वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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होता है । समना के अनन्तर जो 'उन्मना' है वही`
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'अमावस्या' है । 'बिन्दु' को पूर्णिमा कहने पर भी उसे पूर्णरूप से पूर्णिमा नहीं - Line 22:
कहा जा सकता क्योंकि प्रकृत पूर्णिमा षोडशी है पञ्चदशी नहीं । ठीक पूर्णिमा होने - Line 23:
पर पूर्णता अखण्ड रहती है और उसके अनन्तर कृष्णपक्ष नहीं आता । बिन्दु में - Line 24:
१५ कलाएँ हैं किन्तु एक कला नहीं है यही कला 'अमृतकला' या 'षोडशी' है । - Line 25:
समना अनाश्रित भुवन के ऊपर स्थित है । 'समना' ब्रह्मविल के बाहर अतीत मन - Line 26:
की भूमि है । इस भूमि में मन है भी और नहीं भी है । नादान्त से इस मन की - Line 27:
सूचना प्राप्त होती है । 'सूक्ष्म समष्टि मन' नाद में लय हो जाता है—समाप्त हो - Line 28:
जाता है उसके परे 'अतिमानस' है । 'समना' समस्त कारणों की कारणभूता एवं - Line 29:
महेश्वर की पराशक्ति है ब्रह्म की चिद्रूप ईसरमशक्ति 'समना' के रूप में अवतरित