वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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(२) आचार्य पद्मपादाचार्य कहते हैं कि 'वही साक्षिलक्षणा परा प्रकृति पूर्वोक्त
स्वसंवेद्यस्वरूपा स्वसम्बन्धिनी अपरा शक्ति को जानती है । वह लव से परार्द्ध
पर्यन्त पन्द्रह काल पर्वों की अभिमानिनी अपरा काल शक्ति मुझ उन्मनी रूप काल
के द्वारा अभेद रूप से जानी जाती है ।' १'प्रपञ्चसार विवरण' एवं 'प्रयोगक्रमदीपिका'
की इन दृष्टियों में भी विरोध है ।
(३) हेलराज ने 'वाक्यपदीय' को टीका में कहा है कि स्वतन्त्र कालशक्ति
अनादिनिधन एवं काल की कलना से रहित शब्दब्रह्म में जन्म आदि पौर्वापर्य क्रम
को अवभासित करती है । इसकी अनुज्ञा से ही पदार्थों का आविर्भाव एवं प्रतिबंध
से तिरोभाव होता है । यह उन्मना ही 'काल शक्ति' स्वातन्त्र्य एवं परावाक् है ।
व्याकरणागम यही मानता है कि शब्द ब्रह्मकाल शक्ति का आश्रय लेकर जन्मादिक
विकारों का जनक बनता है । शब्दब्रह्म इस शक्ति द्वारा भोक्ता/भोग्य/एवं भोग रूप
में प्रसृत होता है । यह कालशक्ति ही स्वातन्त्र्यशक्ति है ।
(४) अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—'काल' उन्मना के अतिरिक्त कुछ नहीं
है । इसीको 'काली' नामक पराशक्ति कहते हैं—‘‘क्रमा-क्रमात्मा कालश्च परः संविदि
वर्तते । 'काली' नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते ॥’’२ वस्तुतः पर विमर्शमयी,
अहन्तकरसा' पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है । यही शक्ति अपने रूप को
छिपाने की क्रीड़ा की इच्छा से मात्रात्मक 'समना' के नाम से स्फुरित होती है ।
'वस्तुतो ह्युन्मनाख्यैव पर विमर्शमयी पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति रहन्तै करसा
स्वरूपगोपन क्रीड़ा सदाशिवानाश्रित पदात्मक सर्वभावभास सूत्रणभित्तिकल्प
समनारूपतया स्फुरति ॥'
“सा शक्ति परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्र मात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते यदा ॥”
'उन्मना' के प्रकारद्वय
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निर्वाण कलारूपा वर्णाविलीरूपा
(सहस्रार में स्थित) (सहस्रार में स्थित)
जहाँ 'मनस्' का अस्तित्व विध्वस्त हो जाता है वही है—'उन्मनी' स्थिति ।
'नाद' की सूक्ष्मतमावस्था एवं अन्तिम 'नाद' 'उन्मनी' है ।
मनोन्मनी और गुरु गोरक्षनाथ
निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि, प्रवर्तयन्तीं परमात्मयोगम् ।
संविन्मयीं तां सहजामनस्कां, कदा गमिष्यामि गतान्यभावः ॥
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१. आचार्य पद्मपाद—'प्रपञ्चसार विवरण' २. तन्त्रालोक (६ आ०)