वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 206, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीप्त है । पृथ्वी तक सभी तत्व, भुवन शक्ति के ही विस्तार है । शक्तितत्व ही
‘निरालम्बपुरी’ या अनाश्रित भुवन है । अनाश्रित भुवन के चतुर्दिक चार शक्तियाँ
हैं—मध्य में अनाश्रित शक्ति अवस्थित है । शिवरूपी अनाश्रित देव के उत्सङ्ग में
अनाश्रिता शक्ति प्रतिष्ठित है । शक्ति में आनन्दमय स्पर्श की अनुभूति होती है ।
‘ब्रह्मरन्ध्र’ सुषुम्ना के ऊपर है जबकि ‘शक्ति’ ब्रह्मरन्ध्र के भी ऊपर स्थित है।
यहीं ऊर्ध्वकुण्डलिनी प्रसुप्त, सर्पाकार एवं ऊर्णान्तन्तु सन्निभ प्रकाश करती हुई स्थित
है । समस्त अनुन्मिषित विश्व इन्हीं के गर्भ में स्थित है और इस प्रकार वे विश्वाधार
हैं । समस्त तत्व एवं भुवन इन्हीं का आश्रय लेकर स्थित हैं । इस भूमि में एक
अव्यक्त आनन्द की अनुभूति होती है । पृथ्वीपर्यन्त तत्व जो कुछ भी प्रसृत है—
अस्तित्व में है—सब ‘शक्ति तत्व’ का विस्तार है ।
शक्ति की कलायें = सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा और व्यापिनी—
ये ही शक्ति की कलायें हैं—
'सूक्ष्मा चैव सुसू