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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 530 में से

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पृष्ठ 213

प्रथमोऽंशः १११
नेत्रे ययोन्मेषनिमेष शून्ये, वायुर्यथा वर्जितरेचपूरः ।
मनश्च सङ्कल्प विकल्प शून्य, मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम् ॥
चित्तेन्द्रियाणां चिरनिग्रहेण, श्वासप्रचारे शमिते यमीन्द्राः ।
निवातदीपा इव निश्चलाङ्गाः, मनोन्मनीमग्नधियो भवन्ति ॥
महामाहेश्वराचार्यवर्य भगवान् गोरक्षनाथ की योग-साधना में मन्त्र, हठ, लय एवं
राजयोग चारों ही साधनाओं का समावेश है, तथापि उनका लक्ष्य राजयोग ही है
और यह राजयोग ही उन्मनयोग या मनोन्मनी की साधना का विधायक है ।
मनोन्मनी का स्वरूप—जिस योगावस्था में बिना दृश्य के ही दृष्टि स्थिर हो
जाय, बिना प्रयास के वायु स्थिर हो जाय, बिना अवलम्बन के चित्त स्थिर हो जाय
वही सहज अमनस्क अवस्था 'मनोन्मनी' है । वस्तुतः यह मन की एक
निरालम्बावस्था है—'निरालम्बश्चैकावस्था मनोन्मनी' । यह प्रशान्तचित्त की निश्चल
स्थिरावस्था है । यह राजयोग, समाधि, उन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्याशून्य,
परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरञ्जन, जीवन्मुक्ति, सहजा एवं तुर्या का
पर्याय है । मनोन्मनी में एक विषयोन्मुख मन परिशान्त एवं निश्चल एवं ऊर्ध्वमुख
होकर किसी अलौकिक तत्व में लीन हो जाता है । प्राथमिक पाँच चक्रों में तो
पञ्चभूतों का एक छठे चक्र में मन का लय होता है और उसके अनन्तर ही
मनोन्मनी का उदय होता है । इस महादशा में योगी दशमद्वार (ब्रह्मरन्ध्र) में
समाधिस्थ हो जाता है । यह योगावस्था मन-पवन के ऐक्य, सूर्य-चन्द्र-योग,
रजरैतसयोग, शिवशक्तियोग एवं मन की अविचल शून्यावस्था का पर्याय है जो कि
पवन, नाद, मन, बिन्दु एवं कुण्डलिनी की साधना से प्राप्त होती है । इस
भोग-प्रक्रिया में ब्रह्मरन्ध्र शून्यमण्डल में अमृत-निर्झर झरने लगता है, अनाहत नाद
का गर्जन होने लगता है, बिन्दु ऊर्ध्वमुखी हो जाता है, शक्ति का शिव से समायोग
होता है और योगी महारस का पान करने लगता है, वस्तुतः यह तुरीयावस्था है
और कबीर ने इसे ही सहज रहनी एवं सहज समाधि की अवस्था कहा है ।
गोरक्ष-योग में मन और उसका स्वरूप—गुरु गोरक्षनाथ ने मन को शिव,
शक्ति एवं पञ्च तत्त्वों का जीव कहा है और इसको ही ग्रहण करके उन्मन रहने का
विधान किया है—
'यह मन सकती, यह मन सीव, यह मन पाँच तत्व का जीव ।
यह मन ले जे उनमन रहै, तौ तीनि लोक की बातां कहै ॥'
जब तक यह मन प्राण के साथ सुषुम्ना में प्रवेश नहीं करता तब तक
मनोन्मनी का उदय भी नहीं होता और द्वैत का निरास भी नहीं होता—(१)
“सुषुम्नावाहिनी प्राणेसिद्ध्यत्येव मनोन्मनी । (२) मनसौ ह्युन्मनीभावाद् द्वैतं
नैवोपलभ्यते ॥”
मन के कारण एवं उसके प्राणभूत तत्व—मन, बिन्दु, प्राणापानैक्य आदि ।
कल्याणी मल्लिक के अनुसार—'अन्तः शून्यः वहिः शून्यः शून्यः कुंभ इवाम्बरे' की