वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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बिन्दु का, निरोधिका में अर्धचन्द्र का अर्धांश है और यही क्रम 'समना' तक
चलता है । मात्रा का सूक्ष्म अंश केवल 'समना' तक ही है । 'उन्मना' अमात्र हैं
क्योंकि वहाँ मात्रा नहीं है क्योंकि वहाँ मन ही नहीं है और मन की ही तो मात्रायें
होती है ।
उन्मना तो कालशून्य है किन्तु समना में काल है । 'समना' से जो काल है
उसकी संज्ञा है एकाणुर्लव 'समनायां पुनःकाल एकाणुर्लव संज्ञकः ।'¹ वस्तुतः
'समना' ही सृष्टिव्यापारा है—
“समनासौ निविर्दिष्टा शक्तिः सर्वाध्ववर्तिनी ।
क्रीडीकरोति या विश्वं सहृत्य सृजते पुनः ॥” (नेत्र तन्त्र) ॥
समना की कलायें निम्नांकित हैं—
सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः ।
समना चेति विख्याता एताः शिवकलाः स्मृताः ।
इच्छाशक्तिमधिष्ठाय इच्छासिद्धिप्रदायिकाः ॥
शिव तत्वं समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभा ।
अनन्त शक्तिसंस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्तनिर्मलाः ॥²
'समना' की कलायें—सर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति ॥
समना व्योमरूपात्मिका है । इससे शून्य नाम्नी व्यापिनी शक्ति का उदय होता
है । सदाशिव अनाश्रित पदात्मक सम्पूर्ण भावाभासों की भित्ति रूप अशेष मनन,
मन्तव्य मात्रात्मक 'समना' है जो कि उन्मना की स्वस्वरूपगोपन क्रीड़ा के
परिणामस्वरूप स्फुरित होती है ।³ 'समना' का प्रकाश द्वादश आदित्यों के समतुल्य
है । एक सीधी रेखा के ऊपर एवं नीचे बिन्दु स्थापित कर देने से निर्मित होने
वाला आकार ही 'समना' का आकार है इसका उच्चारण-काल २५६वाँ भाग मात्र
है ।
'समना' की आकृति रेखा के ऊपर नीचे स्थित दो बिन्दुओं के समान होती
है—
'ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ॥'³
'बिन्दुद्वयान्तरालस्थऋजुरेखामयी पुनः समना ॥'⁴
'समना' और 'उन्मना' में अन्तर यह है कि ऊपर वाले बिन्दु के बिना
उपर्युक्त समना ही 'उन्मना' है ।⁵ भास्करराय कहते हैं—'सैवोर्ध्वबिन्दुहीनोन्मना'⁶ इसी
उन्मना के ऊपर 'महाबिन्दु' है—'तदूर्ध्व महाबिन्दु ॥'⁷
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. 'वरिवस्यारहस्यम्' ४. प्रकाश
५-७. 'वरिवस्यारहस्यम्'