सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

१०८ वरिवस्यारहस्ये
मन्त्र शास्त्र की दृष्टि से प्रणव के द्वादशावयवों में 'उन्मना' अंतिम अवयव
है। जप विज्ञान एवं योग विज्ञान की सीढ़ी का अंतिम सोपान 'उन्मना' ही है—
साधना की अंतिम मंजिल उन्मना ही है क्योंकि उसके ऊपर तो साधना की गति
ही नहीं केवल साध्य मात्र का अवस्थान है।
'उन्मना' तक की यात्रा प्रत्येक साधक का कर्तव्य है क्योंकि उन्मना पद के
पूर्व तक मनोराज्य है और वह शुद्धाशुद्ध रूप में स्थित है। उसका अशुद्ध भाग
मायात्मक एवं विशुद्ध भाग शुद्धमायात्मक या योगमायात्मक है। उसके अशुद्ध भाग
में प्रणव के अवयवत्रय—अकार, उकार एवं मकार (स्थूल-सूक्ष्म-कारण, जाग्रत,
स्वप्न, सुषुप्ति) स्थित है और विशुद्ध भाग में बिन्दु—अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद,
नादान्त, शक्ति, व्यापिनी एवं समना स्थित है। और इनके अनन्तर सबसे अतीत
'उन्मना पद है जो मनोराज्य से अतीत है।
उन्मना में न तो मात्रा है और न तो काल है—“अमात्रमुन्मना शक्ति
कालस्तत्र न विद्यते ।।” उन्मना 'परमाशक्ति' है और शिवरूपिणी है—
'सा शक्तिः परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्रमात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते सदा ॥' १
वस्तुतः परविमर्शमयी अहन्तकरसा पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है
जो कि स्वरूप गोपनक्रीड़ोत्सुका होकर 'समना' के रूप में स्फुरित होती है ।२
एक प्रश्न उठता है कि क्या मन की अन्तिम सीमा 'बुद्धि' के पूर्व तक ही
है और उसके बाद उसका प्रसार नहीं है क्योंकि श्रुति में कहा गया है—'मनसस्तु
परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान परः ।।' वस्तुतः ऐसा नहीं है क्योंकि मन 'समना' तक
है। उपर्युक्त वेदा श्रुति-वाक्य मात्र अन्तःकरण के अवयव रूप मन की ओर इंगित
कर रहा है जिसके चार अवयव हैं—(१) 'मन' (२) 'बुद्धि' (३) 'चित्त' (४)
'अहङ्कार'। 'योग' एवं तन्त्रशास्त्र में विवेचित मन के इस सूक्ष्मतम एवं व्यापक
स्वरूप की ओर उसका सङ्केत नहीं है।
उन्मना का उच्चारण-काल मात्रा का ५१२वाँ भाग है। अन्य आचार्यों ने
कहा है कि उन्मनी कला मन से अतीत होने के कारण आकार-शून्य है। 'विज्ञान
भैरव' के ४२वें श्लोक में 'शून्या' शब्द से 'उन्मनी' को ही अङ्गीकृत किया गया
है। आचार्य भास्करराय ने 'समना' एवं 'उन्मना' का उच्चारण-काल मात्रा का
२५६वाँ भाग ही स्वीकार किया है। योगी अमृतानन्द ने उन्मना को निराकारा एवं
निरुच्चारा माना है। 'उन्मना' अतीत मन के भी अतीत हैं। नौ नादों में यह
नवम् नाद है ।३
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. बिन्दु में जिस नाद समूह की सूचना मिलती है 'उन्मना' में उसका अन्त हो
जाता है।