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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 530 में से

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पृष्ठ 207

होता है । समना के अनन्तर जो 'उन्मना' है वही`

  • Line 21: 'अमावस्या' है । 'बिन्दु' को पूर्णिमा कहने पर भी उसे पूर्णरूप से पूर्णिमा नहीं
  • Line 22: कहा जा सकता क्योंकि प्रकृत पूर्णिमा षोडशी है पञ्चदशी नहीं । ठीक पूर्णिमा होने
  • Line 23: पर पूर्णता अखण्ड रहती है और उसके अनन्तर कृष्णपक्ष नहीं आता । बिन्दु में
  • Line 24: १५ कलाएँ हैं किन्तु एक कला नहीं है यही कला 'अमृतकला' या 'षोडशी' है ।
  • Line 25: समना अनाश्रित भुवन के ऊपर स्थित है । 'समना' ब्रह्मविल के बाहर अतीत मन
  • Line 26: की भूमि है । इस भूमि में मन है भी और नहीं भी है । नादान्त से इस मन की
  • Line 27: सूचना प्राप्त होती है । 'सूक्ष्म समष्टि मन' नाद में लय हो जाता है—समाप्त हो
  • Line 28: जाता है उसके परे 'अतिमानस' है । 'समना' समस्त कारणों की कारणभूता एवं
  • Line 29: महेश्वर की पराशक्ति है ब्रह्म की चिद्रूप ईसरमशक्ति 'समना' के रूप में अवतरित