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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 530 में से

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पृष्ठ 205

प्रथमोंऽशः १०३
पद के रूप में भी स्वीकृत किये गए हैं । इस भूमि में वेद्य का भेद प्रधान है और
समस्त वाचक शब्द अभिन्न रूप में विमर्शन का विषय है । इसके अनन्तर ललाट
में अनाहत नाद ध्वनित होता है । नादान्त अधः शक्ति द्वारा सकल जगत का
उद्भेदन करके ऊर्ध्वशक्ति में समाप्त होता है । यह नाड्याधार एवं ब्रह्मविल में
लीन है—और मोक्ष का द्वार अवरुद्ध करके स्थित है । यह ब्रह्मरन्ध्र में स्थित है ।
नादान्त भी शून्यपद वाच्य है । इस स्थान में नाद एवं चित् सद्भाव में स्थित है ।
नादान्त में काल तो है किंतु आठ लव का है—'नादान्तेऽष्टौलवा' । नादान्त की
कला केवल एक है और वह है 'ऊर्ध्वगा' ॥
परनादात्मक प्रकाशानन्दघन शिव से स्फोटात्मक शब्दब्रह्म अपनी ध्वनि
(अनुरणन) के द्वारा समस्त प्रपञ्च को आपूरित करता हुआ अप्रतिम वेग से सर्वत्र
फैल जाता है । इसी नाद को देवदेवेश सदाशिव कहा जाता है । उपर्युक्त
परनादात्मक शिव को परमेश्वरी परावाक्रूप 'उन्मना' समझना चाहिए तथा इसमें
घण्टा सदृश अनुरणन को 'नादान्त' समझना चाहिए ।¹
बाईं ओर स्थित बिन्दु से युक्त, विद्युत के समान प्रकाशित होने वाला
'नादान्त' हल की भाँति प्रतीत होता है—
'नादान्तस्तडिदाभः सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ॥'²
'ऊर्ध्वाग्रं दक्षिणारं लाङ्गलम् वामभागे बिन्दुरेक नादान्ताकारः ॥'³
'नादान्त' सौदामिनी के समतुल्य प्रभास्वर है । इसका आकार हल के समान
है और इसके वामभाग में एक बिन्दु रहता है । इसका उच्चारण-काल मात्रा का
बतीसवाँ भाग है ।
नादान्त की कलायें निम्नांकित हैं—'ऊर्ध्वगा' (मात्र एक कला है ।) नादान्त
का अवस्थान 'ब्रह्मरन्ध्र' में है । नाद के भीतर भुवनपञ्चक की मध्यवर्ती शक्ति ही
'ऊर्ध्वगा' है । ब्रह्मरन्ध्र की दृष्टि से—(ब्रह्मरन्ध्र सुषुम्ना के ऊपर स्थित है) ब्रह्मरन्ध्र
में 'नादान्त' है जबकि ब्रह्मरन्ध्र के मुख में 'नाद' का स्थान है । नादान्त 'शून्य'
है । 'ब्रह्मरन्ध्र' सुषुम्ना के ऊपर अवस्थित है जबकि 'शक्ति' ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर
अवस्थित है ।
'शक्ति'—नादान्त के अनन्तर स्थित चिद्भूमिस्वरूपिणी, ब्रह्मरन्ध्रो- परिस्थिता,
अनुन्मिषितविश्वगर्भा, विश्वाधारा, कलाचतुष्टयवेष्टिता, व्यापिनीकेन्द्रा इस भूमि का नाम
ही 'शक्ति है । इसकी मात्रा १/६४ है । इसके मध्य में ही आनन्दसत्ता की
अनुभूति होती है । इसके अनन्तर ब्रह्म की सगुण शक्ति के आनन्द का आभास
होता है । शक्ति से उन्मनी पर्यन्त प्रत्येक भूमि द्वादश आदित्यवत् समुज्ज्वल एवं
१. 'प्रसरत्यतिवेगेनध्वनिनापूरञ्जगत् । स नादो देवदेवेशः प्रोक्तश्चैव सदाशिव ॥'
(नेत्रतन्त्र)
२. 'वरिवस्यारहस्यम्' ३. प्रकाश