वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १०९
भास्करराय और अमृतानन्द की दृष्टि: एक विश्लेषण—
चूँकि योग-भूमियों का (१) 'सकल' (२) 'सकल-निष्कल' एवं (३)
'निष्कल'—इन तीन खण्डों में वर्गीकरण करके उन्मनापर्यन्त भूमियों को
सकल-निष्कल खण्डों में अवस्थित माना गया है अतः 'उन्मना' का भी कोई
आकार मानना चाहिए । यदि उसका कोई आकार स्वीकार कर लिया जाता है तो
उसका कोई उच्चारण-काल भी होना चाहिए और वह समना से सूक्ष्मतर होना
चाहिए । 'उन्मना' काल-हीन है—अमात्रक है + निवृत्ति से लेकर शान्त्यतीत आदि
कलायें । प्राणचार, भुवन एवं देवताओं की गति नहीं है । इससे आगे केवल
अनामय पर तत्त्व की स्थिति है—
'यावत्सा समना शक्तिः तदूर्ध्वे चोन्मना स्मृता । नात्र कालः कलाश्वारो न तत्त्वं
न च देवता । सुनिर्वाणं परं शुद्धं गुरुवक्त्रं तदुच्यते । तदतीतं वरारोहे परं
तत्त्वमनामयम् ।।'१
'स्वच्छन्द तन्त्र' और 'योगिनी हृदय' में मतभेद—
स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है कि 'नात्र कालः कलाश्वारो न तत्त्वं न च
देवताः ।।' अर्थात् उन्मना में काल नहीं है । 'योगिनीहृदय' में कहा गया है कि
उन्मना में भी काल है । इसीलिए आचार्य भास्करराय मखिन कहते हैं कि—
'यथा समनायाः कालः तथैवोन्मनी ।
एक लवात्मक एव काल इति यावत् ।।'२
'समना' और 'उन्मना' में भेद क्या है?—यदि 'समना' की ही भाँति
'उन्मना' में भी काल है तो 'समना' एवं 'उन्मना' में भेद ही क्या है? आचार्य
भास्करराय का कथन है कि आकृति से सूक्ष्म होने के कारण विद्यमान भी काल
'उन्मना' में दुर्लक्ष्य रहता है । यही उसका परत्व है ।
'स्वच्छन्द तन्त्र' में भी उन्मना के अन्त में ही कालहीनता का उल्लेख है
यथा—(१) उन्मन्यते परे योज्यो न कालस्तत्रविद्यते ।३ (२) ऊर्ध्वं मुन्मनसो यत्र तत्र
कालो न विद्यते ।।४
क्या 'स्वच्छन्दतन्त्र' में आत्मविरोधी दृष्टियाँ प्रस्तुत की गई है?—इसका
समाधान इस प्रकार किया जा सकता है—
(१) 'काल' के दो भेद हैं—(क) पर काल (ख) अपर काल । अपर काल
ही 'उन्मनी' है । पर कालात्मा ही उन्मनी शक्ति एवं लव आदि कार्यों का निष्पादक
है । चरम तत्व पर कालात्मा चिद्रूप है और कुण्डलिनी रूप उन्मनी शक्ति उनकी
उपाधि है ।५
१. स्वच्छन्द तन्त्र (पटल १०) २. भास्करराय : सेतुबन्ध
३. स्वच्छन्द तन्त्र ३।११।११ ४. स्वच्छन्द तन्त्र २८६।४
५. 'प्रयोगक्रम दीपिका'