक्षणा परा प्रकृति पूर्वोक्त
स्वसंवेद्यस्वरूपा स्वसम्बन्धिनी अपरा शक्ति को जानती है । वह लव से परार्द्ध
पर्यन्त पन्द्रह काल पर्वों की अभिमानिनी अपरा काल शक्ति मुझ उन्मनी रूप काल
के द्वारा अभेद रूप से जानी जाती है ।' १'प्रपञ्चसार विवरण' एवं 'प्रयोगक्रमदीपिका'
की इन दृष्टियों में भी विरोध है ।
(३) हेलराज ने 'वाक्यपदीय' को टीका में कहा है कि स्वतन्त्र कालशक्ति
अनादिनिधन एवं काल की कलना से रहित शब्दब्रह्म में जन्म आदि पौर्वापर्य क्रम
को अवभासित करती है । इसकी अनुज्ञा से ही पदार्थों का आविर्भाव एवं प्रतिबंध
से तिरोभाव होता है । यह उन्मना ही 'काल शक्ति' स्वातन्त्र्य एवं परावाक् है ।
व्याकरणागम यही मानता है कि शब्द ब्रह्मकाल शक्ति का आश्रय लेकर जन्मादिक
विकारों का जनक बनता है । शब्दब्रह्म इस शक्ति द्वारा भोक्ता/भोग्य/एवं भोग रूप
में प्रसृत होता है । यह कालशक्ति ही स्वातन्त्र्यशक्ति है ।
(४) अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—'काल' उन्मना के अतिरिक्त कुछ नहीं
है । इसीको 'काली' नामक पराशक्ति कहते हैं—‘‘क्रमा-क्रमात्मा कालश्च परः संविदि
वर्तते । 'काली' नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते ॥’’२ वस्तुतः पर विमर्शमयी,
अहन्तकरसा' पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है । यही शक्ति अपने रूप को
छिपाने की क्रीड़ा की इच्छा से मात्रात्मक 'समना' के नाम से स्फुरित होती है ।
'वस्तुतो ह्युन्मनाख्यैव पर विमर्शमयी पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति रहन्तै करसा
स्वरूपगोपन क्रीड़ा सदाशिवानाश्रित पदात्मक सर्वभावभास सूत्रणभित्तिकल्प
समनारूपतया स्फुरति ॥'
“सा शक्ति परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्र मात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते यदा ॥”
'उन्मना' के प्रकारद्वय
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
निर्वाण कलारूपा वर्णाविलीरूपा
(सहस्रार में स्थित) (सहस्रार में स्थित)
जहाँ 'मनस्' का अस्तित्व विध्वस्त हो जाता है वही है—'उन्मनी' स्थिति ।
'नाद' की सूक्ष्मतमावस्था एवं अन्तिम 'नाद' 'उन्मनी' है ।
मनोन्मनी और गुरु गोरक्षनाथ
निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि, प्रवर्तयन्तीं परमात्मयोगम् ।
संविन्मयीं तां सहजामनस्कां, कदा गमिष्यामि गतान्यभावः ॥
────────────────────────────────────────────────────────
१. आचार्य पद्मपाद—'प्रपञ्चसार विवरण' २. तन्त्रालोक (६ आ०)
प्रथमोऽंशः १११
नेत्रे ययोन्मेषनिमेष शून्ये, वायुर्यथा वर्जितरेचपूरः ।
मनश्च सङ्कल्प विकल्प शून्य, मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम् ॥
चित्तेन्द्रियाणां चिरनिग्रहेण, श्वासप्रचारे शमिते यमीन्द्राः ।
निवातदीपा इव निश्चलाङ्गाः, मनोन्मनीमग्नधियो भवन्ति ॥
महामाहेश्वराचार्यवर्य भगवान् गोरक्षनाथ की योग-साधना में मन्त्र, हठ, लय एवं
राजयोग चारों ही साधनाओं का समावेश है, तथापि उनका लक्ष्य राजयोग ही है
और यह राजयोग ही उन्मनयोग या मनोन्मनी की साधना का विधायक है ।
मनोन्मनी का स्वरूप—जिस योगावस्था में बिना दृश्य के ही दृष्टि स्थिर हो
जाय, बिना प्रयास के वायु स्थिर हो जाय, बिना अवलम्बन के चित्त स्थिर हो जाय
वही सहज अमनस्क अवस्था 'मनोन्मनी' है । वस्तुतः यह मन की एक
निरालम्बावस्था है—'निरालम्बश्चैकावस्था मनोन्मनी' । यह प्रशान्तचित्त की निश्चल
स्थिरावस्था है । यह राजयोग, समाधि, उन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्याशून्य,
परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरञ्जन, जीवन्मुक्ति, सहजा एवं तुर्या का
पर्याय है । मनोन्मनी में एक विषयोन्मुख मन परिशान्त एवं निश्चल एवं ऊर्ध्वमुख
होकर किसी अलौकिक तत्व में लीन हो जाता है । प्राथमिक पाँच चक्रों में तो
पञ्चभूतों का एक छठे चक्र में मन का लय होता है और उसके अनन्तर ही
मनोन्मनी का उदय होता है । इस महादशा में योगी दशमद्वार (ब्रह्मरन्ध्र) में
समाधिस्थ हो जाता है । यह योगावस्था मन-पवन के ऐक्य, सूर्य-चन्द्र-योग,
रजरैतसयोग, शिवशक्तियोग एवं मन की अविचल शून्यावस्था का पर्याय है जो कि
पवन, नाद, मन, बिन्दु एवं कुण्डलिनी की साधना से प्राप्त होती है । इस
भोग-प्रक्रिया में ब्रह्मरन्ध्र शून्यमण्डल में अमृत-निर्झर झरने लगता है, अनाहत नाद
का गर्जन होने लगता है, बिन्दु ऊर्ध्वमुखी हो जाता है, शक्ति का शिव से समायोग
होता है और योगी महारस का पान करने लगता है, वस्तुतः यह तुरीयावस्था है
और कबीर ने इसे ही सहज रहनी एवं सहज समाधि की अवस्था कहा है ।
गोरक्ष-योग में मन और उसका स्वरूप—गुरु गोरक्षनाथ ने मन को शिव,
शक्ति एवं पञ्च तत्त्वों का जीव कहा है और इसको ही ग्रहण करके उन्मन रहने का
विधान किया है—
'यह मन सकती, यह मन सीव, यह मन पाँच तत्व का जीव ।
यह मन ले जे उनमन रहै, तौ तीनि लोक की बातां कहै ॥'
जब तक यह मन प्राण के साथ सुषुम्ना में प्रवेश नहीं करता तब तक
मनोन्मनी का उदय भी नहीं होता और द्वैत का निरास भी नहीं होता—(१)
“सुषुम्नावाहिनी प्राणेसिद्ध्यत्येव मनोन्मनी । (२) मनसौ ह्युन्मनीभावाद् द्वैतं
नैवोपलभ्यते ॥”
मन के कारण एवं उसके प्राणभूत तत्व—मन, बिन्दु, प्राणापानैक्य आदि ।
कल्याणी मल्लिक के अनुसार—'अन्तः शून्यः वहिः शून्यः शून्यः कुंभ इवाम्बरे' की
११२ वरिवस्यारहस्ये
निर्वितर्क अवस्था । स्मृतिपरिशुद्धि होने पर सम्प्राप्त स्वरूप शून्य शब्दातीत ज्ञानाप्ति
की अवस्था ही निर्गुणपंथी सन्तों एवं योगियों की 'उन्मनी' या निर्बीज समाधि है
और यही नाथों का 'अमनस्क' या मनोहीन अवस्था है । (ना.सं.इ.द.सा.प्र.) ॥
डा० नागेन्द्रनाथ जी ने कहा है कि मनोहीन अवस्था का अर्थ यह नहीं है कि मन
की सत्ता नहीं रहती अथवा उसका निर्दलन हो जाता है, वस्तुतः अचंचलमन जब
स्थैर्य प्राप्त करके परमतत्त्व में लीन हो जाता है तभी उन्मनीवस्था का उदय होता
है । डा० त्रिगुणायत के अनुसार 'उन्मनी' समाधि से मिलती-जुलती ध्यान की एक
अवस्था है जिसे 'तुरीयावस्था' भी कह सकते हैं । हठयोगियों की उन्मनी
पातञ्जलयोग की समाधि के समतुल्य है । डा० बड़थ्वाल ने भी इसका प्रयोग
समाधि के अर्थ में किया है । पं० परशुराम चतुर्वेदी के मतानुसार 'उन्मनी' समाधि
का ही एक पर्यायवाची शब्द है और यह मन एवं प्राण दोनों की ऐक्यावस्था एवं
मन के स्थिरत्व का बोधक है । अन्य विद्वानों के मतानुसार इसे सूर्यचन्द्रमिलन,
प्राणनियन्त्रण, समाधि एवं परमतत्व, सहजसमाधि का पर्याय मानना चाहिए ।
निर्गुणिया सन्तों ने इसे परम तत्त्व के अर्थ में भी प्रयुक्त किया है ।
अमनस्क एवं लय योग—अमनस्क योग मुख्यतः राजयोग की साधना है
किन्तु इसमें मनोलय के विविध सोपानों की सविस्तर मीमांसा भी मिलती है—जो
निम्नानुसार है—
लय की अवधि फल
एक निमेष, श्वास, पल, ⎤
घड़ी, प्रहर, दिन मास ⎥ परम तत्व की प्राप्ति
एवं वर्ष पर्यन्त लय ⎦
१. निमेष का लय— पर तत्व का संस्पर्श किन्तु बार-बार व्युत्थान ।
२. ६ निमेषों का लय— ताप शान्ति एवं बार-बार निद्रा एवं मूर्च्छा ।
३. १ श्वास का लय— प्राणादिकों का स्वस्थान में प्रवाहित होना ।
४. २ श्वासों का लय— कूर्मनागादिक वायुओं के प्रवाह का अवरोध ।
५. ४ श्वासों का लय— सात धातुओं के रसों का समवायु होकर धातुओं
के रसों की पुष्टि ।
६. १ पल तक का लय— श्वास-प्रश्वास, निमेषोन्मेष में स्वल्पता एवं किसी
भी आसन में दीर्घावधि तक बैठे रहने पर भी
थकावट नहीं ।
७. २ पलों तक का लय— हृदय नाड़ी का जागरण एवं अनाहत नाद का
उत्थान ।।
८. ४ पलों तक का लय— श्रुतिपेशल वाणी का श्रवण (दिव्यनाद का श्रवण)
प्रथमोऽंशः ११३
९. ८ पलों तक का लय— काम वासना की निवृत्ति ।
१०. १ घड़ी तक का लय— प्राणादिक वायु का सुषुम्णा में प्रवेश ।
११. १/२ घड़ी तक का लय— मूलाधारस्थ कुण्डलिनी का जागरण ।
१२. २ कला तक का लय— (कलामात्र)—वायुनिरोध—कुण्डलिनी का सुषुम्ना
द्वारा एक क्षण में एक बार ही मन में कम्पन ।
१३. ४ कलातक का लय— निद्राभाव निवृत्ति, हृदय में तेजो बिन्दु का दर्शन ।
१४. १/४ दिन तक का लय— आहार में स्वल्पता मूत्र-पुरीष की मात्रा में
स्वल्पता, शरीर में लघुत्व एवं स्निग्धत्व आदि ।
'व्यापिका' का आकार—शक्ति त्रिकोण के स्वाभिमुख कोण में बिन्दु बना
देने पर 'व्यापिका' का निर्माण होता है । बिन्दु के शिर के ऊपर ऊर्ध्व रेखा बना
दी जाय तो 'उन्मना' का आकार निर्मित हो जाता है और 'समना' के शिरस्थित
बिन्दु का अपनयन कर दिया जाय तो भी 'उन्मना' का आकार बन जाता है ।¹
'बिन्दु' भाल के मध्य में स्थित है, वृत्ताकार है और दीपक की भाँति देदीप्यमान्
है। उसके ऊपर अर्धचन्द्र है जो कि आकार एवं ज्योति में अर्धचन्द्र के समान है।
उसके ऊपर रोधिनी है जो चन्द्रिका की कान्ति वाली है । 'नाद' पद्मराग के समान
एवं नादान्त हल के समान है और विद्युत के समान प्रकाशित है ।
'अर्धचन्द्र'—बिन्दु का अर्धभाग ही अर्द्धचन्द्र है जो कि दीपक के आकार
का है—'अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभागः, तथाकारो दीपाकार एव ।।² पादमात्रा (मात्रा काल
का चतुर्थभाग) ही उसका उच्चारण काल है ।
दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ।
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ॥” (यो०हृ०)
ह्रस्व उच्चारण काल 'मात्रा' कहलाता है—'ह्रस्वस्य उच्चारणकालो
मात्रेत्युच्यते ।।'³ मात्रा का अर्ध उच्चारण काल जिसका हो उसे 'अर्धमात्रा' कहते
हैं—मात्राया अर्ध मुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।⁴ पादमात्रोच्चारणकाल वाला एवं
दीपक के आकार वाला या बिन्दु के अर्ध भाग के आकार वाला प्रणवावयव ही
अर्धचन्द्र कहलाता है—'पादमात्रोच्चारण कालो दीपाकारोऽर्धचन्द्र इत्यर्थः।'५
ज्योत्स्नाकारा (चन्द्रिका समकान्ति) = तदष्टांश (मात्राष्टांश) उच्चारणकाल,
त्र्यस्रविग्रहा (त्रिकोणाकारा) 'रोधिनी' कहलाती है—'ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी
त्र्यस्रविग्रहा ।।'६ स्वच्छन्द संग्रह में भी कहा गया है—'अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वं तु रोधिनी
तस्य चोपरि । ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती कान्तिः सुप्रभाविमलापि च ।। रोधिन्याख्यं
यदुक्तं ते नादस्तस्योर्ध्व संस्थितः । पद्मकिञ्जल्क सङ्काशः कोटिसूर्यसमप्रभः । पुरैः
परिवृतोऽसंख्यैर्मध्ये पञ्चकलावृतः । इन्धिका दीपिका चैव रेचिका मेचिका तथा
१. सेतुबन्ध २-६. दीपिका
८ वरि.