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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 530 में से

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९८ वरिवस्यारहस्ये
यह त्रिकोण मूलत्रिकोण है । इसका मध्य बिन्दु 'परामातृका' है । तीन
दिशाओं के तीन बिन्दुओं को 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' कहते हैं । इस
त्रिकोण की वाम दिशा की वक्ररेखा 'पश्यन्तीवाक्' का प्रसार है । इसके ऊर्ध्व की
सरल रेखा 'मध्यमा वाक् का प्रसार है । इसके दक्षिण दिशा की रेखा 'वैखरी
वाक्' है । यही है योनिस্বরূপ विश्वमातृका का स्वरूप । समग्र विश्व का जो
मूलबिन्दू है वही सर्वोच्च बिन्दु है इसी बिन्दु से सर्वप्रथम त्रिकोण का जन्म होता
है । समग्र विश्व के केन्द्र में पराशक्ति के आत्मप्रकोशन की भूमि के रूप में इसी
त्रिकोण का प्रकटीकरण होता है । लुप्त हो जाता है । यह स्तर समाधिजन्य प्रज्ञा
से उत्कृष्टतर है । योगिगम्य पञ्चशून्यों में प्रथम शून्य बिन्दु है । जहाँ ज्ञाता, ज्ञान
एवं ज्ञेय एकाकार होते हैं वही, मात्रा से मात्राहीन में जाने की, भूमि 'बिन्दु' है ।
'बिन्दु' में काल विद्यमान है और उसकी मात्रा १२८ लवों की है—'बिन्दौ' लवाः
शतं ज्ञेया अष्टाविंशतिसंयुतम् ।'
अन्य चक्रों में काल की मात्रा निम्नानुसार है—(१) उन्मना—काल है ही नहीं
है । (२) 'समना'—एक लव (३) 'व्यापिका'—४ लव (४) 'नादान्त'—८ 'लव'
(५) 'नाद'—१६ लव (६) 'रोधिनी'—३२ लव (७) 'अर्धचन्द्र'—६४ लव (७)
'बिन्दु'—१२८ लव । नालिनीदलसंहति को सूची द्वारा अभिवेधन किये जाने पर
प्रत्येक दल के अभिवेधन में जितना समय लगता है उस काल को 'लव' कहा
जाता है—"दले दले तु यः कालः स कालो लवसंज्ञकः ॥१'
इन समस्त चक्रों की अवस्थायें निम्नानुसार हैं—(१) बिन्दु—सौषुप्त सन्निभ
(२) अर्धचन्द्र से नादान्त पर्यन्त तुर्यावस्था । (३) नादान्त से उन्मनी तक =
तुर्यातीता । अन्य मत—(१) बिन्दु—सुषुप्ति । (२) अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद =
तुर्यावस्था (३) नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना, उन्मनी = तुर्यातीत । तुर्यातीतपद
= आनन्दैकघनावस्थाः आकार निम्नानुसार है—
(१) महाबिन्दु (२) उन्मनी (३) समना (४) व्यापिका (५) शक्ति (६)
नादान्त (७) नाद (८) रोधिनी (९) अर्धचन्द्र (१०) बिन्दु
चूँकि "महाबिन्दु" काल एवं अवस्थाओं से परे हैं अतः उसकी किसी
अवस्था, काल, मात्रा आदि की कल्पना करना संभव नहीं है । "महाबिन्दु
समाश्रित्यावस्था कपि न संभवेत् ।"
'बिन्दु', 'अर्धचन्द्र', 'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त', 'शक्ति', 'व्यापिका',
'समना', एवं 'उन्मना' इन सभी का समष्टिगत नाम 'नाद' है—
"बिन्द्वर्ध चन्द्ररोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समतोन्मन्य इति नाद पदाभिधाः ॥"
ये सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, एवं सूक्ष्मतम काल से उपलक्षित हैं तथा इनकी विशिष्ट
१. शङ्कराचार्यः 'प्रपञ्चसारतन्त्र'