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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 530 में से

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पृष्ठ 202

१०० वरिवस्यारहस्ये
भास्करराय कहते हैं कि यद्यपि बिन्दु विनिर्मुक्त आठ अष्ट अवयवों की आख्या
ही ‘नाद’ है तथापि व्यवहार-सौकर्य के लिए उसके सहित नौ के अवयवों की
समष्टि को ‘नाद’ कह दिया गया है—
‘यद्यपि बिन्दुविनिर्मुक्तानामष्टानामेव नाद संज्ञा मन्त्र शास्त्रे तथापि व्यवहार
सौकर्याय तत्सहितानामेव सात्र कृतेति साध्यम् ॥’१
“नाद” का काल मात्रा काल होता है—
‘संहत्यैकलवोनो मात्राकालोऽस्य नादस्य ।’२
मूलाधार से उठने वाला ‘नाद’ वर्णों के मध्य से होता हुआ सूत्र की भाँति
प्रतीत होता है—‘आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णमध्यगतः ॥’३
‘नाद’—‘निरोधिका’ के अनन्तर नादभूमि आती है । ‘नाद’ की मात्रा १/१६
है । नाद को चारों ओर से घेरकर अनन्त मन्त्र महेश्वर स्थित हैं । इसका स्थान
ब्रह्मरन्ध्र के मुख में है । विशुद्धचित् की तरङ्ग यहीं से प्रारम्भ होती है । इस भूमि
में त्रिगुणातीत विशुद्धचित् का आभासयुक्त शब्द श्रुतिगोचर होता है । ‘नाद’ मन्त्र
महेश्वररूपी महापुरुषों से परिवृत है । नाद के भीतर ही भुवन पञ्चक की मध्यवर्ती
शक्ति ‘ऊर्ध्वगा’ के नाम से प्रख्यात है । यहीं से शुद्ध चिद् बोध का शुभारम्भ
होता है । बिन्दु की परवर्ती अवस्था ही ‘नाद’ है । ‘बिन्दु’ का अनुभव भ्रूमध्य के
मध्य में होता है जबकि उसके भी ऊर्ध्व में ब्रह्मरन्ध्र की अंतिम सीमा तक ‘नाद’
का अनुभव होता है । नाद का आश्रय लेकर ही नाद के अन्त में पहुँचा जाता
है । वाचकों की महासमष्टि से एकीभूत स्थिति का नाम ‘नाद’ है । जिस प्रकार
बिन्दुरूप ज्योति में यथाभीष्ट अर्थ का साक्षात्कार होता है तद्वत् ‘नाद’ में निःशेष
विश्व, अनन्तवाचक एवं अनन्त मन्त्रों का साक्षात्कार होता है । परिणामतः प्रत्येक
मन्त्र चेतन होने पर नादावस्था में उपनीत होता है । ‘बिन्दु’ एवं ‘नाद’ जगत के
असंख्य वाच्यवाचकों की एकीभूत समष्टि के वाचक हैं । ‘नाद’ का अन्त हुए बिना
देहात्मबोध विगलित नहीं होता ।
मन्त्रशास्त्र में जिसे ‘मन्त्र चैतन्य’ की संज्ञा दी गई है वह प्राणात्मक नाद
शक्ति का उदय मात्र है । जिस प्रकार पयोधि में अनिल के आघात से ऊर्मियाँ
उठती हैं । तद्वत् ‘बिन्दु’ में भी ऊर्मियाँ उठती हैं । ये ऊर्मियाँ ही बाहर की ओर
‘नाद’ एवं ‘ज्योति’ के रूप में प्रकट होती है । ‘नाद’ का उदय वाक् के रूप में
एवं ‘ज्योति’ का उदय अर्थ के रूप में हुआ करता है ।
कुण्डलिनी के व्यक्त होने के साथ वेग उत्पन्न होता है । वेग के उत्पन्न होने
पर स्फोट उत्पन्न होता है । यह स्फोट ही ‘नाद’ है । ‘नाद’ से प्रकाश उत्पन्न
होता है । प्रकाश का व्यक्तरूप ही ‘महाबिन्दु’ है । जीव = सृष्टि में उत्पन्न ‘नाद’
ॐकार है । शब्द ब्रह्म (ओङ्कार) से ५२ मातृकाओं का जन्म होता है । इनमें
१. ‘प्रकाश’ २-३. वरिवस्यारहस्यम्