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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 530 में से

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पृष्ठ 214

११२ वरिवस्यारहस्ये
निर्वितर्क अवस्था । स्मृतिपरिशुद्धि होने पर सम्प्राप्त स्वरूप शून्य शब्दातीत ज्ञानाप्ति
की अवस्था ही निर्गुणपंथी सन्तों एवं योगियों की 'उन्मनी' या निर्बीज समाधि है
और यही नाथों का 'अमनस्क' या मनोहीन अवस्था है । (ना.सं.इ.द.सा.प्र.) ॥
डा० नागेन्द्रनाथ जी ने कहा है कि मनोहीन अवस्था का अर्थ यह नहीं है कि मन
की सत्ता नहीं रहती अथवा उसका निर्दलन हो जाता है, वस्तुतः अचंचलमन जब
स्थैर्य प्राप्त करके परमतत्त्व में लीन हो जाता है तभी उन्मनीवस्था का उदय होता
है । डा० त्रिगुणायत के अनुसार 'उन्मनी' समाधि से मिलती-जुलती ध्यान की एक
अवस्था है जिसे 'तुरीयावस्था' भी कह सकते हैं । हठयोगियों की उन्मनी
पातञ्जलयोग की समाधि के समतुल्य है । डा० बड़थ्वाल ने भी इसका प्रयोग
समाधि के अर्थ में किया है । पं० परशुराम चतुर्वेदी के मतानुसार 'उन्मनी' समाधि
का ही एक पर्यायवाची शब्द है और यह मन एवं प्राण दोनों की ऐक्यावस्था एवं
मन के स्थिरत्व का बोधक है । अन्य विद्वानों के मतानुसार इसे सूर्यचन्द्रमिलन,
प्राणनियन्त्रण, समाधि एवं परमतत्व, सहजसमाधि का पर्याय मानना चाहिए ।
निर्गुणिया सन्तों ने इसे परम तत्त्व के अर्थ में भी प्रयुक्त किया है ।
अमनस्क एवं लय योग—अमनस्क योग मुख्यतः राजयोग की साधना है
किन्तु इसमें मनोलय के विविध सोपानों की सविस्तर मीमांसा भी मिलती है—जो
निम्नानुसार है—
लय की अवधि फल
एक निमेष, श्वास, पल, ⎤
घड़ी, प्रहर, दिन मास ⎥ परम तत्व की प्राप्ति
एवं वर्ष पर्यन्त लय ⎦
१. निमेष का लय— पर तत्व का संस्पर्श किन्तु बार-बार व्युत्थान ।
२. ६ निमेषों का लय— ताप शान्ति एवं बार-बार निद्रा एवं मूर्च्छा ।
३. १ श्वास का लय— प्राणादिकों का स्वस्थान में प्रवाहित होना ।
४. २ श्वासों का लय— कूर्मनागादिक वायुओं के प्रवाह का अवरोध ।
५. ४ श्वासों का लय— सात धातुओं के रसों का समवायु होकर धातुओं
के रसों की पुष्टि ।
६. १ पल तक का लय— श्वास-प्रश्वास, निमेषोन्मेष में स्वल्पता एवं किसी
भी आसन में दीर्घावधि तक बैठे रहने पर भी
थकावट नहीं ।
७. २ पलों तक का लय— हृदय नाड़ी का जागरण एवं अनाहत नाद का
उत्थान ।।
८. ४ पलों तक का लय— श्रुतिपेशल वाणी का श्रवण (दिव्यनाद का श्रवण)