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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 530 में से

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पृष्ठ 204

१०२ वरिवस्यारहस्ये
तन्मध्ये परमा कलातिकुशला सूक्ष्मातिसूक्ष्मा परा । नित्यानन्दपरंपराति- कुशला
पीयूषधाराधरा ।
‘ब्रह्माऽदि कटाहमेव सकलं यद् भासया भासते ।
सेयं श्रीपरमेश्वरी विजयते नित्यं प्रबोधोदया ॥’
व्यापक एवं शिथिल अर्थों में ‘नाद’ शब्द बहुत व्यापक है क्योंकि इसके
भीतर ‘बिन्दु’, ‘अर्धचन्द्र’, ‘रोधिनी’, ‘नाद’, ‘नादान्त’, ‘शक्ति’, ‘व्यापिका’,
‘समना’ एवं ‘उन्मना’ ये सभी आ जाते हैं—
‘बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादनादान्त शक्तयः ।
व्यापिकासमनोन्मन्य इति नादपदाभिधाः ॥’ (पूर्णता प्रत्यभिज्ञा)
समस्त वर्णों में ‘नाद’ ही तो अनुस्यूत है—‘वर्णेषु नादोऽनुस्यूतः ॥’
नादनवक मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपुर-अनाहत-विशुद्धाख्यआज्ञा (चक्रषट्क) एवं नाद,
नादान्त एवं ब्रह्मरन्ध्र तक स्थित है—
‘नाद नवकं मूलाधारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च स्थितम् ॥’२
परमात्मा ने “ईक्षण” किया । ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ । इस ‘ईक्षण’ का
सम्बन्धं ‘पश्यन्ती’ वाक् से है । इस पश्यन्ती वाक् के वामादिक आठ अवयव हैं
जो कि अष्ट शक्तियाँ हैं । ये व्यष्टि-समष्टि रूप से नौ रूपों में व्यक्त होती हैं उन्हीं
से अविकृत शून्यादिक नौ नाद उत्पन्न होते हैं ।३ इन्हें ही ‘नाद’ एवं ‘ध्वनि’ आदि
कहा जाता है ।४ इन्हीं नौ नादों से अ-क-च-ट-त-प-य-श-ल (वर्ग नवक) वैखरी
मातृका का जन्म होता है ।५
‘नाद’ पद्मराग की कान्ति वाला, दो अण्डों के मध्य वर्तमान सिरा (नाडिका)
की भाँति विराजमान रहता है—‘नादस्तु पद्मरागवद्द्वयमध्यवर्तिनीव सिरा ॥’६ यही है
नाद का आकार—“बिन्दुद्वयान्तरे दण्डःशेवरूपो मणिप्रभः ॥” यह प्रश्वेत मणि के
समतुल्य प्रभास्वर है और इसका आकार दो बिन्दु एवं उसके मध्य खींची गई एक
रेखा के तुल्य है इसका उच्चारण-काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है ।
नादोत्पन्न कलायें निम्न हैं—
इन्धिका दीपिका चैव रोचिका मोचिका तथा ।
ऊर्ध्वगामिन्य इत्येताः कला नाद समुद्भवाः ॥७
(१) तारा (२) सुतारा (३) तरणी (४) तारयन्ती (५) सुतारिणी—ये ईशान
कलायें हैं । सदाशिवात्मक ‘नादतत्तव’ से सम्बद्ध हैं । ‘नाद कलायें’ निम्न हैं—(१)
इन्धिका (२) दीपिका (३) रोचिका (४) मोचिका ।
‘नादान्त’—नाद के अनन्तर नादान्त की भूमि आती है । इसकी मात्रा
१/३२ है । नादान्त ही तृतीय शून्य है । नाद एवं नादान्त आचार्यों द्वारा ईश्वर
१-६. प्रकाश .७. नेत्रतन्त्र