वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ११३
९. ८ पलों तक का लय— काम वासना की निवृत्ति ।
१०. १ घड़ी तक का लय— प्राणादिक वायु का सुषुम्णा में प्रवेश ।
११. १/२ घड़ी तक का लय— मूलाधारस्थ कुण्डलिनी का जागरण ।
१२. २ कला तक का लय— (कलामात्र)—वायुनिरोध—कुण्डलिनी का सुषुम्ना
द्वारा एक क्षण में एक बार ही मन में कम्पन ।
१३. ४ कलातक का लय— निद्राभाव निवृत्ति, हृदय में तेजो बिन्दु का दर्शन ।
१४. १/४ दिन तक का लय— आहार में स्वल्पता मूत्र-पुरीष की मात्रा में
स्वल्पता, शरीर में लघुत्व एवं स्निग्धत्व आदि ।
'व्यापिका' का आकार—शक्ति त्रिकोण के स्वाभिमुख कोण में बिन्दु बना
देने पर 'व्यापिका' का निर्माण होता है । बिन्दु के शिर के ऊपर ऊर्ध्व रेखा बना
दी जाय तो 'उन्मना' का आकार निर्मित हो जाता है और 'समना' के शिरस्थित
बिन्दु का अपनयन कर दिया जाय तो भी 'उन्मना' का आकार बन जाता है ।¹
'बिन्दु' भाल के मध्य में स्थित है, वृत्ताकार है और दीपक की भाँति देदीप्यमान्
है। उसके ऊपर अर्धचन्द्र है जो कि आकार एवं ज्योति में अर्धचन्द्र के समान है।
उसके ऊपर रोधिनी है जो चन्द्रिका की कान्ति वाली है । 'नाद' पद्मराग के समान
एवं नादान्त हल के समान है और विद्युत के समान प्रकाशित है ।
'अर्धचन्द्र'—बिन्दु का अर्धभाग ही अर्द्धचन्द्र है जो कि दीपक के आकार
का है—'अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभागः, तथाकारो दीपाकार एव ।।² पादमात्रा (मात्रा काल
का चतुर्थभाग) ही उसका उच्चारण काल है ।
दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ।
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ॥” (यो०हृ०)
ह्रस्व उच्चारण काल 'मात्रा' कहलाता है—'ह्रस्वस्य उच्चारणकालो
मात्रेत्युच्यते ।।'³ मात्रा का अर्ध उच्चारण काल जिसका हो उसे 'अर्धमात्रा' कहते
हैं—मात्राया अर्ध मुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।⁴ पादमात्रोच्चारणकाल वाला एवं
दीपक के आकार वाला या बिन्दु के अर्ध भाग के आकार वाला प्रणवावयव ही
अर्धचन्द्र कहलाता है—'पादमात्रोच्चारण कालो दीपाकारोऽर्धचन्द्र इत्यर्थः।'५
ज्योत्स्नाकारा (चन्द्रिका समकान्ति) = तदष्टांश (मात्राष्टांश) उच्चारणकाल,
त्र्यस्रविग्रहा (त्रिकोणाकारा) 'रोधिनी' कहलाती है—'ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी
त्र्यस्रविग्रहा ।।'६ स्वच्छन्द संग्रह में भी कहा गया है—'अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वं तु रोधिनी
तस्य चोपरि । ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती कान्तिः सुप्रभाविमलापि च ।। रोधिन्याख्यं
यदुक्तं ते नादस्तस्योर्ध्व संस्थितः । पद्मकिञ्जल्क सङ्काशः कोटिसूर्यसमप्रभः । पुरैः
परिवृतोऽसंख्यैर्मध्ये पञ्चकलावृतः । इन्धिका दीपिका चैव रेचिका मेचिका तथा
१. सेतुबन्ध २-६. दीपिका
८ वरि.