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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 530 में से

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पृष्ठ 209

प्रथमोऽंशः १०७
'उन्मना'—'समना' की ऊर्ध्ववर्ती भूमि ही 'उन्मना' है । उन्मना की मात्रा
१/५१२ है । अन्य आचार्यों की दृष्टि से इसके उच्चारण का काल नहीं है । यहीं
शब्दब्रह्मरूपी परम नाद का अन्त है । यही पञ्चम शून्य भी है और नव नादों में
नवम भूमि है । यह भूमि मन के अतीत है । मन के नहीं रहने से नाद भी नहीं
रहता एवं नाद के नहीं रहने से मन भी नहीं रहता । जब तक नाद का अन्त नहीं
होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना में नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना
में काल नहीं है किन्तु फिर भी उन्मना परम तत्व नहीं है क्योंकि उन्मना में भी
नाद का आत्यन्तिक लय नहीं है । उन्मना में कला का अभाव है तथापि नहीं
रहते हुए भी रहती है । इसकी स्थिति इसी प्रकार की है यथा—असम्प्रज्ञात समाधि
में चित्त वृत्ति रूप में नहीं रहता किन्तु तो भी रहता है । अर्थात् संस्कार रूप में
रहता है । समना में सूक्ष्ममन की विद्यमानता है किन्तु उन्मना में नहीं है, केवल
संस्कार है ।
नाद-श्रवण की दृष्टि से स्थिति इस प्रकार है—
(क) आवरणवशात् नाद न सुनाई देने पर-क्षिप्त, विक्षिप्त या मूढ़ दशा ।
(ख) नाद का श्रुतिगोचर होने पर-एकाग्रावस्था या ज्ञानावस्था ।
(ग) नाद-श्रवण के स्थगित होने पर-चित्त की निरोधावस्था ।
(इस अवस्था में मन की वृत्ति नहीं रहती संस्कारमात्र रूप में मन विद्यमान
रहता है । जब यह संस्कार भी नहीं रहता तब चिन्मात्र या शुद्ध आत्मा की
रूपस्थिति हुआ करती है ।)
जब तक नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त
ही नहीं शक्ति एवं समना में भी नाद का अन्त नहीं होता । शाक्त योगियों के मन
में तो उन्मना में भी नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना का भेदन करने के
अनन्तर उन्मना की ऊर्ध्व भूमि में ही 'नाद' का लय हो पाता है । और तभी
तत्वबोध या आत्मसाक्षात्कार संभव हो पाता है । उन्मनापर्यन्त समस्त मन्त्रावयव
१०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त एवं तत्वज्ञान का उदय हो पाता
है तथा परमपद की सम्प्राप्ति हो पाती है । ६ शून्य, ५ अवस्था एवं ७ विषुव के
कोलाहल से अतीत भूमि में ही विश्व की परम विश्रान्ति भूमि एवं परमानन्दस्वरूप
'परमपद' स्थित है । उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं और
उसके अनन्तर 'तत्वविषुव' है । 'नाद' तत्व का अभिव्यञ्जक तो है किन्तु जब तक
नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना के भेदन के बाद
ही नाद अन्त हो पाता है अतः स्पष्ट है कि उन्मनी में तत्वबोध नहीं हो पाता
अतः उन्मनी 'परमपद' नहीं माना जा सकता ॥
'उन्मना' वह प्रदेश है जहाँ न मन है, न मात्रा है, न काल है, न देश है,
न देवता है; न प्रपञ्च का कोई अंश है । यह विशुद्ध चिदानन्दभूमि है । यही परम
लक्ष्य है ।